समलैंगिकता को अपराध के तहत लाने वाली संविधान की धारा 377 की वैधता पर सुप्रीम कोर्ट में बुधवार को भी सुनवाई हो रही है. सुप्रीम कोर्ट ने आज केंद्र सरकार को इस मामले में अपना पक्ष रखने को कहा है. ऐसे में आइए जानते हैं कि अब तक किसी पार्टी या व्यक्ति का आईपीसी के सेक्शन 377 और एलजीबीटी समुदाय के अधिकारों को लेकर क्या पक्ष रहा है?
वर्तमान में बीजेपी केंद्र में सत्ता में है. पार्टी के रूप में बीजेपी का पक्ष सेक्शन 377 के समर्थन में रहा है. बीजेपी अध्यक्ष रहने के दौरान राजनाथ सिंह इस पर पार्टी की राय जाहिर कर चुके हैं. अपने बयान में राजनाथ सिंह ने कहा था कि पार्टी का मानना है कि समलैंगिगता अप्राकृतिक है और इसे अपराध की श्रेणी से बाहर नहीं किया जा सकता है.
वहीं बीजेपी के कुछ नेता जिसमें अरुण जेटली और पियूष गोयल शामिल हैं, वे एलजीबीटी समुदाय के अधिकारों का समर्थन करते हैं. 2013 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा 2009 के दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए पियूष गोयल ने कहा था कि मॉर्डन समय में सभी व्यक्ति को अपनी पसंद का अधिकार है और हमें उसका सम्मान करना चाहिए. मेरे अनुसार इन संबंधों में कुछ भी अप्राकृतिक नहीं है और कानून में जल्द से जल्द बदलाव होना चाहिए. वहीं अरुण जेटली ने भी कहा था कि सुप्रीम कोर्ट को दिल्ली हाई कोर्ट का फैसला नहीं पलटना चाहिए था और वह फैसला दुनियाभर में एलजीबीटी अधिकारों को लेकर कानूनी राय से मिलता हुआ नहीं था.
वहीं केंद्र सरकार ने अब इस मामले में अपना पक्ष रखते हुए कहा है कि सुप्रीम कोर्ट बच्चों के खिलाफ हिंसा और शोषण को रोकना सुनिश्चित करे. धारा 377 पर सुप्रीम कोर्ट अपने विवेक से फैसला ले. ऐसे में केंद्र सीधे तौर पर सेक्शन 377 के विरोध में कुछ नहीं कहा, लेकिन अपील की है कि समलैंगिकों के बीच शादी विवाह या लिव इन को लेकर सुप्रीम कोर्ट कोई फैसला ना दे.
कांग्रेस की बात करें तो जनवरी 2018 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा सेक्शन 377 पर दोबारा सुनवाई के लिए राजी होने पर पार्टी ने उस फैसला का स्वागत किया था. पार्टी प्रवक्ता मनीष तिवारी ने बयान दिया था कि कांग्रेस पार्टी की राय में सेक्शन 377 की 21वीं सदी में कोई जगह नहीं है, इस कानू को कोर्ट द्वारा हटा दिया जाना चाहिए या सरकार खुद इसे आईपीसी से बाहर कर दे. हालांकि कांग्रेस खुद सरकार में रहने के दौरान बच्चों के प्रति हिंसा को मुद्दा बनाते हुए इस धारा के पक्ष में खड़ी दिखाई देती रही है.
कांग्रेस के ही नेता शशि थरूर संसद में 2 बार एलजीबीटी के अधिकारों के लिए और सेक्शन 377 हटाने को लेकर प्राइवेट बिल ला चुके हैं. हालांकि दोनों बार उन्हें अपनी पार्टी का भी साथ नहीं मिला.
वहीं तृणमूल कांग्रेस पार्टी की प्रमुख ममता बनर्जी का मानना है कि इस मामले में राजनीतिक पार्टियों का नहीं आना चाहिए. हालांकि उनकी पार्टी के सांसद डेरेक ओ ब्रायन ने इस मामले में खुलकर एलजीबीटी समुदाय का पक्ष रखा है. अपने एक बयान में ब्रायन ने कहा था कि 2006 में उन्होंने अमृत्य सेन, विक्रम सेठ, श्याम बेनेगल और दूसरे लोगों के साथ मिलकर समलैंगिगता को अपराध की श्रेणी से बाहर करने पर बात कही थी और अब भी उसी राय पर कायम हूं.
लेफ्ट पार्टी CPI (M) की बृंदा कारात भी सुप्रीम कोर्ट द्वारा 2013 में दोबारा समलैंगिगता को अपराध घोषित करने के फैसले को गलत बताया था. उनके अनुसार समलैंगिगता को अपराध बताना गलत है.
वहीं समाजवादी पार्टी की राय सेक्शन 377 के पक्ष में है. पार्टी एक बार बयान जारी कर चुकी है कि संसद में सेक्शन 377 कानून में कोई अमेंडमेंट नहीं होने देगी और हर प्रस्ताव का विरोध करेगी.
