भारत के ठगों को उनके खूंखार और रक्तरंजित इतिहास के लिए जाना जाता है. हालांकि ठगों से जुड़ी कई बातें हैं जो आज भी लोगों को नहीं मालूम हैं.
ठगों का इतिहास सैंकड़ों वर्षों का है. माना जाता है कि ठगों का उन्मूलन करने वाले कर्नल स्लीमन ने सन 1820 तक ठगों का लगभग नामोनिशान मिटा दिया था. हालांकि कई इतिहासकार इससे सहमति नहीं जताते हैं और मानते हैं कि अंग्रेजों ने बस ठगी को अंडरग्राउंड करने में ही सफलता पाई.
आपको बता दें कि ठगों द्वारा सैंकड़ों साल तक परंपरा जीवित रखने के पीछे एक
वजह यह भी है कि ठगों ने जो गिरोह बनाया वह सामाजिक नियमों, धर्मों की
परवाह नहीं करता था. यही वजह है कि ठगी गिरोह में हिंदू भी होते थे,
मुस्लिम भी और कई बार सिख भी. बेहराम, अामिर अली जैसे कई ठगों ने समय समय
पर अपने गिरोहों को लीड किया.
खास बता यह थी कि इन ठगों के अपने नियम कानून होते थे. ठग मानते थे कि उन्हें माता काली द्वारा धरती में लोगों का संहार करने भेजा गया है.
हिंदू हो या मुस्लिम ठगी गिरोह के सदस्य मां काली की पूजा करते थे.
कोई भी मिशन शुरू होने या उसके फेल या पास होने दोनों पर गिरोह के सदस्य मां काली की पूजा करते थे और उन्हें बलि चढ़ाते थे.
उनका मानना था कि मां काली ने उन्हें खून न गिराने की जगह रुमाल से हत्या करने को भेजा है...
दक्षिण और मध्य भारत के तमाम यात्री उत्तर भारत की ओर जाते थे. इस क्षेत्र में बसे ठग और पिंडारी अक्सर उन्हें लूट लेते थे और कई लोगों की हत्या भी कर देते थे.
इन ठगों पर लगाम कसने के लिए ब्रिटिश सरकार ने एक विशेष पुलिस दस्ता तैयार किया जिसकी कमान कर्नल हेनरी विलियम स्लीमन को सौंपी गयी.
जबलपुर में थाने के परिसर में बना चार कोनों वाला ऊंचा स्मारक कर्नल स्लीमन की जीवनगाथा की गवाही देता है. चारदीवारी से सटा पीपल का विशाल वृक्ष भी है, कहा जाता है कि इसी पर ठगों को लटका कर फाँसी दी जाती थी.
आपको बता दें कि ठगों की भाषा रामासी थी. जो गुप्त और सांकेतिक थी. इनके पास तपौनी का गुड़, रूमाल और कुदाली प्रमुख होता था. ठग अपने शिकार को बनिज कहते थे, जिनका रूमाल से गला घोंट दिया जाता था. ठग काली के उपासक थे, जिसमें मुस्लिम ठग भी शामिल थे.
1839 में फिलिप मीडोज टेलर की बुक कन्फेशंस ऑफ ए ठग से ठगी प्रथा का पता चला. ठग बेहराम ने 931 और आमिर अली ने 700 से ज्यादा हत्याएं की थी.
आपको बता दें कि कई भारतीय इतिहासकार मानते हैं कि अंग्रेजों ने उन लोगों को ठगी केस में डाल दिया था जो उनके शासन का विरोध करते थे.
ठग काफी शातिर तरीके से अपने शिकार पर हमला करते थे. वे शिकार की हत्या कर लाश को दफना, नदी में फेंक या सूखे कुंए में डाल देते थे.
आपको बता दें कि अपने शिकार का काम तमाम करने के बाद ठग मौका-ए-वारदात पर ही जश्न मनाते थे. मां काली की पूजा करते और जश्न के तौर पर जिस जगह मारे गये लोगों की कब्रगाह बनाई जाती थी उसके पहले नाच-गाना करते. गाने-बजाने से जब थक जाते तो कब्रगाह के ऊपर बैठकर ही वो गुड़ खाते थे. इसे ‘तपोनी’ यानि कब्रगाह का गुड़ कहते थे.