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लड़कियां न बनें डॉक्‍टर इसलिए कॉलेज कम कर देता था नंबर

अंकुर कुमार
  • 09 अगस्त 2018,
  • अपडेटेड 1:55 PM IST
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महिलाओं के साथ भेदभाव किसी एक देश तक सीमित नहीं है. जापान में महिलाओं से भेदभाव का एक बड़ा मामला सामने आया है. (प्रतीकात्‍मक तस्‍वीर: GETTY)

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वैसे तो जापान में महिलाएं काफी श‍िक्ष‍ित हैं. हालांकि जापान के प्रतिष्‍ठ‍ित मेडिकल कॉलेज टोक्‍यो मेडिकल यूनिवर्स‍िटी की काफी आलोचना हो रही है.  (प्रतीकात्‍मक तस्‍वीर: GETTY)

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टोक्‍यो मेडिकल यूनिवर्स‍िटी पर आरोप है कि उसने सालों तक महिलाओं के इस कॉलेज में दाख‍िले से रोकने की कोश‍िश की. 

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इसके लिए वहां के प्रशासन ने कई गलत हथकंडे अपनाए. इसमें एंट्रेस एग्‍जाम के रिजल्‍ट को फ‍िक्‍स करना तक शामिल है.  (प्रतीकात्‍मक तस्‍वीर: GETTY)

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इंटरनैशनल मीडिया रिपोर्ट के अनुसार टोक्‍यो मेडिकल यूनिवर्स‍िटी ने अपने गिरी हुई हरकत के लिए माफी मांगी है.

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इस मामले का खुलासा तक हुआ, जब टोक्‍यो मेडिकल यूनिवर्स‍िटी के प्रशासन पर आरोप लगा कि उसने अपने फायदे के लिए एक नौकरशाह के बेटे को एडमिशन देने के लिए रिजल्‍ट में छेड़छाड़ की. (प्रतीकात्‍मक तस्‍वीर: GETTY)

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इस मामले में उस नौकरशाह और कॉलेज के पूर्व प्रमुख को आरोपी बनाया गया था. इस मामले की जांच में कई चौंकाने वाले खुलासे हुए. (प्रतीकात्‍मक तस्‍वीर: GETTY)

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मीडिया रिपोर्ट के अनुसार यह बात सामने आई कि इस यूनिवर्स‍िटी के प्रशासन द्वारा साल 2000 या उससे पहले से रिजल्‍ट में छेड़छाड़ की जाती थी. रिजल्‍ट में छेड़छाड़ से यूनिवर्स‍िटी के अध‍िकारियों का मकसद था कि कम से कम लड़कियों का एडमिशन इस कॉलेज में हो. (प्रतीकात्‍मक तस्‍वीर: GETTY)

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इस जांच में सामने आया कि पिछले साल इस कॉलेज ने एंट्रेस एग्‍जाम के पहले स्‍टेज में सभी कैंडिडेट के स्‍कोर में 20 प्रतिशत कम कर दिए. इसके बाद लड़कों के मार्क्‍स को 20 अंक बढ़ा दिया गया. मीडिया रिपोर्ट के अनुसार ऐसी हरकतें पिछले सालों में भी होने के सबूत मिले हैं. (प्रतीकात्‍मक तस्‍वीर: GETTY)

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मीडिया रिपोर्ट के अनुसार इस कॉलेज के अध‍िकारियों की सोच थी कि काफी कम लड़कियां ही डॉक्‍टर बन सके. उनकी सोच थी कि ज्‍यादातर लड़कियां प्रेग्‍नेंसी, मां बनने या दूसरी वजहों से कर‍ियर या पढ़ाई बीच में ही छोड़ देती हैं, ऐसे में उन्‍हें मौका देना भी बेकार है. (प्रतीकात्‍मक तस्‍वीर: GETTY)

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 यूनिवर्स‍िटी के एमडी टेटसूओ यूक‍ीओका ने कहा कि वह एंट्रेस एग्‍जाम से जुड़ी इस गलत हरकत के लिए माफी मांगते हैं, इस वजह से लोगों के विश्‍वास को चोट पहुंची है.

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टेटसूओ यूक‍ीओका ने पूर्व में भी महिलाओं से भेदभाव होने की जानकारी होने से इनकार किया है. हालांकि उन्‍होंने कहा कि उन्‍हें शक है कि पूर्व के प्रशासन में मॉर्डन सोसायटी के नियमों को लेकर संवेदना नहीं थी, जिसके अनुसार महिलाओं को भी सामान्‍य मौके मिलने चाहिए. (प्रतीकात्‍मक तस्‍वीर: GETTY)

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यूक‍ीओका ने कहा कि हां एडमिशन होने के बाद महिलाओं से भेदभाव नहीं होता था, लेकिन कुछ लोगों का मत था कि महिलाएं सर्जन बनने के योग्‍य नहीं होती. (प्रतीकात्‍मक तस्‍वीर: GETTY)

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कॉलेज प्रशासन द्वारा इस तरह हथकंडे अपनाने का असर यह हुआ कि साल दर साल एडमिशन पाने वाली महिलाओं की संख्‍या कम होती गई. जहां 2010 से पहले महिलाओं की संख्‍या लगभग 40 प्रतिशत थी. वहीं पिछले साल 141 पुरुषों के मुकाबले सिर्फ 30 महिलाओं का एडमिशन हो पाया था. (प्रतीकात्‍मक तस्‍वीर: GETTY)

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सबसे पहले इस रिपोर्ट को जापान के सबसे बड़े अखबार योमिरी शिमबन की ओर से जारी किया गया था. (प्रतीकात्‍मक तस्‍वीर: GETTY)

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कॉलेज प्रशासन ने वादा किया है कि अगले साल से एग्‍जाम पूरी तरह से फेयर और सही ढंग से करवाए जाएंगे.

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आपको बता दें कि 50 प्रतिशत से अध‍िक जापानी महिलाएं कॉलेज तक पढ़ी होती हैं. हालांकि व काम करने क्षेत्र में अभी भी महिलाओं से काफी भेदभाव किया जाता है.  (प्रतीकात्‍मक तस्‍वीर: GETTY)

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आधुनिक होने के बावजूद जापान में ज्‍यादातर लोगों का मत है कि महिलाएं घरेलू काम करने, बच्‍चे संभालने, बड़ों की देखभाल करने के लिए पैदा होत हैं. बाहर जाना और काम करना पुरुषों का काम है. (प्रतीकात्‍मक तस्‍वीर: GETTY)

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