कांग्रेस के दिग्गज नेता और लोकसभा सांसद शशि थरूर ने भारतीय मेन्स क्रिकेट टीम के मुख्य कोच गौतम गंभीर की जमकर तारीफ की थी. थरूर का मानना था कि प्रधानमंत्री के बाद सबसे कठिन जिम्मेदारी भारतीय क्रिकेट टीम के हेड कोच की होती है. थरूर ने उनकी संतुलित और शांत नेतृत्व क्षमता की प्रशंसा की थी.
शशि थरूर ने अपने X अकाउंट पर लिखा था, 'नागपुर में अपने पुराने दोस्त गौतम गंभीर के साथ एक अच्छी और खुलकर बातचीत का आनंद लिया. वो भारत में प्रधानमंत्री के बाद सबसे कठिन काम संभालने वाले व्यक्ति हैं. लाखों लोग रोजाना उन पर सवाल उठाते हैं, लेकिन वे शांत रहते हैं और निर्भीकता से आगे बढ़ते हैं. उनकी शांत दृढ़ता और सक्षम नेतृत्व के लिए प्रशंसा के कुछ शब्द.'
अब गौतम गंभीर ने शशि थरूर को जवाब देते हुए जो पोस्ट शेयर किया, वो सुर्खियों में आ चुका है. गंभीर ने लिखा, 'बहुत-बहुत धन्यवाद शशि थरूर. जब धूल बैठेगी, तब कोच की कथित असीमित अधिकार (unlimited authority) को लेकर सच्चाई और तर्क अपने आप साफ हो जाएंगे. तब तक मुझे इस बात में मजा आ रहा है कि मुझे उन्हीं लोगों के खिलाफ खड़ा किया जा रहा है, जो असल में सबसे बेहतरीन हैं.'
गंभीर ने उस तारीफ को स्वीकारा, लेकिन...
कांग्रेस सांसद शशि थरूर की बातों का मकसद सीधा था कोच गौतम गंभीर के लिए एक सार्वजनिक सराहना और यह स्वीकार करना कि भारत के कोच की कुर्सी कितनी कठोर और निर्दयी हो सकती है. लेकिन गंभीर ने जवाब देते हुए उस तारीफ को ठुकराया नहीं, जिससे चर्चा की दिशा ही बदल गया. गंभीर ने बिना किसी का नाम लिए इस बातचीत को पलट दिया.
'धूल बैठने' और कोच की कथित 'असीमित ताकत' पर कही गई लाइन ने इस पोस्ट को भारतीय क्रिकेट में सत्ता, चयन प्रक्रिया और जवाबदेही पर बहस का केंद्र बना दिया. सारा ध्यान इस बात पर टिक गया कि गंभीर आखिर कहना क्या चाह रहे थे. कई फैन्स ने 'असीमित ताकत' वाली बात को चयन प्रक्रिया पर सूक्ष्म टिप्पणी के तौर पर पढ़ा. उनके अनुसार गंभीर यह याद दिला रहे थे कि हेड कोच भारतीय टीम को अकेले नहीं चलाता, यानी यह कोई वन-मैन शो नहीं है. यह व्याख्या इसलिए भी पकड़ में आई क्योंकि यह भारतीय क्रिकेट की स्थापित संरचना से मेल खाती है.
यहां प्रभाव होता है, लेकिन पूर्ण नियंत्रण शायद ही किसी के पास होता है. लेकिन हर कोई संकेतों की भाषा समझने को तैयार नहीं था. कई फैन्स की प्रतिक्रियाएं तीखी और सीधी थीं. एक यूजर ने 'धूल बैठने' वाले शब्दों पर कटाक्ष करते हुए लिखा कि धूल कब बैठेगी पता नहीं, लेकिन हकीकत तो साफ है और फिर उस फैन ने सीधे नतीजों की सूची रख दी. किसी ने कहा कि भारत पहले ही नुकसान झेल चुका है, ऐसे में और कितनी 'धूल' बाकी है?
यहीं से प्रतिक्रियाएं दो हिस्सों में बंट गईं. कुछ ने इसे संदर्भ की सफाई माना. तो कुछ ने इसे जिम्मेदारी से पहले ही बचाव. गौतम गंभीर के समर्थकों का तर्क था कि उन्हें ऐसे जज किया जा रहा है, मानो टीम से जुड़े हर फैसले सब कुछ वही तय करते हों. उनके मुताबिक गंभीर की लाइन इस सच्चाई की याद दिलाती है कि कोच अक्सर फैसलों का चेहरा होता है, अकेला फैसला करने वाला नहीं. आलोचकों ने उसी लाइन को एक अलग ही रंग दिया. आलोचकों ने इसे पूरी तरह बकवास कहा गया और आरोप लगाया गया कि गंभीर यह संकेत दे रहे हैं कि चूंकि उनके पास पूर्ण अधिकार नहीं हैं, इसलिए नतीजों की पूरी जिम्मेदारी भी उन पर नहीं डाली जानी चाहिए.
मैसेज की टाइमिंग पर भी सवाल उठ रहे हैं. आलोचकों के मुताबिक आईसीसी मेन्स टी20 वर्ल्ड कप 2026 से ठीक पहले इस तरह की बात करना केवल शोर बढ़ाता है. फिर सामने आया सोशल मीडिया का सबसे जाना-पहचाना रूप, जिसे शक कहते हैं. कुछ यूजर्स ने पूरी बातचीत को पब्लिसिटी स्टंट करार दे दिया. शोर के बीच कुछ साफ आवाजे थीं. हालांकि हर प्रतिक्रिया नकारात्मक नहीं थी. कुछ तटस्थ फैन्स ने बात को बेहद सरल कर दिया. एक फैन ने सीधे लक्ष्य तय किया कि T20 वर्ल्ड कप जीतो और सारी बहस खत्म. एक अन्य समर्थक ने संतुलित सुर अपनाया हुए लिखा कि गंभीर प्रतिबद्ध हैं, उनसे गलतियां हुई हैं, लेकिन वे उन्हें स्वीकार कर सुधारने की कोशिश करते हैं.
आखिरकार गौतम गंभीर के एक छोटे-से जवाब ने भारतीय क्रिकेट के भीतर मौजूद दरारें उजागर कर दीं. एक पंक्ति ने तारीफ को बहस में बदल दिया और शायद यह भारतीय क्रिकेट के मौजूदा माहौल के बारे में उतना ही कहती है... जितना उस व्यक्ति के बारे में, जो इस बहस के केंद्र में है.
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