Hanuman Jayanti 2026: रामायण ही नहीं, महाभारत में भी थे हनुमान जी! जानें भीम और अर्जुन से जुड़ी ये कथाएं

Hanuman Jayanti 2026: पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, महाभारत और रामायण दोनों में हनुमान जी की वीरता और भक्ति का वर्णन मिलता है. महाभारत में हनुमान जी अर्जुन के रथ पर ध्वज के रूप में विराजमान थे और भीम से उनकी मुलाकात की कथा भी प्रसिद्ध है.

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हनुमान जी से जुड़े तथ्य (Photo: ITG) हनुमान जी से जुड़े तथ्य (Photo: ITG)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 02 अप्रैल 2026,
  • अपडेटेड 3:43 PM IST

Hanuman Jayanti 2026: हनुमान जयंती हिंदू धर्म का एक बेहद पावन और महत्वपूर्ण पर्व है. यह दिन भगवान हनुमान के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है. हर साल यह पर्व चैत्र मास की पूर्णिमा तिथि को आता है. आज हनुमान जयंती मनाई जा रही है. धार्मिक मान्यता के अनुसार, इसी दिन भगवान हनुमान का जन्म हुआ था. हनुमान जी को भगवान शिव का रुद्रावतार माना जाता है, जिन्होंने वानर रूप में धरती पर जन्म लिया. उन्होंने अपना पूरा जीवन भगवान श्रीराम की सेवा में समर्पित कर दिया, इसलिए उन्हें रामभक्तों में सबसे श्रेष्ठ माना जाता है.

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लेकिन आपको एक बात जानकर आश्चर्य होगा कि भगवान हनुमान का उल्लेख सिर्फ रामायण तक ही सीमित नहीं है, बल्कि महाभारत में भी उनका जिक्र मिलता है. रामायण में अपनी वीरता दिखाने वाले हनुमान जी महाभारत काल में भी प्रकट हुए थे. कथा के अनुसार, पांडवों के वनवास के दौरान उनकी मुलाकात भीम से हुई थी. माना जाता है कि हनुमान जी चिरंजीवी हैं, यानी वे आज भी जीवित हैं. यही कारण है कि वे अलग-अलग युगों में दर्शन देते रहे हैं. चलिए जानते हैं इसके पीछे की कथा.

पहली कथा

हनुमान जी अर्जुन के रथ पर हुए थे विराजमान 

महाभारत युद्ध से पहले, एक बार श्री कृष्ण ने हनुमान जी और अर्जुन दोनों को द्वारका नगर में बुलाया था. जब श्री कृष्ण ध्यान में लीन थे, तब अर्जुन और हनुमान जी महल के बाहर समुद्र तट पर उनके ध्यान से बाहर आने की प्रतीक्षा करने लगे. इसी बीच, अर्जुन ने हनुमान जी से कहा कि वह विश्व के सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर हैं, जिसके बाद हनुमान जी समझ गए कि अर्जुन को अपने धनुर्विद्या पर घमंड हो गया है. अर्जुन ने भगवान श्रीराम का उपहास करते हुए यहां तक कह दिया कि पत्थर का पुल बनाना समय की बर्बादी है, राम जी को तो बाणों का पुल बनाना चाहिए था.

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भगवान के प्रति ये शब्द सुनकर हनुमान जी ने अर्जुन के सामने यह शर्त रखी कि वह बाणों का पुल बनाएं और यदि अर्जुन के पैर से वह पुल न टूटे तो वे यह स्वीकार कर लेंगे कि अर्जुन श्री राम से भी श्रेष्ठ धनुर्धर हैं और अपना शरीर अग्नि में जला देंगे. अर्जुन ने तीन बार बाणों का पुल बनाया और तीनों बार पुल टूट गया. पुल के टूटने से अर्जुन का अभिमान भी चकनाचूर हो गया.

इस घटना के बाद, श्री कृष्ण उन दोनों के सामने प्रकट हुए. एक ओर श्री कृष्ण ने अर्जुन को उनकी गलती का एहसास कराया, वहीं दूसरी ओर उन्होंने हनुमान जी से अर्जुन के रथ पर ध्वज के रूप में स्थापित होने का अनुरोध किया. हनुमान जी ने भगवान की बात मान ली, लेकिन एक शर्त रखी. शर्त यह थी कि जिस प्रकार उन्होंने राम अवतार में हनुमान जी को युद्ध के साथ-साथ ज्ञान भी दिया था, उसी प्रकार वे महाभारत युद्ध में भी ज्ञान का सार चाहते थे. ऐसा माना जाता है कि हनुमान जी के अनुरोध पर श्री कृष्ण ने गीता का सार सुनाया था. महाभारत युद्ध के दौरान, हनुमान जी अर्जुन के रथ पर ध्वज के रूप में विराजमान रहे. हनुमान जी ने अर्जुन और उनके रथ की रक्षा की थी.

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दूसरी कथा

हनुमान जी ने भीम का तोड़ा था घमंड

द्वापर युग में भीम और हनुमान जी की मुलाकात एक दिलचस्प घटना के रूप में बताई जाती है. महाभारत की कथा के अनुसार, जब पांडव वनवास में थे, तब एक दिन द्रौपदी ने भीम से सौगंधिका फूल लाने की इच्छा जताई. द्रौपदी की बात मानकर भीम उस फूल की तलाश में जंगल की ओर निकल पड़े. रास्ते में उन्हें एक बूढ़ा वानर दिखाई दिया, जो अपनी पूंछ फैलाकर लेटा हुआ था. भीम ने उससे रास्ता देने को कहा, लेकिन वानर ने कमजोरी का हवाला देते हुए खुद पूंछ हटाने से मना कर दिया. उन्होंने भीम से ही अपनी पूंछ हटाने को कहा. भीम ने पूरी ताकत लगाकर पूंछ हटाने की कोशिश की, लेकिन वह जरा भी नहीं हिली. यह देखकर भीम को हैरानी हुई और उन्हें समझ आ गया कि यह कोई साधारण वानर नहीं हो सकता. इसके बाद भीम ने विनम्रता से उस वानर से उसका परिचय पूछा. तभी वह वानर अपने असली स्वरूप में प्रकट हुए, जो स्वयं हनुमान जी थे. हनुमान जी ने भीम को आशीर्वाद दिया और उनका घमंड भी दूर किया.

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