Kedarnath Dham: क्यों त्रिकोणीय आकार का है केदारनाथ का शिवलिंग? महाभारत से जुड़ी है विशेष कथा

Kedarnath Dham: केदारनाथ मंदिर के कपाट आज पूरे विधि-विधान और वैदिक मंत्रोच्चार के साथ श्रद्धालुओं के लिए खोल दिए गए. इस ज्योतिर्लिंग की पवित्रता और आस्था के लिए पूरे देश में प्रसिद्ध है. यहां आने वाले श्रद्धालुओं के मन में अक्सर एक सवाल उठता है कि केदारनाथ में स्थापित शिवलिंग का आकार सामान्य से अलग, यानी बैल की पीठ जैसा त्रिकोणीय क्यों है. आइए जानते हैं इसके पीछे की विशेष कथा.

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केदारनाथ धाम से जुड़ी विशेष कथा (Photo: PTI) केदारनाथ धाम से जुड़ी विशेष कथा (Photo: PTI)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 22 अप्रैल 2026,
  • अपडेटेड 8:37 AM IST

Kedarnath Dham: चार धाम यात्रा की शुरुआत के साथ ही केदारनाथ धाम के कपाट 22 अप्रैल यानी आज सुबह 8 बजे श्रद्धालुओं के लिए खोल दिए गए. हिमालय की ऊंचाइयों में स्थित यह पवित्र धाम भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में शामिल है और हर साल लाखों भक्त यहां दर्शन के लिए पहुंचते हैं. साल के लगभग 6 महीने तक यहां भारी बर्फबारी होती है, जिसके कारण मंदिर बंद रहता है. इसी वजह से इसे भगवान शिव का दिव्य निवास भी कहा जाता है. केदारनाथ धाम पंचकेदार में से भी एक है और श्रद्धालुओं के लिए आस्था का बड़ा केंद्र है. इस स्थान की खास बात है कि यहां स्थापित शिवलिंग का आकार और स्वरूप अन्य ज्योतिर्लिंगों से काफी अलग माना जाता है, जो इसे और भी अद्भुत बनाता है. ऊंचाई पर स्थित होने के कारण इसे सभी ज्योतिर्लिंगों में सबसे ऊंचा भी बताया जाता है. 

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केदारनाथ का है विशेष आकार

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, केदारनाथ में स्थापित शिवलिंग अपने अनोखे आकार के लिए जाना जाता है. यह सामान्य गोलाकार नहीं, बल्कि त्रिकोणीय रूप में है. इसकी ऊंचाई और चौड़ाई लगभग 12-12 फीट के आसपास मानी जाती है. मंदिर के सामने माता पार्वती और पांडवों की आकृतियां भी देखने को मिलती हैं, जो इस स्थान की पौराणिक महत्ता को और बढ़ाती हैं. अक्सर लोगों के मन में सवाल आता है कि आखिर यहां का शिवलिंग बैल की पीठ जैसा क्यों दिखाई देता है. इसके पीछे एक प्राचीन कथा जुड़ी हुई है, जो पांडवों और भगवान शिव से संबंधित है.

महाभारत से संबंधित है केदारनाथ का इतिहास

कथा के अनुसार, महाभारत युद्ध समाप्त होने के बाद पांडवों को अपने ही कुल के लोगों की हत्या का भारी पछतावा हुआ था. इस पाप से मुक्ति पाने के लिए उन्होंने भगवान शिव की शरण लेने का निर्णय लिया. सभी पांडव और द्रौपदी हिमालय की ओर निकल पड़े, ताकि वे शिवजी से क्षमा मांग सकें. लेकिन भगवान शिव उनसे प्रसन्न नहीं थे और उनकी परीक्षा लेना चाहते थे. इसलिए, उन्होंने पांडवों से दूर रहने के लिए नंदी (बैल) का रूप धारण कर लिया और धरती में छिप गए.

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केदारनाथ धाम के शिवलिंग का अद्भुत आकार (Photo: ITG)

धार्मिक मान्यतानुसार, जब पांडवों ने भगवान शिव की खोज की, तो शिव जी ने बैल का रूप धारण कर लिया और जमीन में समाने लगे. भीम ने उन्हें पूछ से पकड़कर रोकने का प्रयास किया, जिससे बैल की पीठ का कूबड़ वाला हिस्सा उत्तराखंड में केदारनाथ में रह गया. यही कूबड़ त्रिभुजाकार शिवलिंग के रूप में पूजा जाता है. माना जाता है कि भगवान शिव बैल के रूप में अंतर्ध्यान हुए, तो उनका धड़ से ऊपर का भाग (सिर) नेपाल के काठमांडू में प्रकट हुआ. इस स्थान पर पशुपतिनाथ मंदिर स्थित है. केदारनाथ में कूबड़ के अलावा, शिव के अन्य अंग अलग-अलग स्थानों पर प्रकट हुए, जिन्हें पंचकेदार कहा जाता है. जिसमें तुंगनाथ (भुजाएं), रुद्रनाथ (मुख), मदमहेश्वर (नाभि), और कल्पेश्वर (जटा). कुछ मान्यताओं के अनुसार, नेपाल में भक्तपुर के पास स्थित डोलेश्वर महादेव मंदिर को भी केदारनाथ के बैल रूप का ही सिर माना जाता है. 

इसी स्वरूप को आज केदारनाथ में शिवलिंग के रूप में पूजा जाता है. इस कथा के कारण केदारनाथ धाम का महत्व और भी बढ़ जाता है, क्योंकि यहां भगवान शिव के उस अद्भुत रूप के दर्शन होते हैं, जो उनकी लीला और पांडवों की भक्ति को दर्शाता है.

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