मिडिल ईस्ट युद्ध की आंच में आगरा का जूता उद्योग... 200 करोड़ का माल अटका, 5 लाख मजदूरों की रोजी-रोटी दांव पर

मिडिल ईस्ट में बढ़ते युद्ध के पदचाप और अमेरिका-इजरायल बनाम ईरान के बीच गहराते तनाव की तपिश अब ताजनगरी आगरा के जूता उद्योग को झुलसाने लगी है. आगरा, जो भारत का सबसे बड़ा फुटवियर हब है, इस समय करीब 200 करोड़ रुपये के जूतों के साथ समंदर के बीचों-बीच फंसा हुआ है.

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युद्ध की आहट से जूता बनाने का सामान हुआ महंगा.(Photo:ITG) युद्ध की आहट से जूता बनाने का सामान हुआ महंगा.(Photo:ITG)

अरविंद शर्मा

  • आगरा,
  • 02 अप्रैल 2026,
  • अपडेटेड 9:56 PM IST

अमेरिका-इजरायल बनाम ईरान के बीच बढ़ते युद्ध जैसे हालात का असर अब उत्तर प्रदेश के आगरा तक पहुंच गया है. ताजमहल के शहर में बने करीब 24 मिलियन डॉलर यानी लगभग 200 करोड़ रुपये के जूते इस समय समंदर में अटके हुए हैं. हालात हैं कि कारोबारियों के सामने हालात आगे कुआं, पीछे खाई जैसे बन गए हैं.

दरअसल, आगरा से मिडिल ईस्ट के देशों में हर साल करीब 121 मिलियन डॉलर यानी लगभग 1125 करोड़ रुपये के जूतों का निर्यात होता है. लेकिन पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव ने इस पूरे कारोबार पर संकट के बादल खड़े कर दिए हैं. आगरा भारत का सबसे बड़ा फुटवियर मैन्युफैक्चरिंग हब माना जाता है. यहां हजारों छोटी-बड़ी फैक्ट्रियां जूते बनाती हैं और लाखों कारीगर इस उद्योग से जुड़े हुए हैं.

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यूरोप, अमेरिका और खासकर मिडिल ईस्ट के देशों में आगरा के लेदर शू और सेफ्टी शू की अच्छी मांग रहती है. लेकिन युद्ध की आशंका और समुद्री मार्गों में अस्थिरता के कारण अब इस कारोबार की कमर टूटती  नजर आ रही है.

समंदर में फंसा 24 मिलियन डॉलर का माल
फुटवियर मैन्युफैक्चरर्स एंड एक्सपोर्टर्स चैंबर (FMAC) के उपाध्यक्ष राजेश सहगल का कहना है, ''सरकारी आंकड़ों के मुताबिक आगरा से यूएई के लिए करीब 121 मिलियन डॉलर का एक्सपोर्ट होता है, जो हमारे कुल एक्सपोर्ट का लगभग 3 प्रतिशत है. लेकिन इस समय यह कारोबार लगभग जीरो पर आ गया है. करीब 24 मिलियन डॉलर का प्रोडक्ट समंदर में खड़ा हुआ है. आप अंदाजा लगा सकते हैं कि क्या स्थिति है? सबसे बड़ी दिक्कत अनिश्चितता की है. यहां किसी को नहीं पता कि कल क्या होगा? ऐसे में न कोई फैसला ले पा रहा है और न ही कोई रणनीति बन पा रही है.''

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कच्चे माल की कीमतें आसमान पर
फुटवियर मैन्युफैक्चरर्स एंड एक्सपोर्टर्स चैंबर (FMAC) के प्रेसिडेंट गोपाल गुप्ता के मुताबिक, उद्योग पहले से ही मुश्किल दौर से गुजर रहा है.

गोपाल गुप्ता कहते हैं, ''सबसे बड़ी समस्या यह है कि हमारी सेलिंग प्राइस पहले से तय है, लेकिन रॉ मटेरियल की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं. चाहे सोल हो, हिल हो, पैकिंग मटेरियल हो, केमिकल्स हों या लेदर की प्रोसेसिंग में इस्तेमाल होने वाली चीजें सबकी कीमत बढ़ चुकी है. यह बढ़ोतरी भी स्थिर नहीं है, कल कीमत और बढ़ सकती है. ऐसे में मार्जिन लगातार सिकुड़ते जा रहे हैं. जूता उद्योग बहुत कठिन समय से गुजर रहा है. करीब 5 लाख मजदूर सीधे और परोक्ष रूप से इस उद्योग से जुड़े हैं. ऐसे में सरकार से राहत पैकेज की बेहद जरूरत है.''

