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इन कमांडो से थरथर कांपते हैं नक्‍सली, अब मोदी सरकार ने की तारीफ

अंकुर कुमार
  • 24 अगस्त 2018,
  • अपडेटेड 3:15 PM IST
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मोदी सरकार नक्‍सल‍ियों के ख‍िलाफ अभ‍ियान को लगातार तेज कर रही है. पीएम भी अपने कई भाषण में कई इलाकों को नक्‍सल‍ियों के कब्‍जे से मुक्‍त करने का दावा भी कर चुके हैं. ऐसे में केंद्र सरकार ने नक्सल प्रभावित राज्यों के पुलिस डिपार्टमेंट के ह‍ेड और केंद्रीय अर्द्धसैनिक बलों के डीजी को महाराष्ट्र की C-60 कमांडो की तर्ज की तरह स्किल्स डेवलप करने को कहा है. (फाइल फोटो)

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आपको बता दें कि C-60 कमांडो पुलिस विभाग के सबसे बेहतरीन कमांडो में गिने जाते हैं.  कई बार इन्‍होंने अपने साहसिक अभ‍ियानों से सुर्ख‍िया बटोरी हैं. ऐसे में केंद्र सरकार भी इनसे प्रभावित है और चाहती है कि दूसरे राज्‍य भी इन जैसी स्‍पेशल यूनिट को तैयार करे और उनको भी बेहतरीन ट्रेनिंग दे. (फाइल फोटो)

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C60 कमांडोज महाराष्ट्र पुलिस की खास फोर्स है जिसे नक्सिलयों से लड़ने के लिए खास तरीके से प्रशिक्षित किया गया है. इंडिया टुडे इन कमांडोज के काम करने के तरीके और उनके अभियान पर होने के दौरान आने वाली दिक्कतों पर रिपोर्ट कर चुका है. (फाइल फोटो)

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उस रिपोर्ट के अनुसार इस कमांडोज यूनिट को गढ़चिरौली पुलिस विभाग के तत्‍कालीन एसपी केपी रघुवंशी के नेतृत्‍व में 1992 में तैयार किया गया था. गढ़चिरौली में स्थानीय लोगों में से जवानों को चुना गया था. स्‍थानीय भाषा और इलाकों की समझ होने की वजह से यह कमांडों काफी उपयोगी साबित होते हैं.  (फाइल फोटो)

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शुरुआत में C60 कमांडोज यूनिट में 60 जवान होते हैं. अब मीडिया रिपोर्ट के अनुसार गढ़चिरौली में 800 जवानों की 24 यूनिट है. ज्‍यादातर जवान स्‍थानीय इलाकों से चुने जाते हैं. महाराष्ट्र का बड़ा हिस्सा भी नक्सल प्रभावित क्षेत्र में आता है. इन नक्सलियों से लड़ने और उन पर नकेल कसने के लिए महाराष्ट्र में यहखास तरह की फोर्स है जिसके काम करने का अपना अलग ही अंदाज है. (फाइल फोटो)

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इन कमांडोज ने अप्रैल में दो अलग-अलग मुठभेड़ में 39 नक्सलियों को मार गिराया था. खासबात यह थी कि इस अभियान में C60 कमांडोज यूनिट को कोई नुकसान नहीं पहुंचा था. इस यूनिट का स्‍लोगन वीरभोग्‍या वसुंधरा है. (फाइल फोटो)

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इस यूनिट में तैनात एक कमांडो अपने अभियान पर निकलने के दौरान पीठ पर करीब 15 किलो वजन का सामान भी ढोता है, जिसमें हथियार, खाना, पानी, रोजाना इस्तेमाल की चीजों के अलावा फर्स्ट एड जैसी जरूरी चीजें शामिल होती हैं. (फाइल फोटो)

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हर सुबह फोर्स खुफिया सूत्रों से मिली जानकारी के आधार पर आगे की रणनीति बनाती है और उसी के आधार पर आसपास के क्षेत्र में अपनी योजना को अंजाम देते हैं. सब डिविजनल पुलिस ऑफिसर (SDPO) ऑपरेशंस के बारे में कमांडोज को बालू पर मॉडल बनाकर अगली रणनीति की जानकारी देते हैं. (फाइल फोटो)

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इसके बाद 2 ग्रुपों में 30-30 कमांडोज बंट जाते हैं, जिसमें से एक ग्रुप अपने पोस्ट से फ्रंट गेट से आगे बढ़ता है, जबकि दूसरा ग्रुप पीछे से निकलता है. ऐसा इसलिए किया जाता है ताकि क्षेत्र में कितने कमांडोज हैं, इसका पता न लग सके. (फाइल फोटो)

