अहमदाबाद के नरेंद्र मोदी स्टेडियम में रविवार रात का नजारा कुछ ऐसा था कि 82 हजार दर्शक स्तब्ध रह गए. 188 रनों के पीछा में भारतीय टीम जैसे टूट ही गई- मैच की रफ्तार रोमांच से सन्नाटे में बदल गई. पावरप्ले के बाद रनचेज थम गए और 15वें ओवर में हार्दिक पंड्या आउट होते ही नीली जर्सियों की कतारें स्टैंड से बाहर निकलने लगीं, जैसे हर उम्मीद हवा में घुल गई हो.
शुरुआत हालांकि भारत के लिए सपनों जैसी रही. जसप्रीत बुमराह ने नई गेंद से कमाल दिखाया. क्विंटन डिकॉक एक ढीले शॉट पर बोल्ड कर दिया और रयान रिकेल्टन को ऐसी कटर डाली, जो हल्की सी उछली और लीडिंग एज निकलवा गई. दक्षिण अफ्रीका 20 पर 3 था. लगा मैच यहीं खत्म हो जाएगा....
...लेकिन इस बार कहानी ने अलग मोड़ लिया. दक्षिण अफ्रीका ने रक्षात्मक होने की बजाय जवाबी हमला चुना. डेवाल्ड ब्रेविस और डेविड मिलर ने संयम और आक्रामकता का संतुलन बनाकर पारी को संभाला. उन्होंने खासतौर पर वरुण चक्रवर्ती को निशाना नहीं बनाया, बल्कि उन्हें बेअसर कर दिया. वरुण की गेंदों पर जोखिम कम लिया, स्पेस बनाकर शॉट खेले और स्ट्राइक रोटेट की. नतीजा यह हुआ कि भारत का सबसे बड़ा स्पिन हथियार दबाव नहीं बना सका.
टीम इंडिया को उसी की रणनीति में उड़ाया
दक्षिण अफ्रीकी पारी का मध्य चरण निर्णायक साबित हुआ. मिलर ने फ्रंट लेग हटाकर स्लॉग-स्वीप और सीधे शॉट लगाए, जबकि ब्रेविस ने ऑफ साइड खोलकर गेंदबाजों की लाइन बिगाड़ी. भारत ने शुरुआत में जो दबाव बनाया था, वह धीरे-धीरे खत्म होता गया. यह वही रणनीति थी, जो भारत पिछले डेढ़ साल से टी20 में अपनाता रहा है- डर की बजाय प्रतिआक्रमण.
188 का टारगेट कागज पर मुश्किल जरूर था, नामुमकिन नहीं. लेकिन भारतीय बल्लेबाजी ने शुरुआत से ही ठहराव दिखाया. नई गेंद से मार्को जानसेन ने सटीक फील्ड सेटिंग के साथ हार्ड लेंथ पर गेंदबाजी की. अभिषेक शर्मा के लिए थर्ड मैन, डीप पॉइंट और रिंग के किनारे फील्डर तैनात किए गए. उन्होंने ऑफ साइड के शॉट्स रोके और बल्लेबाज को बड़े लेग साइड बाउंड्री की तरफ खेलने पर मजबूर किया. एक ऊंचा शॉट मिडविकेट और मिडऑन के बीच कैच में बदल गया.
मध्य ओवरों में असली फर्क लुंगी एनगिडी ने पैदा किया. उनकी स्लोअर गेंदें भारतीय बल्लेबाजों के लिए पहेली बन गईं. गति में सूक्ष्म बदलाव, आखिरी क्षण में गिरावट और सटीक लेंथ- भारत ने 31 स्लोअर गेंदों पर सिर्फ 27 रन बनाए और तीन विकेट गंवाए. दक्षिण अफ्रीका ने वही कला दिखाई, जिसके लिए भारतीय गेंदबाज मशहूर रहे हैं- रफ्तार कम करके भ्रम पैदा करना.
रणनीतिक बढ़त भी मेहमान टीम के साथ रही. भारत ने इस टूर्नामेंट में अलग-अलग मैदानों पर खेला, जबकि दक्षिण अफ्रीका ने अहमदाबाद में कई मैच खेलकर पिच की प्रकृति समझ ली थी. कप्तान एडेन मार्करम का पहले बल्लेबाजी का फैसला जोखिम भरा जरूर था, लेकिन सही साबित हुआ. गेंदबाजों ने लेंथ पकड़े रखी और भारतीय बल्लेबाजों को खुलकर खेलने का मौका नहीं दिया.
कोई इकलौता नायक सामने नहीं आया...
भारतीय टीम ग्रुप चरण में कई बार व्यक्तिगत प्रतिभा के दम पर मुश्किल हालात से निकली थी. कभी सूर्यकुमार यादव की पारी, कभी ईशान का हमला, तो कभी शिवम दुबे की फिनिशिंग.. लेकिन इस बार ऐसा कोई इकलौता नायक सामने नहीं आया.
अंत में, यह सिर्फ 188 रन का असफल पीछा नहीं था. यह उस रणनीति की हार थी, जिसे भारत अपनी ताकत मानता रहा है. हार्ड लेंथ, स्लोअर गेंदें और धैर्य- दक्षिण अफ्रीका ने भारत को उसी के हथियार से मात दी.
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