गुवाहाटी को क्यों मिल रहा जल्दी-जल्दी मौका, BCCI के टेस्ट वेन्यू सेलेक्शन पर उठे सवाल

भारतीय क्रिकेट बोर्ड (BCCI) के घरेलू सीजन शेड्यूल में गुवाहाटी को कम समय में दोबारा टेस्ट मैच की मेजबानी मिलने से वेन्यू चयन प्रक्रिया पर सवाल उठ खड़े हुए हैं. जहां एक ओर इसे क्रिकेट के भौगोलिक विस्तार की दिशा में कदम माना जा सकता है, वहीं दूसरी ओर मुंबई और कोलकाता जैसे पारंपरिक केंद्रों का बाहर रहना रोटेशन सिस्टम की पारदर्शिता पर संदेह पैदा करता है.

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बीसीसीआई का क्या है वेन्यू सेलेक्शन का फॉर्मूला? (Photo, PTI) बीसीसीआई का क्या है वेन्यू सेलेक्शन का फॉर्मूला? (Photo, PTI)

विश्व मोहन मिश्र

  • नई दिल्ली,
  • 27 मार्च 2026,
  • अपडेटेड 12:40 PM IST

भारतीय क्रिकेट बोर्ड (BCCI) ने गुरुवार को सीनियर पुरुष टीम के घरेलू सीजन का शेड्यूल जारी किया, जिसमें 5 टेस्ट, 9 वनडे और 8 टी20 मैच शामिल हैं. इसी शेड्यूल में गुवाहाटी का बारसापारा स्टेडियम भी चर्चा में है, जिसने नवंबर 2025 में दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ अपना पहला टेस्ट होस्ट किया था और अब 2027 में भारत-ऑस्ट्रेलिया के बीच होने वाली बॉर्डर-गावस्कर ट्रॉफी सीरीज के एक मुकाबले की मेजबानी करेगा.

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हालांकि, यह साफ नहीं है कि इतने कम अंतराल में गुवाहाटी को फिर से यह मौका कैसे मिल गया. खास बात यह भी है कि मुंबई और कोलकाता जैसे बड़े क्रिकेट केंद्र इस अहम सीरीज से बाहर हैं. यह भी स्पष्ट नहीं हो पाया है कि बंगाल क्रिकेट संघ (CAB) या मुंबई क्रिकेट संघ (MCA) ने मेजबानी से इनकार किया था या उन्हें इस बार नजरअंदाज किया गया.

ऑस्ट्रेलिया का भारत दौरा
21 जनवरी से- पहला टेस्ट, नागपुर
29 जनवरी से- दूसरा टेस्ट, चेन्नई 
11 फरवरी- तीसरा टेस्ट, गुवाहाटी
19 फरवरी से- चौथा टेस्ट, रांची
27 फरवरी से- पांचवां टेस्ट, अहमदाबाद 

भारतीय क्रिकेट में वेन्यू चयन को लेकर बहस समय-समय पर उठती रही है, लेकिन इस बार मामला थोड़ा अलग और ज्यादा गंभीर है. वजह है गुवाहाटी का बारसापारा स्टेडियम, जिसे नवंबर 2025 में दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ अपना पहला टेस्ट मैच मिला और अब 2027 में भारत-ऑस्ट्रेलिया बॉर्डर-गावस्कर ट्रॉफी के पांच मैचों में से एक की मेजबानी भी सौंप दी गई है. सवाल सीधा है- क्या यह 'रोटेशन सिस्टम' का हिस्सा है या फिर सिस्टम की नई व्याख्या?

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BCCI लंबे समय से यह दावा करता रहा है कि देश के अलग-अलग वेन्यू को बारी-बारी से टेस्ट मैच दिए जाते हैं, ताकि क्रिकेट का विस्तार हो और हर क्षेत्र को मौका मिले. इस तर्क में दम भी है. भारत जैसे विशाल देश में क्रिकेट का विकास सिर्फ मुंबई, दिल्ली या कोलकाता तक सीमित नहीं रह सकता. नए केंद्रों को आगे लाना जरूरी है.

… लेकिन समस्या तब शुरू होती है जब इस रोटेशन में असमानता दिखने लगती है. नागपुर (फरवरी 2023), अहमदाबाद (अक्टूबर 2025), रांची (फरवरी 2024) और चेन्नई (सितंबर 2024) जैसे वेन्यू को हालिया चक्र में टेस्ट मिले- यह रोटेशन के हिसाब से तार्किक लगता है. लेकिन गुवाहाटी, जिसने अभी-अभी नवंबर 2025 में अपना पहला टेस्ट आयोजित किया, वह इतनी जल्दी 2027 में फिर उसी कतार में कैसे आ गया? क्या रोटेशन का चक्र अब इतना छोटा हो गया है या कुछ वेन्यू के लिए नियम अलग हैं?

और यह सवाल सिर्फ गुवाहाटी तक सीमित नहीं है…

गुवाहाटी का बारसापारा क्रिकेट स्टेडियम भारत का 30वां टेस्ट वेन्यू बन चुका है, लेकिन देश में ऐसे कई ऐतिहासिक और स्थापित मैदान हैं... गांधी स्टेडियम (जालंधर), सेक्टर-16 स्टेडियम (चंडीगढ़), यूनिवर्सिटी ग्राउंड और केडी सिंह बाबू स्टेडियम (लखनऊ), लाल बहादुर शास्त्री स्टेडियम (हैदराबाद)- जहां वर्षों से कोई अंतरराष्ट्रीय मुकाबला नहीं खेला गया. क्या इन वेन्यू को फिर से जीवित करने की कोशिश नहीं होनी चाहिए?