जेडीयू का पक्ष सेक्शन 377 के खिलाफ है. जेडीयू का मानना है कि दिल्ली हाई कोर्ट का फैसला काफी प्रैक्टिकल था. उनके अनुसार जब लोगों को यह नैचुरल लगता है तो फिर सुप्रीम कोर्ट को इससे क्या दिक्कत है.
वहीं इस मामले में विश्व हिंदू परिषद का पक्ष सेक्शन 377 के समर्थन में है. 2013 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा समलैंगिगता को दोबारा अपराध की श्रेणी में लाने के फैसले पर वीएचपी ने अपना पक्ष रखा था कि कोर्ट ने वहीं किया जो इस देश की संस्कृति के अनुसार है.
वहीं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ समलैंगिगक रिश्तों को हमेशा से विरोध करता रहता है. हालांकि सेक्शन 377 पर बयान देते हुए सह सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबोले ने कहा था कि समलैंगिगता अपराध नहीं है. हालांकि ये समाजिक रूप से अनैतिक क्रिया है. उनको सजा नहीं साइकोलॉजिकल इलाज की जरूरत है. दत्तात्रेय होसबोले ने गे मैरेज के खिलाफ भी राय दी है.
इनके अलावा स्वामी रामदेव भी सेक्शन 377 के मुद्दे से जुड़े हुए हैं. बाबा रामदेव समलैंगिकता को बीमारी मानते है और साथ ही पारिवारिक व्यवस्था के खिलाफ मानते हैं. एक प्रेस कांफ्रेंस में योगगुरु ने समलैंगिक (गे) समुदाय को अपने आश्रम में आने का आमंत्रण दिया था और दावे के साथ कहा था कि वे उनकी समलैंगिकता को सही कर सकते हैं. रामदेव ने यह भी कहा कि समलैंगिकता जेनेटिक नहीं है. हमारे माता पिता समलैंगिक होते तो हमारा जन्म नहीं हुआ होता, इसलिए यह अप्राकृतिक है.
वहीं बीबीसी की रिपोर्ट के अनुसार 2009 के दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले का विरोध करते हुए जमायतुल- उलेमा- ए -हिंद के मौलाना अब्दुल हमीद नूमानी का कहना था कि चंद लोगों की चंद लम्हों की ख़ुशी के नाम पर अगर सदियों की परंपरा को यूँ ही कुर्बान कर दिया जाएगा तो कल समाज में और भी अराजकता फैलेगी.
वहीं कैथोलिक बिशप्स कॉफ्रेंस ऑफ़ इंडिया के फादर डोमिनिक इमैनुएल का कहना है, "समलैंगिकों को अपराधी नहीं मानते. लेकिन चर्च इस व्यवहार को उचित नहीं ठहरा सकती. यह प्राकृतिक या फिर नैतिक नहीं है."
एपॉस्टोलिक चर्चेज अलायंस के अनुसार बाइबल में समलैंगिकता को घृणास्पद माना गया है और इसे अपराध की श्रेणी से हटाने का अर्थ होगा इसे वैधता प्रदान करना.
वहीं आपको बता दें कि मंगलवार को पूर्व अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी याचिकाकर्ताओं की ओर से धारा 377 को हटाने के लिए पेश हुए. उन्होंने कहा, 'धारा 377 के होने से एलजीबीटी समुदाय अपने आप को अघोषित अपराधी महसूस करता है. समाज भी इन्हें अलग नजर से देखता है. यौन रुझान और लिंग (जेंडर) अलग-अलग चीजें हैं. यह केस यौन प्रवृत्ति से संबंधित है. इस केस में जेंडर का कोई लेना-देना नहीं है. यौन प्रवृत्ति का मामला पसंद से भी अलग है. यह प्राकृतिक होती है. यह पैदा होने के साथ ही इंसान में आती है. पश्चिमी दुनिया में इस विषय पर शोध हुए हैं. इस तरह की यौन प्रवृत्ति के कारण वंशानुगत होते हैं. धारा 377 'प्राकृतिक' यौन संबंध के बारे में बात करती है. समलैंगिकता भी प्राकृतिक है, यह अप्राकृतिक नहीं है.'
इसके अलावा अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने समलैंगिकता के मुद्दे से जुड़ी विभिन्न याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले की रिव्यू याचिका की सुनवाई से खुद को अलग कर लिया. बता दें कि अटॉर्नी जनरल की जगह मंगलवार को अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सरकार का पक्ष रखा. केके वेणुगोपाल ने कहा है कि उनकी राय इस मामले में केंद्र सरकार से अलग है, इसलिए वह इस मामले की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट में सरकार की ओर से पेश नहीं होंगे.
वहीं बुधवार को हो रही सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट में चीफ जस्टिस की अध्यक्षता में संविधान पीठ ने संकेत दिए हैं कि दो वयस्कों के बीच आपसी सहमति के आधार पर समलैंगिक संबंधों को अपराध की श्रेणी से बाहर किया जा सकता है.
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी से बाहर कर देने के बाद एलजीबीटी समुदाय के लोग बिना किसी परेशानी, संकोच के चुनावों में हिस्सा ले सकेंगे.(ALL PHOTOS: Getty)