यूएस और ईरान के बीच मौजूदा तनाव में दुनिया की बड़ी आबादी वाले मुस्लिम देश भी आमने-सामने हैं. मुस्लिम बहुल सऊदी अरब, यूएई और बहरीन भी ईरान के खिलाफ यूएस के साथ खड़े हैं. सऊदी अरब तो ईरान के खिलाफ यूएस की आक्रामक कार्रवाई चाहता है.
2003 में इराक के तानाशाह सद्दाम हुसैन के सत्ता से बाहर होने के बाद सऊदी अरब और ईरान के बीच क्षेत्रीय वर्चस्व की लड़ाई तेज हो गई थी और दोनों देश एक-दूसरे के खिलाफ प्रॉक्सी का इस्तेमाल करते हैं. रियाद को डर है कि शिया शासित ईरान उसके साम्राज्य के शिया समुदाय के बीच अशांति पैदा करने की कोशिश कर रहा है और तेहरान का यमन में हूती विद्रोहियों को समर्थन देना उसकी इसी रणनीति का हिस्सा है.
नादेर हाशमी और डैनी पोस्टल ने अपनी किताब 'सेक्टैरियनाइजेशन: मैपिंग द न्यू पॉलिटिक्स ऑफ द मिडिल ईस्ट' में शिया-सुन्नी के बीच नफरत की रट लगाने वाले राजनीतिज्ञों, पत्रकारों और विशेषज्ञों की टिप्पणियों को एक साथ पेश किया है. उदाहरण के तौर पर, यूएस सीनेटर टेड क्रूज ने कहा था कि शिया-सुन्नी के बीच संघर्ष 632 ईस्वी से ही शुरू हो गया था इसलिए 1500 साल पुराने धार्मिक संघर्ष के लिए अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा को जिम्मेदार ठहराने से बड़ी मूर्खता और कुछ नहीं हो सकती है.
यूएस सीनेट के नेता मिच मैककोनेल ने भी कहा था कि अरब जगत में जो कुछ भी हो रहा है, वह धार्मिक संघर्ष है जो हजार सालों से चला आ रहा है. यूएस मध्यपूर्व एशिया में शांतिदूत और पूर्व सीनेटर ने भी मध्य-पूर्व एशिया के पीछे यही मंत्र दोहराया था- पैगंबर मोहम्मद की मौत के बाद शुरू हुई राजनीतिक वर्चस्व की लड़ाई के बाद शिया-सुन्नी में विवाद शुरू हो गया था जो आज भी पूरी दुनिया में चल रहा है. इराक, सीरिया और दूसरे देशों में भी यह एक बड़ा फैक्टर है. न्यू यॉर्क टाइम्स के लेखक थॉमस फ्राइटमैन भी कहते हैं कि मध्य-पूर्व एशिया में मुख्य मुद्दा यही है कि 7वीं शताब्दी में पैगंबर मोहम्मद की मौत के बाद सही उत्तराधिकारी कौन है- शिया या सुन्नी.
इसमें कोई शक नहीं है कि मध्य-पूर्व एशिया में संघर्ष की गहरी ऐतिहासिक जड़ें रही हैं. पैगंबर मोहम्मद की मौत के बाद यह विवाद शुरू हो गया था कि उनका असली उत्तराधिकारी कौन है और यह सवाल ही संघर्ष का मूल केंद्र बन गया. लेकिन अतीत को वर्तमान के संघर्ष से जोड़ना क्या सही है: क्या इराक, सीरिया, यमन और लेबनान के मुसलमान आज भी अपने धार्मिक विश्वास और मतभेद की वजह से लड़ रहे हैं? जवाब है- नहीं.
मध्य-पूर्व एशिया की भू-रणनीतिक और राजनीतिक तस्वीर के पीछे धर्म एक छोटा सा कारण है. अगर शिया और सुन्नी के बीच यह विवाद सुलझ गया होता कि पैगंबर मोहम्मद का असली उत्तराधिकारी कौन है तो सीरिया या यमन में खूनी संघर्ष रुक नहीं गया होता. मध्य-पूर्व एशिया में संघर्ष को 7वीं शताब्दी के धार्मिक मतभेद के चश्मे से देखना बहुत ही सरल विश्लेषण है.
कई उदाहरण इस बात को साबित करने के लिए काफी है. पत्रकार जमाल खाश्गोजी की निर्मम हत्या की हर तरफ आलोचना हुई. खाशोग्जी भी सुन्नी मुसलमान था और उसकी हत्या करने वाले भी सुन्नी. तुर्की जिसे देश में उसकी हत्या हुई और जिसने हत्या की जानकारी देने में भूमिका निभाई, वह भी सुन्नी बहुल देश है. सऊदी अरब ने 2017 में लेबनान के प्रधानमंत्री को हिरासत में लिया था, वह भी सुन्नी थे. सऊदी-जॉर्डन तनाव, अल्जीरियन-मोरक्को, सऊदी-कतर, अफ्रीका की सींग कहे जाने वाले देशों में सऊदी अरब, कतर और यूएई के बीच वर्चस्व की लड़ाई में शियाओं का दूर-दूर तक वास्ता नहीं है. कुर्द के खिलाफ तुर्क का कैंपेन भी सुन्नियों के बीच का ही मामला है.
शिया-सुन्नी के बीच प्रतिस्पर्धा को 21वीं शताब्दी के असफल राज्यों या असफल होने की तरफ बढ़ रहे राज्यों में राजनीतिक, राष्ट्रीय और भू-रणनीतिक दुश्मनी के नजरिए से देखना होगा.
मध्य-पूर्व एशिया में संघर्ष की जड़ केवल इस्लामिक विचारधारा में नहीं बल्कि आधुनिक राष्ट्रवाद में है. शिया-सुन्नी का संघर्ष ईरान और सऊदी अरब के बीच छद्म युद्ध में तब्दील हो चुका है. सऊदी अरब और ईरान के राष्ट्रवादी नेता अपनी रणनीतिक दुश्मनी उन क्षेत्रों में दिखा रहे हैं जहां की सरकारें असफल हो गई है. धर्म की आड़ में राजनीतिक वर्चस्व की लड़ाई लड़ी जा रही है.
इतिहास में शिया और सुन्नी का अस्तित्व एक साथ रहा है. दोनों पंथों के डीएनए में संघर्ष नहीं है और युद्ध उनकी नियति नहीं है. ईरान और सऊदी अरब के बीच भी राष्ट्रवादी दुश्मनी दिखाई पड़ती है. तेहरान और रियाद के बीच क्षेत्रीय संघर्ष शुरुआत से नहीं रहा है. 1970 में मिस्त्र के राष्ट्रवादी गणराज्य के खिलाफ ईरान और सऊदी अरब के राजतंत्र एक साथ खड़े थे.
कुल मिलाकर, सुन्नी और शिया कोई धार्मिक युद्ध नहीं लड़ रहे हैं. ईरान और अरब का राष्ट्रवाद क्षेत्रीय दुश्मनी में तब्दील हो चुका है, खासकर सीरिया और इराक में जहां सरकारी तंत्र ढह गया.
पश्चिमी देश के विश्लेषक अक्सर मध्य-पूर्व देशों के बीच संघर्ष की वजह राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक पहलू पर ध्यान दिए बिना इस्लाम को बता देते हैं जबकि ये सच नहीं है.