कभी-कभी नाम ही काफी होता है. भारत vs पाकिस्तान T20 वर्ल्ड कप मुकाबले के लिए स्टार स्पोर्ट्स ने एक इन्फ्लुएंसर को प्रोमो का चेहरा बनाया- नाम है फुकरा इंसान. दिक्कत यह है कि जब आप ‘फुकरे’ को हायर करते हैं, तो विज्ञापन भी ‘फुकरा’ ही बनता है- भद्दा, बेस्वाद और बेमानी. लगता है मानो क्रिएटिव टीम ने शब्द का अर्थ शब्दकोश से उठाकर सीधे स्क्रीन पर उतार दिया हो.
फुकरा इंसान, जो यूट्यूब पर रिएक्शन वीडियो के लिए जाने जाते हैं, दूसरों के पलों को उधार लेकर उन्हें अपने चेहरे और हाव-भाव से 'कंटेंट' बना देने में माहिर हैं. लेकिन दुनिया की सबसे बड़ी क्रिकेटीय प्रतिद्वंद्विता को महज लिफ्ट में बनावटी मुस्कान और तंज तक समेट देना- यह रचनात्मकता नहीं, आलस्य है.
प्रतिद्वंद्विता का ट्रोल, या ट्रोल की प्रतिद्वंद्विता?
भारत-पाकिस्तान मुकाबले के प्रोमो में ICC नॉकआउट में भारत के 8-1 के रिकॉर्ड को ऐसे परोसा गया, मानो यही पूरी कहानी हो. आंकड़ा बिल्कुल सही है, इसमें कोई दो राय नहीं. लेकिन सच होना ही पर्याप्त नहीं होता- रचनात्मक होना भी जरूरी है. यही सबसे आसान, सबसे सुरक्षित और सबसे आलसी रास्ता था. जरा सोचिए, आपके सामने दुनिया की सबसे रोमांचक और सबसे ज्यादा देखी जाने वाली क्रिकेटीय प्रतिद्वंद्विता का कैनवास हो, और आप उसी पुराने, घिसे-पिटे आंकड़े पर आकर ठहर जाएं. यह कल्पना की कमी नहीं तो और क्या है?
फैन्स 'अहा' सुनना चाहते हैं, 'अरे ये तो सबको पता है...' वाला जंभाई नहीं.यानी कुछ ऐसा तो दीजिए जो फैन्स के मुंह से 'वाह!' निकलवा दे...न कि ऐसा जिसे देखकर वे ऊब जाएं, क्योंकि वही आंकड़े फिर परोसे जा रहे हैं जो हर किसी को पहले से याद हैं.
2007 का फाइनल याद है...वह पल जब कमेंट्री गूंजी थी, 'इन द एयर… और श्रीसंत ने कैच पकड़ लिया!? सोचिए, जिस बल्लेबाज ने वह दिल-दहला देने वाला स्कूप खेला था, उसे सालों तक किस तरह ट्रोल किया गया? बस एक लाइन-'मिस्बाह, पांच रन.'
यही तो असली ट्रोलिंग की कला है- एक पल, एक वाक्य.न लंबी स्कोरलाइन, न बनावटी मुस्कान वाला इन्फ्लुएंसर. बस एक छोटी-सी लाइन- मिस्बाह, पांच रन'- जो बीस साल बाद भी एक पूरे देश के दिल टूटने की टीस को ताजा कर दे.
पाकिस्तान क्रिकेट ने भारतीय फैन्स को असली ड्रामा दिया है. वसीम अकरम और वकार यूनुस की स्विंग,जावेद मियांदाद का शारजाह में आखिरी गेंद पर छक्का,शोएब अख्तर बनाम सचिन तंदुलकर, 2003 का वह टकराव जिसे कमेंट्री की जरूरत नहीं थी.
यह प्रतिद्वंद्विता कृत्रिम गर्मी नहीं मांगती. इसमें बंटवारे का इतिहास है, उपमहाद्वीप की जिद है, और दो देशों की वह सनक है जो क्रिकेट के मैदान पर ही सहज होती है.
