नृत्य, चिकित्सा और संस्कृत का ज्ञान... नटराज के तांडव नृत्य के क्या मायने हैं

महादेव का नृत्य भरत मुनि को नाटक में नृत्य का महत्व समझाने, अपस्मार राक्षस पर नियंत्रण करने और आचार्य पाणिनी को संस्कृत व्याकरण की रचना के लिए प्रेरित करने वाला था। नटराज रूप में शिवजी ने अहंकार और अभिमान को नियंत्रित करने की शिक्षा दी. जानिए कैसे?

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महादेव के नटराज स्वरूप क्यों महत्वपूर्ण है महादेव के नटराज स्वरूप क्यों महत्वपूर्ण है

विकास पोरवाल

  • नई दिल्ली,
  • 17 फरवरी 2026,
  • अपडेटेड 4:11 PM IST

महाशिवरात्रि के मौके पर महादेव के कई रूपों की चर्चा की होती है. वह कहीं वैद्य, कहीं योगी, कहीं महादेव, कहीं महाकाल. इन सबसे भी अलग उनके और भी नाम रहे हैं. वह वनवासी और आदिवासी लोगों का भी प्रतिनिधित्व करते हैं और इनमें से ही एक है नट जाति. नट भारत में एक घुमंतू जाति रही. लेकिन शिव नटराज कहलाते हैं. इस तरह वह नृत्य के भी सबसे बड़े देवता बन जाते हैं. उन्होंने अपने नृत्य से तीन लाभ दिए. भरत मुनि को नाटक में नृत्य का महत्व समझाया. अपस्मार पर नियंत्रण किया और आचार्य पाणिनी को व्याकरण की रचना की प्रेरणा दी. संस्कृत भाषा का ज्ञान दिया.

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शिवजी का नटराज स्वरूप
यहां यह बताना जरूरी हो जाता है कि नट जाति की उत्पत्ति शिवजी के इसी नटराज स्वरूप से मानी जाती है. स्कंद पुराण के मुताबिक एक बार ऋषियों को अपने त्याग और तप पर अहंकार हो गया. तभी भगवान शंकर और माता पार्वती भिक्षुक के वेश में वहां पहुंचे, सभी स्त्रियां उन्हें प्रणाम करने के लिए यज्ञ छोड़ कर उठ गईं. इससे उन ऋषियों को बड़ा क्रोध आया और उन्होंने अपनी सिद्धि से कई विषधर सर्पों को महादेव पर आक्रमण करने को कहा किन्तु भगवान शंकर ने सभी सर्पों का दलन कर दिया. 

तब उन ऋषियों ने अपने अभिमान को एक इंसानी स्वरूप देकर शिवजी पर आक्रमण करने को कहा. अब अपस्मार बौने कद का एक राक्षस बन गया. असल में वह सभी प्राणियों के अभिमान-अहंकार का प्रकट स्वरूप था. अपस्मार ने अपनी शक्ति से माता पार्वती को भ्रमित कर दिया और उन्हें अचेत कर दिया. ये देख कर भगवान शंकर को गुस्सा आ गया और उन्होंने डमरू बजाकर युद्ध की घोषणा की. 

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क्या है अंजलि मुद्रा?
चूंकी अपस्मार बौना था, इसलिए उससे बराबरी का युद्ध संभव नहीं था, तब शिवजी ने अपना आकर बढ़ाकर अपस्मार को अपने पैरों के नीचे दबा लिया, और एक पैर पर खड़े होकर बार-बार उस पर कूदने लगे. नटराज रूप में भगवान शंकर ने एक पैर से उसे दबा कर और एक पैर उठाकर अपस्मार की सभी शक्तियों का दलन कर दिया और खुद को संतुलित करते हुए स्थिर हो गए.

उनकी यही मुद्रा "अंजलि मुद्रा" कहलाई. शिव ने अमर अपस्मार का वध नहीं किया, बल्कि उसे कंट्रोल किया. यह कथा हमें हमारे घमंड पर नियंत्रण की जरूरत बताती है. अहंकार, गर्व और अभिमान नष्ट नहीं हो सकते, लेकिन इसे नियंत्रित ही करना होता है.

शिव ने अमर अपस्मार का वध नहीं किया, बल्कि उसे कंट्रोल किया. यह कथा हमें हमारे घमंड पर नियंत्रण की जरूरत बताती है. घमंड भी अज्ञानता से होता है और अज्ञानता ज्ञान से बहुत छोटी होती है. इसके बाद देवताओं ने इसी प्रकार अपस्मार को निष्क्रिय रखने की प्रार्थना की ताकि भविष्य में संसार में कोई उसकी शक्तियों के प्रभाव में न आये. नटराज रूप में महादेव ने जो 14 बार अपने डमरू का नाद किया था उसे ही आधार मान कर महर्षि पाणिनि ने 14 सूत्रों वाले रूद्राष्टाध्यायी "माहेश्वर सूत्र" की रचना की. यह माहेश्वर सूत्र संस्कृत व्याकरण और शब्द रचना के आधार हैं.

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नृत्तावसाने नटराजराजो ननाद ढक्कां नवपञ्चवारम्।
उद्धर्तुकामः सनकादिसिद्धान् एतद्विमर्शे शिवसूत्रजालम् ॥

भाव- "नृत्य (ताण्डव) के अवसान (समाप्ति) पर नटराज (शिव) ने सनकादि ऋषियों की सिद्धि और कामना पूर्ति के लिये नवपंच (चौदह) बार डमरू बजाया. इस प्रकार चौदह शिवसूत्रों की ये जाल (वर्णमाला) प्रकट हुई."

डमरु के चौदह बार बजाने से चौदह सूत्रों के रूप में ध्वनियां निकली, इन्हीं ध्वनियों से व्याकरण का प्रकाट्य हुआ. इसलिये व्याकरण सूत्रों के आदि-प्रवर्तक भगवान नटराज को माना जाता है. प्रसिद्ध है कि महर्षि पाणिनि ने इन सूत्रों को देवाधिदेव शिव के आशीर्वाद से प्राप्त किया जो कि पाणिनीय संस्कृत व्याकरण का आधार बना.

1. अइउण् 2. ऋऌक्, 3. एओङ्, 4. ऐऔच्, 5. हयवरट्, 6. लण्, 7. ञमङणनम्, 8. झभञ्, 9. घढधष्, 10. जबगडदश्, 11. खफछठथचटतव्, 12. कपय्, 13. शषसर्, 14. हल्

यही वजह है कि अगर विष्णुजी पुराण पुरुष हैं तो शिव कालपुरुष हैं. वह इसीलिए महाकाल कहलाते हैं. वह मृत्यु नहीं मोक्ष देते हैं और उनकी तीसरी आंख सिर्फ विनाश नहीं बल्कि जागृति का प्रतीक है. महामृत्युंजय मंत्र भी यही कहता है.

ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥

हम तीन नेत्रों वाले उसे तत्पुरुष की वास्तविकता का चिन्तन करते हैं जो जीवन की मधुर परिपूर्णता को पोषित करता है और वृद्धि करता है. हम जिन बंधनों में उलझे हुए हैं, ककड़ी की तरह हम इस बंधन वाले तने से अलग होकर मोक्ष धारण करें, इस बंधन में बार-बार बांधने वाली मृत्यु का भय छूटे, हम अमरत्व को समझें और इसके आनंद से वंचित न हों. शिव से उत्पन्न हम शिव में मिल जाएं, शिवोऽहम् शिवॊऽहम् . महाशिवरात्रि की शुभकामनाएं.
 

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