अक्सर हम किसी ऐतिहासिक स्मारक या पहाड़ की खूबसूरती देखने के लिए दिन का उजाला चुनते हैं, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि रात के घने अंधेरे में वही जगह कैसी लगती होगी? जरा सोचिए आप दिल्ली की कुतुब मीनार के पास खड़े हैं, चारों तरफ सन्नाटा है, पुरानी इमारतों के खंडहरों पर पीली रोशनी चमक रही है और ऊपर आसमान से कोई हवाई जहाज एक टिमटिमाती लकीर की तरह गुजर रहा है.
उस पल में वो जानी-पहचानी जगह भी एकदम जादुई और रहस्यमयी लगने लगती है. असल में, यह सिर्फ एक नजारा नहीं है, बल्कि यह उस सुकून की शुरुआत है जिसे आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में हर कोई ढूंढ रहा है. यही वजह है कि अब भारतीय सैलानी चिलचिलाती धूप और शोर-शराबे वाली भीड़ को पीछे छोड़कर रात के सन्नाटे में खुद को तलाश रहे हैं. इसे नाम दिया गया है 'नोक्टोटूरिज्म'.
'नोक्टोटूरिज्म' क्या है?
सीधे शब्दों में कहें तो 'नोक्टोटूरिज्म' का मतलब है रात का पर्यटन. इसमें चकाचौंध वाली लाइटों से दूर, तारों को निहारना, रात के अंधेरे में जंगलों की सफारी करना या ऐसी जगहों पर वक्त बिताना शामिल है जहां रोशनी बहुत कम हो. 'Booking.com' की एक ताजा रिपोर्ट की मानें तो साल 2025 में यह शब्द ट्रैवल की दुनिया का सबसे बड़ा बजवर्ड बनने वाला है.
आंकड़े बताते हैं कि दुनिया भर के करीब 62% यात्री अब ऐसी जगहों पर जाने का मन बना रहे हैं जहां का आकाश साफ हो और रातें गहरी हों. भारत में भी ये क्रेज सिर चढ़कर बोल रहा है. एक सर्वे के मुताबिक, 78% भारतीयों ने इस साल रात के पर्यटन में गहरी दिलचस्पी दिखाई है. लद्दाख के हानले में बने डार्क स्काई रिजर्व से लेकर रात के सन्नाटे में होने वाली जंगल सफारी तक, अब लोग अंधेरे से डरने के बजाय उससे दोस्ती कर रहे हैं.
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रात की खामोशी में छिपा है मानसिक शांति का राज
अब आप सोच रहे होंगे कि आखिर रात की इस सैर में ऐसा क्या खास है? दरअसल, इसके पीछे एक गहरा मनोवैज्ञानिक और वैज्ञानिक कारण है. दिनभर हमारा दिमाग शोर, ट्रैफिक और काम के दबाव में फाइट या फ्लाइट (लड़ो या भागो) मोड में रहता है. साइकोलॉजिस्ट मेहेजेबिन दोरदी के मुताबिक, रात के शांत और कम रोशनी वाले माहौल में हमारे दिमाग पर संवेदी दबाव कम हो जाता है. इससे हमारा नर्वस सिस्टम रिलैक्स होता है और शरीर में कोर्टिसोल (स्ट्रेस हार्मोन) का स्तर गिर जाता है. अंधेरा हमें बाहरी दुनिया के दिखावे से काटकर खुद के भीतर झांकने का मौका देता है. यही वजह है कि रात के वक्त हम ज्यादा दार्शनिक, भावुक और खुद के प्रति जागरूक महसूस करते हैं.
ओवरथिंकिंग का रीसेट बटन है रात का आसमान
हम में से ज्यादातर लोग ओवरथिंकिंग यानी जरूरत से ज्यादा सोचने की बीमारी से परेशान हैं. मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि रात का पर्यटन इस मानसिक चक्र को तोड़ने का काम करता है. जब आप रात के ठंडे माहौल में बाहर निकलते हैं, तो ठंडी हवा और प्रकृति की धीमी आवाजें आपके दिमाग के लिए एक रीसेट बटन की तरह काम करती हैं. विशेषकर स्टार गेजिंग यानी तारों भरे आसमान को देखना एक अद्भुत अनुभव है. बचपन में जैसे हम तारे गिना करते थे, वही एहसास हमें बड़े होकर एक बड़े परिप्रेक्ष्य से जोड़ता है. जब हम उस अनंत ब्रह्मांड को देखते हैं, तो हमारी रोजमर्रा की छोटी-छोटी चिंताएं और परेशानियां अचानक बहुत छोटी लगने लगती हैं. यह अनुभव हमारे भीतर कृतज्ञता जगाता है और हमें मानसिक रूप से शांत करता है.
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मजे के साथ सावधानी भी है जरूरी
इसमें कोई दोराय नहीं कि रात का सफर एक अलग ही दुनिया में ले जाता है, लेकिन कुछ बातों का ध्यान रखना भी जरूरी है. अगर रात में घूमने की वजह से आपकी नींद का रूटीन पूरी तरह बिगड़ रहा है या आप सुरक्षा को नजरअंदाज कर रहे हैं, तो यह सुकून देने के बजाय आपको थका सकता है. इसलिए, नोक्टोटूरिज्म का असली मजा तभी है जब इसे पूरी जिम्मेदारी और प्लानिंग के साथ किया जाए. दिन की चकाचौंध से दूर, रात का यह सन्नाटा दरअसल एक सेंसरी थेरेपी की तरह है जो हमारी रचनात्मकता को बढ़ाता है और हमें एक नई ताजगी से भर देता है.
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