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 देहरादून का राजीव गांधी इंटरनेशनल क्रिकेट स्टेडियम भी इसका उदाहरण है, जहां 2019 में आयरलैंड और अफगानिस्तान के बीच टेस्ट मैच खेला जा चुका है, लेकिन इसके बाद सन्नाटा है. अगर ऐसे सेंटरों को फिर से अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट के नक्शे पर लाया जाए, तो न सिर्फ टेस्ट क्रिकेट की रौनक बढ़ेगी, बल्कि दर्शकों की भागीदारी भी मजबूत होगी और स्टेडियम खाली रहने की समस्या काफी हद तक खत्म हो सकती है.

इस पूरे विमर्श में अहमदाबाद का जिक्र भी जरूरी है, जहां मार्च 2023 के बाद अक्टूबर 2025 में टेस्ट मैच हुआ और अब फिर 2027 में टेस्ट मैच होने जा रहा है. ऐसे में यह माना जा सकता है कि इंफ्रास्ट्रक्चर और क्षमता जैसे पैमानों पर खरे उतरने वाले दुनिया के सबसे बड़े क्रिकेट स्टेडियम को दरकिनार नहीं किया जा सकता है. 

यहां एक और महत्वपूर्ण सवाल उठता है- क्या पारंपरिक क्रिकेट केंद्रों ने खुद टेस्ट मैचों से दूरी बनाई है? क्या ईडन गार्ड्न्स या मुंबई जैसे प्रतिष्ठित वेन्यू ने टेस्ट क्रिकेट की जगह व्हाइट-बॉल मैचों को प्राथमिकता दी? अगर ऐसा है, तो स्थिति समझ में आती है. लेकिन तब भी पारदर्शिता जरूरी है. क्या इस बारे में कोई आधिकारिक जानकारी सामने आई? क्या फैन्स को बताया गया कि किन कारणों से इन बड़े केंद्रों को नजरअंदाज किया गया?

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पारदर्शिता की यही कमी पूरे विवाद की जड़ है. जब फैसले साफ-साफ सामने नहीं आते, तो अटकलें लगनी शुरू हो जाती हैं और यही इस मामले में भी हो रहा है.

मामला तब और संवेदनशील हो जाता है जब हम हाल के घटनाक्रम को एक साथ जोड़कर देखते हैं. गुवाहाटी को लगातार बड़े इवेंट मिलने लगे हैं, महिला वनडे वर्ल्ड कप का ओपनर और सेमीफाइनल, पहला टेस्ट मैच, फिर बॉर्डर-गावस्कर ट्रॉफी का टेस्ट  और आईपीएल में भी मैचों की संख्या में इजाफा, वो भी हाई-प्रोफाइल टीमों के साथ.

अब यह सब महज संयोग भी हो सकता है. क्रिकेट प्रशासन में फैसले कई स्तरों पर लिए जाते हैं और हर निर्णय के पीछे कई कारण होते हैं- लॉजिस्टिक्स, पिच की गुणवत्ता, दर्शकों की मांग, ब्रॉडकास्टिंग फैक्टर्स... लेकिन जब एक ही शहर लगातार फोकस में आता है, तो सवाल उठना स्वाभाविक है.

हालांकि, यह भी उतना ही जरूरी है कि हम इस मुद्दे को संतुलित नजरिए से देखें. गुवाहाटी या किसी भी नए क्रिकेट केंद्र को मौका मिलना गलत नहीं है. बल्कि यह भारतीय क्रिकेट के भौगोलिक विस्तार के लिए जरूरी है. पूर्वोत्तर भारत लंबे समय तक क्रिकेट के नक्शे पर हाशिए पर रहा है और ऐसे में वहां बड़े मैचों का आयोजन एक सकारात्मक कदम माना जाना चाहिए.

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... लेकिन असली सवाल 'मौका देने' का नहीं, बल्कि 'कैसे और किस आधार पर मौका देने' का है. क्या सभी वेन्यू के लिए समान नियम हैं? क्या चयन की प्रक्रिया पारदर्शी है? क्या फैसले किसी स्पष्ट नीति के तहत लिए जा रहे हैं या फिर परिस्थितियों और प्रभावों के आधार पर?

अंततः, यह बहस किसी एक शहर के खिलाफ नहीं है. यह बहस उस सिस्टम की है, जिस पर भारतीय क्रिकेट टिका हुआ है. BCCI से उम्मीद सिर्फ यह नहीं है कि वह दुनिया का सबसे बड़ा क्रिकेट बोर्ड बना रहे, बल्कि यह भी है कि वह अपने फैसलों में पारदर्शिता और निष्पक्षता बनाए रखे.

अगर रोटेशन सिस्टम है, तो उसे स्पष्ट रूप से सार्वजनिक किया जाना चाहिए. अगर उसमें अपवाद हैं, तो उनकी वजह बताई जानी चाहिए क्योंकि क्रिकेट में भरोसा सिर्फ मैदान पर नहीं बनता, वह उन कमरों में भी बनता है, जहां फैसले लिए जाते हैं... और फिलहाल, वही भरोसा सवालों के घेरे में है.

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