हर तीसरे दिन बढ़ रहे कच्चे माल के दाम
एफमैक सदस्य माला खेड़ा का कहना है कि उद्योग के सामने लागत का संकट खड़ा हो गया है. माला खेड़ा के मुताबिक, ''हर चीज की कीमत बढ़ रही है. ऐसे में प्रोडक्ट की लागत कितनी अपनी जेब से देंगे? क्लाइंट पहले ही एक कीमत तय कर चुका है. रॉ मटेरियल सप्लायर हर तीसरे दिन दाम बढ़ाने का मेल भेज देते हैं. ऐसे में सवाल यह है कि उद्योग कितने दिन तक सर्वाइव करेगा? हमें सभी का सहयोग चाहिए. हम अपने प्रॉफिट मार्जिन भी कम करेंगे, लेकिन सरकार से अनुरोध है कि पेट्रोकेमिकल की बढ़ती कीमतों में राहत दी जाए.''

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जूते के 70% सामान का पेट्रोलियम से संबंध
आगरा फुटवियर मैन्युफैक्चरर्स एंड एक्सपोर्ट चैंबर के सीनियर और जूता निर्यातक कैप्टन अजीत सिंह राणा का कहना है कि जूता उद्योग सीधे तौर पर पेट्रोकेमिकल्स पर निर्भर है.

कैप्टन राणा बताते हैं, ''जूता बनाने में करीब 70 प्रतिशत सामग्री पेट्रोलियम से जुड़ी होती है. जितने भी देशों से पेट्रोकेमिकल आता है, वे सभी इस संकट से प्रभावित हैं. इसका असर अब दिखने लगा है. गैस आधारित करीब 30 प्रतिशत से ज्यादा इंडस्ट्री बंद हो चुकी हैं. पेट्रोकेमिकल से जुड़े सामान की कीमतों में 40 से 50 प्रतिशत तक बढ़ोतरी हो चुकी है. हमने जनवरी में जो रेट दिए थे, अब उन्हीं कीमतों पर सप्लाई करना भारी पड़ रहा है. इस समय 2027 के ऑर्डर का माल बन रहा है और यूरोप व यूएई के खरीदार भी कंफ्यूज हैं कि आगे हालात क्या होंगे.''

चारों तरफ से घिरा उद्योग
फुटवियर मैन्युफैक्चरिंग एंड एक्सपोर्ट चैंबर (FMAC) के उपाध्यक्ष राजीव वासन का कहना है कि उद्योग लगातार संकटों से जूझ रहा है.

राजीव वासन कहते हैं, ''आगरा से करीब 121 मिलियन डॉलर का एक्सपोर्ट होता है और इसका बड़ा हिस्सा इस समय हाई सी या पोर्ट्स पर फंसा हुआ है. पहले कोविड आया, फिर अमेरिका के टैरिफ का असर पड़ा, उसके बाद यूक्रेन युद्ध हुआ और अब यह नया संकट सामने है. हम हर तरफ से घिर गए हैं. लॉजिस्टिक्स कॉस्ट बढ़ रही है, रॉ मटेरियल महंगा हो गया है और ऑर्डर को लेकर भी अनिश्चितता है.''

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हजारों मजदूरों की रोजी-रोटी पर असर
आगरा की जूता इंडस्ट्री में करीब 5 लाख लोग सीधे या परोक्ष रूप से रोजगार पाते हैं. अगर पश्चिम एशिया का संकट लंबा खिंचता है तो इसका असर सिर्फ कारोबार पर ही नहीं बल्कि हजारों मजदूरों की रोजी-रोटी पर भी पड़ सकता है. कुल मिलाकर हालात ऐसे बन गए हैं कि आगरा का जूता उद्योग इस समय 'सांप-छछूंदर की स्थिति' में फंसा हुआ है, न आगे बढ़ पा रहा है, न पीछे हट पा रहा है. दूर बैठे युद्ध की आंच अब ताज के शहर के कारोबार को भी झुलसाने लगी है.

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