मुंबई से सटे अरब सागर में बन रही दुनिया की सबसे ऊंची छत्रपति शिवाजी महाराज की प्रतिमा एक बार फिर विवादों में है. महाराष्ट्र सरकार ने प्रतिमा की ऊंचाई कम करके उसकी तलवार की ऊंचाई बढ़ाने का फैसला किया है.
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, नए डिजाइन के बाद शिवाजी की प्रतिमा 75.7 मीटर हो जाएगी. पुराने डिजाइन में इसकी ऊंचाई 83.2 मीटर थी. लेकिन प्रतिमा की असली ऊंचाई को बरकरार रखने के लिए तलवार की लंबाई को 38 मीटर से 45.5 मीटर कर दिया गया है.
बता दें कि प्रतिमा की कुल लंबाई 121.2 मीटर है. मूर्ति की ऊंचाई कम करने पर फडणवीस सरकार पर यह आरोप लगा कि सरकार प्रतिमा बनाने के लिए 3600 करोड़ रुपये खर्च करने वाली थी, लेकिन प्रतिमा के डिज़ाइन में बदलाव कर सरकार ने अपनी जेब पर पड़ने वाले बोझ में 338.94 करोड़ की कटौती की. हालांकि, इन आरोपों को मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने खारिज कर दिया.
जानकारों की मानें तो प्रतिमा पर यह पूरा विवाद राजनीतिक श्रेय लेने के चक्कर में है. दरअसल, इस प्रोजेक्ट को सबसे पहले 2004 और 2009 में कांग्रेस-एनसीपी ने अपने चुनावी मेनिफेस्टो में शामिल किया था. उस वक्त प्रतिमा की प्रस्तावित ऊंचाई 98 मीटर थी.
फिर इसकी प्रस्तावित ऊंचाई में बदलाव कर 190 मीटर और बाद में 210 मीटर किया गया. लेकिन फडणवीस सरकार ने इस महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट को दुनिया में सबसे ऊंची प्रतिमा के रूप में स्थापित करने का फैसला किया और ऊंचाई 212 मीटर कर दी. फिलहाल दुनिया में सबसे ऊंची प्रतिमा चीन में स्प्रिंग टेम्पल बुद्धा की है. यहां बुद्ध की प्रतिमा 208 मीटर की है.
अब इस प्रतिमा के राजनीतिक परिदृश्य को भी समझ लेते हैं. दरअसल, यह पूरा प्रोजेक्ट महाराष्ट्र के मराठा वोट बैंक पर साधा गया सटीक निशाना है. क्योंकि महाराष्ट्र की राजनीति में सबसे बड़ा वोट बैंक मराठा समुदाय का है. कांग्रेस, एनसीपी, शिवसेना से लेकर बीजेपी तक इसे अपने साथ लाने में जुटे रहते हैं.
यही वजह है कि चुनाव के वक्त राजनीतिक पार्टियों के नारे भी शिवाजी से जुड़े रहते हैं. (जैसे कि छत्रपति शिवाजी का आशीर्वाद, चलो-चले मोदी के साथ). यहां तक कि किसानों के कर्जमाफी की योजनाओं के नाम भी शिवाजी महाराज से जोड़े गए हैं.
वहीं, मराठा समुदाय लंबे समय से आरक्षण की मांग कर रहा है. ऐसे में मराठा और शिवाजी के नाम पर सभी राजनीतिक दल इस समुदाय को अपने साथ में लाने की जुगत में है.