इसे महज एक यूट्यूब इन्फ्लुएंसर के चेहरे तक सीमित करना पाकिस्तान को ट्रोल करना नहीं, प्रतिद्वंद्विता का अपमान है.
‘चोकर्स’ या जॉकर?
दक्षिण अफ्रीका वाले विज्ञापन ने तो और भी नीचे का स्तर छू लिया. 'चोकर्स' का तंज. एक साउथ अफ्रीकी फैन को कपकेक पकड़ाते दिखाना, और भारतीय फैन की तिरछी मुस्कान- इतना सूक्ष्म जितना दादा कोंडके की फिल्म का डबल मीनिंग डायलॉग.
दक्षिण अफ्रीका कोई हल्की टीम नहीं. वे मौजूदा वर्ल्ड टेस्ट चैम्पियन हैं. और 'चोकर्स' टैग के भीतर भी एक त्रासद, लगभग वीरगाथा-सी कहानी छिपी है.
1992 वर्ल्ड कप का सेमीफाइनल- बारिश और बदला हुआ लक्ष्य. हार नहीं, लूट थी.
1999 सेमीफाइनल- लांस क्लूजनर की आखिरी विकेट की साझेदारी, जीत की दहलीज तक पहुंचाकर वह रन-आउट. कमजोरी नहीं, त्रासदी. पिछले साल का फाइनल- आखिरी ओवर तक धकेल देने वाली जंग.
हर बार वे गिरे, लेकिन गिरकर भी कहानी लिख गए. उस कहानी का मजाक उड़ाना- वह भी खाना गले में अटकने के दृश्य से- रचनात्मकता नहीं, क्रूरता है. और क्रूरता भी ऐसी जिसमें चतुराई नहीं, बस शोर है.
मजाक किसका?
सबसे अजीब बात यह है कि Star Sports आधिकारिक प्रसारक है. उसकी भूमिका कहानी कहने वाले की होनी चाहिए, न कि पक्षपाती ट्रोल की.
एक समय था जब 'मौका मौका' अभियान में चुटकी थी, लेकिन प्रतिद्वंद्वी की गरिमा भी थी. उसमें नुकीलापन था, पर बदतमीजी नहीं. 2026 का अभियान? कच्चा, क्रिंज और फुकरा.
विडंबना देखिए- भारत के प्रतिद्वंद्वियों को नीचा दिखाकर भारत को महान साबित करने की कोशिश में, उन्होंने भारतीय फैन्स को ही कमतर समझ लिया...जैसे हम बस बनावटी मुस्कानों पर हंस पड़ेंगे. जैसे हमें बुद्धि और भोंडापन का फर्क नहीं पता.
जब ज्यादा TRP के लिए सस्ती तरकीबें अपनाई जाती हैं, तो मजाक अंततः प्रसारक का ही बनता है.
‘आ देखें जरा’
खेल विनम्रता सिखाता है. 1987 वर्ल्ड कप में पाकिस्तान के फैन्स हर मैच से पहले गाते थे- 'आ देखें जरा, किसमें कितना है दम.' सेमीफाइनल में वे बाहर हो गए.
इतिहास का यही सबक Star Sports को याद रखना चाहिए. जब आप अपना समय विरोधी का मजाक उड़ाने में लगाते हैं, तब आप कहानी का धागा खो चुके होते हैं.
असली फैन जानता है- हिसाब मैदान पर बराबर होता है और वह हमेशा प्रतिद्वंद्वी को वह सम्मान देता है, जिसके बिना जीत का स्वाद फीका पड़ जाता है. क्योंकि क्रिकेट में कोई भी दिन 'आपका फुकरा' पल बन सकता है.
(संदीपन शर्मा हमारे अतिथि लेखक हैं. उन्हें क्रिकेट, सिनेमा, संगीत और राजनीति पर लिखना पसंद है. उनका मानना है कि ये सभी एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं.)
संदीपन शर्मा