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दोनों टीमें अलग-अलग दिशा से जंगल में प्रवेश करती हैं और फिर करीब एक किलोमीटर अंदर जाकर मिल जाती हैं. गढ़चिरौली महाराष्ट्र का वो क्षेत्र है जो नक्सल से सबसे ज्यादा प्रभावित है. यहां के घने जंगलों में हर महीने एक-दो काउंटर होते ही रहते हैं. माओवादी घात लगाकर हमला करने के अलावा जवानों को अपना शिकार बनाने के लिए लैंडमाइंस और विस्फोटक लगाते हैं. (फाइल फोटो)

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नक्सली समस्या से देश के कई राज्य पीड़ित हैं, और वे अपने-अपने स्तर पर इस पर काबू पाने की कोशिशों में जुटे भी हैं. आपको बता दें कि तेलंगाना और आंध्रप्रदेश में ग्रेहाउंड्स तथा ओडिशा में स्पेशल ऑपरेशंस ग्रुप हैं, हालांकि ये सब राज्‍य स्‍तर के हैं. गढ़चिरौली इलाका काफी नक्‍सल प्रभावित होने की वजह से यहां जिला स्‍तर पर इस शक्‍त‍िशाली यूनिट का गठन किया गया था.  (फाइल फोटो)

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C60 कमांडोज पूरी तरह से अत्याधुनिक तकनीक से लैस हैं, गढ़चिरौली पुलिस के पास 4 स्पेशलिस्ट ड्रोन है जिसके पास 4 हजार गुना हाई डिफिनेशन (HD) की इमेज रिजोल्यूशन की क्षमता है. इसका इस्तेमाल गश्त लगाने के दौरान जमीनी हकीकत का पता लगाने के लिए किया जाता है. ड्रोन बेहद धीमी आवाज में उड़ान भर सकता है जिससे माओवादियों को पता न लगे और 500 मीटर ऊंचाई तक की तस्वीरें भी निकाल सकता है. यह कमांडोज गुरिल्ला युद्ध से भी ट्रेंड होते हैं.  (फाइल फोटो)

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इंडिया टुडे की विशेष रिपोर्ट के दौरान बातचीत में SDPO शिवपुजे ने कहा था कि ड्रोन किसी संदेहास्पद हरकत के बारे में भी पता लगा सकता है. इसका ज्यादातर प्रयोग खुफिया से मिली जानकारी पर अमल के दौरान किया जाता है." कमांडोज के पास एक अन्य आधुनिक तकनीक GPS की भी सुविधा मौजूद है. C60 कमांडोज GPS के इस्तेमाल के बारे में बताते हैं कि हम गश्त पर निकलने से पहले GPS सेट करते हैं. घने जंगलों में सही दिशा में जा पाना बेहद मुश्किल होता है, इसलिए ये हमारे लिए कारगर होते हैं.  (फाइल फोटो)

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ये कमांडोज जनजातीय गांवों में अपनी पहुंच बनाए रखते हैं क्योंकि माओवादी भी स्थानीय लोगों के सहयोग के बिना कुछ भी नहीं कर सकते. इसलिए कमांडोज की कोशिश रहती है कि माओवादी और जनजातीय लोगों के बीच दूरी बनाई रखी जाए. (फाइल फोटो)

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कमांडोज अपने सफर के दौरान घने जंगल, नदियां और पहाड़ी आदि का सामना करते हैं. गश्त के दौरान वे अपने साथ खाने की सूखी चीजें साथ रखते हैं. किसी निर्धारित और सुरक्षित जगह पर मिलकर खाना पकाते हैं. खाना पकने के दौरान कुछ कमांडोज पानी लेने के लिए भी निकलते हैं. ये कमांडोज 14 किलो का सामान पीठ पर रखते हैं, इसलिए कोशिश होती है कि ज्यादा पानी साथ में न हो. अपने गश्त के दौरान नाला, कुआं और नदी का पानी पीने से कमांडोज को डीहाइड्रैशन और पेट दर्द जैसी कई दिक्कतें हो जाती हैं. गरमी के सीजन में अतिसूक्ष्म जीव काफी परेशान करते हैं. इस दौरान हमें मच्छरों और सांपों जैसे कई खतरनाक जीवों से भी बचना होता है.  (फाइल फोटो)

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गश्त के दौरान इन जवानों की जिंदगी एक तरफ जंगल में मौजूद जीव-जंतुओं से घिरी रहती है तो दूसरी तरफ माओवादियों के आक्रमण का भी खौफ बना रहता है. 2009 में मुम्नेर गांव में इस यूनिट पर माओवादियों ने घात  लगाकर हमला बोल दिया, 30 में से 3 लोगों की मौत हो गई, जबकि 5 से 6 लोग घायल हो गए. (फाइल फोटो)

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आपको बता दें कि C60 कमांडोज के अलावा नक्‍सलियों के ख‍िलाफ कोबरा बटालियन और 'बस्तरिया बटालियन' भी प्रमुख हैं. (फाइल फोटो)

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