सोशल मीडिया की दुनिया में हर दिन नए चेहरे सामने आते हैं, लेकिन कुछ कहानियां अलग छाप छोड़ जाती हैं. पुजारिनी प्रधान की कहानी भी ऐसी ही है. ग्रामीण बंगाल में रहने वाली पुजारिनी ने अपनी साधारण जिंदगी को ही कंटेंट बनाया और देखते ही देखते लाखों लोगों का ध्यान खींच लिया. उनके वीडियो में न ग्लैमर है, न भारी प्रोडक्शन, बल्कि घर, रसोई और रोजमर्रा के छोटे-छोटे पल हैं, जो लोगों को जुड़ाव का एहसास कराते हैं.
इसी सादगी के कारण उन्हें सोशल मीडिया पर अच्छी-खासी लोकप्रियता मिली, लेकिन अब यही उनकी पहचान सवालों के घेरे में आ गई है. इंटरनेट पर कुछ यूजर्स उन्हें 'इंडस्ट्री प्लांट' कह रहे हैं. यानी यह आरोप लगाया जा रहा है कि उनकी सफलता के पीछे कोई बड़ी एजेंसी और सोची-समझी रणनीति काम कर रही है, और उन्हें एक ब्रांड की तरह तैयार किया गया है.
यह विवाद तब शुरू हुआ जब कुछ लोगों ने उनके पुराने वीडियो और तेजी से बढ़ते फॉलोअर्स पर सवाल उठाए. आलोचकों का कहना है कि इतनी जल्दी इतनी बड़ी पहुंच हासिल करना आसान नहीं होता, जब तक इसके पीछे कोई मजबूत टीम न हो. कुछ यूजर्स ने यह भी कहा कि उनकी 'गर्ल नेक्स्ट डोर' वाली इमेज असल नहीं, बल्कि एक बनाई गई छवि है.
वीडियो बनाकर दिया जवाब
इन आरोपों पर पुजारिनी ने चुप रहने के बजाय सीधे जवाब देने का रास्ता चुना. उन्होंने एक वायरल वीडियो में साफ किया कि वह एक एजेंसी के साथ काम करती हैं, लेकिन एजेंसी सिर्फ उनके ब्रांड डील्स संभालती है. उन्होंने कहा कि वीडियो बनाना, शूट करना और एडिट करना वह शुरुआत से खुद करती आई हैं.
पुजारिनी ने अपने शुरुआती संघर्षों का भी जिक्र किया. उन्होंने बताया कि एक समय ऐसा भी था जब एक एजेंसी ने उन्हें कम पैसे दिए, जबकि उसी काम से खुद ज्यादा कमाई की. उनके मुताबिक, एक डील के लिए उन्हें 60 हजार रुपये मिले, जबकि एजेंसी ने उसी से करीब 2 लाख रुपये कमाए.
राजनीति पर अपनी राय रखनी शुरू की, तभी से ट्रोलिंग तेजी से बढ़ने लगी.
उन्होंने यह भी कहा कि असली मुद्दा उनके कंटेंट से ज्यादा उनके विचार हैं. जैसे ही उन्होंने फेमिनिज्म और राजनीति पर अपनी राय रखनी शुरू की, ट्रोलिंग बढ़ गई. पुजारिनी के अनुसार, लोग अक्सर हर कहानी में संघर्ष देखना चाहते हैं, लेकिन जब कोई व्यक्ति बिना उस ढांचे में फिट हुए आगे बढ़ता है, तो उस पर शक किया जाने लगता है.
उनके बयान के बाद सोशल मीडिया पर बहस तेज हो गई है. कई लोग उनके समर्थन में सामने आए हैं और कहा है कि एक साधारण पृष्ठभूमि से आई लड़की की सफलता को शक की नजर से देखना सही नहीं है. यह मामला अब सिर्फ एक क्रिएटर का नहीं, बल्कि उस सोच का बन गया है, जिसमें सादगी से मिली सफलता को स्वीकार करना आसान नहीं होता.
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