'16 घंटे ड्राइविंग, रोज हाथ में बचते सिर्फ…', रेडिट पर बेंगलुरु के कैब ड्राइवर की कहानी वायरल

डेढ़ साल तक बेरोज़गार रहने के बाद बेंगलुरु के एक कैब ड्राइवर ने मजबूरी में राइड-हेलिंग ऐप्स का सहारा लिया. रेडिट पर उसने अपनी रोजाना की कमाई, खर्च और 16 घंटे तक काम करने की थकान का पूरा हिसाब बताया.

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Bengaluru cab driver goes an extra mile to return lost phone to passenger (Representative pic) Bengaluru cab driver goes an extra mile to return lost phone to passenger (Representative pic)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 31 जनवरी 2026,
  • अपडेटेड 5:32 PM IST

बेंगलुरु के एक कैब ड्राइवर की कहानी रेडिट (Reddit) पर वायरल हो रही है. लंबे समय तक बेरोजगार रहने, बिजनेस में नुकसान होने के बाद कैब ड्राइवर बनने का फैसला किया. रेडिट पर उसने कैब ड्राइवर की जिंदगी में दिक्कतें, स्ट्रेस, रोजाना कमाई और बजट सब का हिसाब दिया.

रेडिट पर ड्राइवर बताता है कि वो रोजाना 16 घंटे काम करता है. किसी रोज नागा नहीं और उसकी जिंदगी पूरी तरह से फंस चुकी है. रोजाना 16 घंटे ड्राइविंग करने के बाद भी बमुश्किल 1000 रुपये हाथ में बचने थे. ड्राइवर ने अपनी पोस्ट में पूछा - क्या यही जिंदगी है.

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बेरोजगारी, बिजनेस फेल और फिर कर्ज

ड्राइवर ने बताया कि वह लगभग डेढ़ साल तक नौकरी की तलाश करता रहा, लेकिन कहीं काम नहीं मिला. इसी दौरान उसने बिजनेस शुरू किया, लेकिन वह भी असफल रहा. इसके बाद वह लोन और क्रेडिट कार्ड के कर्ज में फंस गया. आखिर में मजबूरी में उसने 1500 रुपये प्रतिदिन किराये पर एक येलो बोर्ड कार ली और पिछले महीने से ड्राइविंग शुरू की.

यह भी पढ़ें: ऑस्ट्रेलिया में कैब चलाकर कितनी कमाई? भारतीय ने 10 घंटे टैक्सी चलाकर बताए असली आंकड़े

ड्राइवर के मुताबिक वह Uber और Rapido पर ड्राइव करता है. उसने अपनी रोज की कमाई और खर्च का पूरा हिसाब बताया. रोजाना 4000 रुपये कमाई होती है, जिसमें 1500 रुपये कार किराया चला जाता है, 1200 रुपये CNG खर्च का होता है और 200 रुपये खाने-पीने पर खर्च हो जाता है. इन सबके बाद उसके पास केवल 1000 रुपये ही बचते हैं.उसने लिखा कि बेंगलुरु की ट्रैफिक में 16 घंटे ड्राइव करके इतनी कम बचत होना बहुत मुश्किल है. शरीर टूट जाता है.

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कम नींद और बढ़ती शारीरिक परेशानी

ड्राइवर ने बताया कि लगातार ड्राइविंग से उसके घुटनों और पैरों में दर्द रहने लगा है. मैं रोज मुश्किल से 6 घंटे ही सो पाता हूं. बाकी पूरा वक्त सड़क पर बीत जाता है. इस डेली लाइफ में उसके पास न आराम का समय है, न परिवार के लिए वक्त है.

देखें  पोस्ट

'ऐप्स खुद एक दानव हैं'

ड्राइवर ने बताया कि ऐप-आधारित काम में हर सेकंड मायने रखता है. अगर मैं 5–6 सेकंड में राइड एक्सेप्ट न करूं तो ऑर्डर किसी और को चला जाता है और मेरी परफॉर्मेंस रेटिंग गिर जाती है. उसके मुताबिक, लगातार फोन पर नजर रखना, ट्रैफिक का तनाव, राइड कैंसिल होने का डर और रोज की गाड़ी मेंटेनेंस सब मिलकर मानसिक दबाव बढ़ा देते हैं.

'या तो शोषक बनो या शोषित'

पोस्ट के अंत में उसने लिखा कि भारत में लाखों लोग रोज ऐसे ही संघर्ष करते हैं. कम मजदूरी पर चलने वाला सिस्टम बाकी लोगों को आराम देता है, पर हमारी मेहनत कहीं नहीं ले जाती.

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