भारत के बड़े शहरों में आरामदायक रिटायरमेंट के लिए कितनी रकम चाहिए.इस सवाल पर अब नई बहस छिड़ गई है. वेल्थ मैनेजमेंट फर्म Dezerv के को-फाउंडर संदीप जेठवानी ने दावा किया है कि अगर किसी व्यक्ति का मासिक खर्च 1 से 2 लाख रूपया है, तो उसे 60 साल की उम्र तक करीब 40 करोड़ का कॉर्पस चाहिए होगा. कॉर्पस वह कुल रकम जो किसी व्यक्ति को रिटायरमेंट के बाद खर्च चलाने के लिए चाहिए होती है.
जिंदगी में जीने के लिए आखिर कितनी पैसे की जरूरत होगी. इस सवाल का जवाब जितने जरूरत है उतना. यानी ये आंकड़ा बदल सकता है. लेकिन रिटायरमेंट के बाद आपके पास कितना पैसा होना चाहिए जिंदगी अच्छी से चल जाए. सोशल मीडिया पर इसी सवाल को लेकर चर्चा है. वजह है एक पॉडकॉस्ट का क्लिप. वेल्थ मैनेजमेंट फर्म Dezerv के को-फाउंडर संदीप जेठवानी ने दावा किया है कि अगर किसी व्यक्ति का मासिक खर्च 1 से 2 लाख रूपया है, तो उसे 60 साल की उम्र तक करीब 40 करोड़ रूपये का कॉर्पस चाहिए होगा. कॉर्पस यानी कुल रकम जो किसी व्यक्ति को रिटायरमेंट के बाद खर्च चलाने के लिए चाहिए होती है.
यह बात उन्होंने The Money Mindset पॉडकास्ट में पत्रकार सोनिया शेनॉय के साथ बातचीत के दौरान कही. चर्चा तब शुरू हुई, जब सोनिया शेनॉय ने खुद को 'लाइव केस स्टडी' बताते हुए पूछा कि अगर वह लगभग 40 साल की हैं और उनका खर्च करीब 2 लाख रूपये महीना है, तो 60 की उम्र तक उन्हें कितनी संपत्ति चाहिए होगी.
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इस पर संदीप जेठवानी ने सीधा जवाब दिया-40 करोड़. उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि इसमें रहने का घर और कार शामिल नहीं हैं. जब उनसे पूछा गया कि क्या इसमें बच्चों की पढ़ाई भी शामिल है, तो उन्होंने कहा कि यह पूरी लाइफ के खर्च को कवर करने वाला आंकड़ा है और एक मिड-साइज़ फैमिली के लिए यह काफी है.
हालांकि, यह आंकड़ा सुनकर खुद सोनिया शेनॉय भी चौंक गईं. उन्होंने कहा कि उन्हें उम्मीद थी कि यह रकम करीब 10 करोड़ रूपये होगी, न कि 40 करोड़ रूपये. उनके मुताबिक, महंगाई, लाइफस्टाइल में बढ़ोतरी और अचानक आने वाले हेल्थ खर्च इस आंकड़े को काफी बढ़ा सकते हैं.
सोशल मीडिया पर लोगों ने क्या कहा
इस बयान के बाद सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं. कई यूजर्स ने 40 करोड़ रूपये के आंकड़े को अवास्तविक बताया. एक यूजर ने लिखा कि 60 के बाद 20-25 साल के जीवन के लिए इतनी बड़ी रकम की जरूरत समझ से परे है. वहीं एक अन्य ने तंज कसते हुए कहा कि इस तरह की बातें जमीन से काफी दूर लगती हैं.
कुछ लोगों ने यह भी सवाल उठाया कि जब देश के ज्यादातर लोग अपने पूरे जीवन में 1 करोड़ रूपये तक नहीं कमा पाते, तब 40 करोड़ रूपये की चर्चा कितनी प्रासंगिक है. कई यूजर्स ने कहा कि ऐसे सुझाव आम लोगों की वास्तविक स्थिति से मेल नहीं खाते. वहीं किसी का कहना है भारत में कितने फीसदी लोग हैं, जो 1 करोड़ रूपये भी कमा पाते है, फिर ऐसी सलाह देने का क्या तुक, वो भी तब जब उम्र ढलान पर हो.
फिलहाल, यह बहस यही दिखाती है कि रिटायरमेंट प्लानिंग में आंकड़े जितने बड़े होते हैं, उतना ही जरूरी है कि वे आम लोगों की वास्तविकता के करीब भी हों.
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