रणभूमि से टूरिस्ट स्पॉट बना द्रास, -40° की ठंड और 72 फीट ऊंचा तिरंगा, घूम आएं इस बार

भारत की सरहद पर बसा द्रास सिर्फ एक जगह नहीं, बल्कि शौर्य और बलिदान की जीती-जागती मिसाल है. 77वें गणतंत्र दिवस पर द्रास की यह कहानी उस जज्बे को बयां करती है, जिसने कुदरत की हर जिद को मात देकर तिरंगे की शान को हमेशा ऊंचा रखा है.

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द्रास की चोटियों पर लहराता 72 फुट ऊंचा गौरव (Photo: incredibleindia.gov.in) द्रास की चोटियों पर लहराता 72 फुट ऊंचा गौरव (Photo: incredibleindia.gov.in)

aajtak.in

  • नई दिल्ली ,
  • 14 जनवरी 2026,
  • अपडेटेड 6:02 PM IST

भारत की सरहद पर एक ऐसी जगह है, जिसका नाम सुनते ही हर हिंदुस्तानी का सिर गर्व से ऊंचा हो जाता है. यह वही रणभूमि है जिसने 1999 में दुनिया को भारत के पराक्रम का असली चेहरा दिखाया था. इस बार जब देश अपना 77वां गणतंत्र दिवस मना रहा है, तब हिमालय की उन दुर्गम चोटियों के बीच तिरंगा एक बार फिर पूरी शान से लहराने को तैयार है. यहां कुदरत अपनी जानलेवा ठंड से एक कठिन परीक्षा लेती है, लेकिन सरहद पर तैनात जांबाजों का जोश हर बार इस बर्फीली जिद को मात दे देता है. यह कहानी उस अजेय जज्बे की है, जहां हाड़ कंपा देने वाले मौसम पर भी देशभक्ति का जुनून भारी पड़ता है. हम बात कर रहे हैं लद्दाख के कारगिल जिले में स्थित 'द्रास' (Dras) की, जिसे भारत का सबसे ठंडा और दुनिया का दूसरा सबसे ठंडा बसा हुआ इलाका कहा जाता है. तो चलिए जानते हैं इस ऐतिहासिक रणभूमि की शौर्य गाथा...

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लगभग 10,800 फीट की ऊंचाई पर बसे द्रास के इस दुर्गम इलाके में भारतीय सेना ने एक 72 फुट ऊंचा विशाल राष्ट्रीय ध्वज स्थापित किया है. सामरिक नजरिए से बेहद महत्वपूर्ण इस स्थान पर गणतंत्र दिवस मनाना, दुनिया को भारत की अटूट शक्ति का संदेश देना है. यहां सर्दियों में तापमान -40°C तक गिर जाता है, इस कदर जम देने वाली ठंड के कारण ही यह इलाका दुनिया के सबसे ठंडे बसे हुए स्थानों में गिना जाता है. जानलेवा ठंड और ऑक्सीजन की कमी के बावजूद, जब यह विशाल तिरंगा पहाड़ों की चोटियों के बीच लहराता है, तो वह हर भारतीय के मन में सुरक्षा और सम्मान का भाव भर देता है.

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जहां पत्थर भी बोलते हैं शौर्य की गाथा

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गणतंत्र दिवस का मुख्य समारोह द्रास वॉर मेमोरियल के पास आयोजित होता है, जो 'ऑपरेशन विजय' की ऐतिहासिक जीत का प्रतीक है. आज जब हम चैन की सांस लेते हैं, तो यह जगह याद दिलाती है कि 1999 में हमारे सैनिकों ने किन परिस्थितियों में लड़ाई लड़ी थी. उस दौरान भीषण ठंड और दुर्गम पहाड़ियों पर चढ़ाई करना नामुमकिन जैसा था, लेकिन जवानों ने तिरंगे की आन पर आंच नहीं आने दी. आज यहां गणतंत्र का जश्न उन शहीदों को एक सच्ची श्रद्धांजलि है, जिन्होंने देश की मिट्टी के लिए अपना सर्वोच्च बलिदान दिया. उनकी शहादत ही है कि आज इस रणभूमि में लोकतंत्र का उत्सव इतनी शान से मनाया जा रहा है.

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रणभूमि से पर्यटन की नई मिसाल तक

कभी युद्ध के मैदान के रूप में पहचाना जाने वाला यह इलाका आज सैलानियों की पहली पसंद बन चुका है. द्रास का इतिहास अब केवल युद्ध तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक बड़े टूरिस्ट डेस्टिनेशन के रूप में उभरा है. दूर-दूर से लोग यहां टाइगर हिल की चोटियों को देखने और वॉर मेमोरियल पर शहीदों को नमन करने पहुंचते हैं. युद्ध के बाद यहां की अर्थव्यवस्था पूरी तरह से पर्यटन पर टिक गई है. द्रास की यह बदली हुई तस्वीर बताती है कि जहां वीरता और बलिदान की नींव गहरी हो, वहां समय के साथ गौरव और विकास की नई इबारत लिखी जाती है.

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कैसे पहुंचें द्रास?

अगर आप इस रोमांचक जगह को देखना चाहते हैं, तो सबसे आसान तरीका हवाई मार्ग है. सबसे नजदीकी हवाई अड्डा लेह एयरपोर्ट है, जो बड़े शहरों से जुड़ा हुआ है. लेह से आप टैक्सी के जरिए 140 किलोमीटर का सफर तय करके 4-5 घंटे में द्रास पहुंच सकते हैं. इसके अलावा आप श्रीनगर से भी सड़क मार्ग के जरिए यहां पहुंच सकते हैं, जहां से सरकारी और प्राइवेट बसें आसानी से उपलब्ध हैं.

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