प्रयागराज के संगम तट पर चल रहे माघ मेले में साधु-संतों की कोई कमी नहीं है. कोई ध्यान में लीन है, कोई कठोर तपस्या में, तो कोई प्रवचन दे रहा है. लेकिन इन सबके बीच एक संत ऐसे भी हैं, जिसकी चर्चा लग्जरी गाड़ियों, स्टाइल और बयानों को लेकर हो रही है. नाम है- जगतगुरु महामंडलेश्वर संतोष दास उर्फ सतुआ बाबा.
साधारण भगवा वस्त्र, आंखों पर रे-बैन का चश्मा, और पीछे-पीछे करोड़ों की गाड़ियों का काफिला. पहले तीन करोड़ की लैंड रोवर डिफेंडर, फिर पोर्शे और अब मर्सिडीज GLS... माघ मेले में जब बाबा का काफिला चलता है, तो श्रद्धालुओं की भीड़ खुद-ब-खुद खिंची चली आती है. कोई आशीर्वाद लेने आता है, तो कोई लक्जरी बाबा के साथ फोटों खिंचाने आता है.
खाक चौक क्षेत्र में स्थित सतुआ बाबा का शिविर माघ मेले के सबसे भव्य शिविरों में एक है. यहां रोज सैकड़ों श्रद्धालु पहुंचते हैं. भंडारे में प्रसाद मिलता है, सतुआ बांटा जाता है. लेकिन शिविर से कहीं ज्यादा चर्चा बाबा के काफिले में खड़ी महंगी गाड़ियों की होती है.
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बाबा खुद इन गाड़ियों को श्रद्धालुओं का प्रेम कहते हैं. उनका कहना है कि ये गाड़ियां किसी एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि सनातन वैभव का प्रतीक हैं. अगर कोई भक्त श्रद्धा से कुछ देता है, तो उसे ठुकराया नहीं जाता.
11 साल की उम्र में छोड़ा घर, पकड़ी वैराग्य की राह
सतुआ बाबा की कहानी दिलचस्प है. आज जिस संत के पास करोड़ों का वैभव दिखता है, उन्होंने महज 11 साल की उम्र में घर-परिवार छोड़ दिया था. संतोष दास ने कम उम्र में ही सांसारिक जीवन त्यागकर अध्यात्म का मार्ग चुन लिया. वे विष्णुस्वामी संप्रदाय से जुड़े. यह संप्रदाय करीब 300 साल पुराना माना जाता है.
पीठाधीश्वर से जगतगुरु तक का सफर
साल 2012 में विष्णुस्वामी संप्रदाय के छठे पीठाधीश्वर ब्रह्मलीन यमुनाचार्य जी महाराज के निधन के बाद संतोष दास को सतुआ बाबा पीठ की जिम्मेदारी मिली. इसके साथ ही वे इस परंपरा के 57वें आचार्य बने.
पिछले महाकुंभ में उन्हें जगतगुरु की पदवी से भी नवाजा गया. तभी से उनकी पहचान एक संत के साथ प्रभावशाली धार्मिक चेहरे के तौर पर बनने लगी.
वैराग्य के साथ वैभव
सतुआ बाबा को महंगी गाड़ियां, स्टाइलिश चश्मा, प्राइवेट जेट से सफर... इन सबने उन्हें सोशल मीडिया का चर्चित चेहरा बना दिया है. हाल ही में उनका एक वीडियो वायरल हुआ, जिसमें वे बुलडोजर पर खड़े होकर माघ मेले में घूमते नजर आए. साथ में लग्जरी गाड़ियों का काफिला भी था.
महंगी गाड़ियों पर उठ रहे सवालों पर सतुआ बाबा के बयान भी उतने ही बेबाक हैं. बाबा कहते हैं कि ये विकास का भारत है. गाड़ियां आती-जाती रहती हैं. गाड़ी महत्वपूर्ण नहीं, जुड़ाव महत्वपूर्ण है. जो भारत से जुड़ेगा, वही आगे बढ़ेगा.
आलोचकों को जवाब देते हुए बाबा यहां तक कह देते हैं कि जिसे जलन हो रही है, वो मणिकर्णिका घाट आ जाए. उनका तर्क है कि साधु-संतों के पास साधन होना गलत नहीं.
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सतुआ बाबा की लोकप्रियता खासकर युवा पीढ़ी में तेजी से बढ़ी है. माघ मेले में बड़ी संख्या में युवा उनके साथ तस्वीरें लेते दिखते हैं. बाबा खुद कहते हैं कि आज का युवा सब कुछ हासिल कर सकता है. वे GenZ में धार्मिक पर्यटन के बढ़ते ट्रेंड को सनातन धर्म की वापसी से जोड़ते हैं. उनका कहना है कि यह संवाद और विकास का युग है.
सतुआ बाबा बांग्लादेश, पाकिस्तान, सनातन और राजनीति पर खुलकर बयान देते हैं. उनका कहना है कि सनातन धर्म के विरोधियों को भारत की सहिष्णुता समझनी चाहिए.
संगम की धरती पर जहां एक ओर तपस्वी संत ध्यान में लीन हैं, वहीं सतुआ बाबा का अंदाज सबसे अलग दिखता है. वैराग्य से शुरू होकर वैभव तक पहुंची यह यात्रा सतुआ बाबा की अनोखी कहानी है, जिन्होंने 11 साल के बाल संत से करोड़ों की गाड़ियों और प्राइवेट जेट में चलने वाले महामंडलेश्वर तक का सफर किया है.
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