महाभारत के महान योद्धा भीष्म पितामह का नाम तो आप सबने सुना ही होगा, जिनके जीवन की हर घटना बहुत ही महत्वपूर्ण मानी जाती है. लेकिन, उनके जीवन की सबसे अनोखी विशेषता यह थी कि उन्हें ऐसा वरदान प्राप्त था, जिसके कारण वे अपनी इच्छा के अनुसार ही मृत्यु को स्वीकार कर सकते थे. दरअसल, महाभारत के युद्ध के दौरान भीष्म पितामह कौरवों की ओर से सेनापति थे और पांडवों के लिए सबसे बड़ी चुनौती बने हुए थे. वे उम्र में बड़े थे और परिवार में अत्यंत सम्मानित भी थे, इसलिए कई योद्धा उनसे युद्ध करने में संकोच करते थे. उनकी शक्ति और वरदान के कारण उन्हें परास्त करना भी आसान नहीं था. युद्ध के दौरान जब उन्हें अनेक बाण लगे और वे तीरों की शैय्या पर गिर पड़े, तब भी उनके प्राण नहीं निकले थे. इसका कारण यही था कि उन्हें इच्छा मृत्यु का वरदान प्राप्त था. वे चाहते तो उसी समय प्राण त्याग सकते थे, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया था.
दरअसल, भीष्म पितामह ने जानबूझकर कुछ समय तक प्रतीक्षा करने का निर्णय लिया. शास्त्रों के अनुसार, वे सूर्य के उत्तरायण होने का इंतजार कर रहे थे, क्योंकि मान्यता है कि उस समय प्राण त्यागने से मोक्ष की प्राप्ति होती है. यही कारण है कि तीरों की शैय्या पर लेटे होने के बावजूद भीष्म पितामह कई दिनों तक जीवित रहे और सही समय आने पर ही उन्होंने अपने प्राण त्यागे थे.
कौन थे भीष्म पितामह?
भीष्म पितामह का जन्म माता गंगा और हस्तिनापुर के राजा शांतनु के घर हुआ था. उनका वास्तविक नाम देवव्रत था. देवव्रत बचपन से ही बहुत पराक्रमी और विद्वान थे. उन्होंने महर्षि परशुराम से शस्त्र विद्या सीखी थी, जिसके बाद राजा शांतनु ने उन्हें हस्तिनापुर का उत्तराधिकारी घोषित कर दिया था.
कुछ समय बाद एक दिन राजा शांतनु शिकार के लिए जंगल गए. लौटते समय उनकी मुलाकात सत्यवती से हुई. दोनों एक-दूसरे को पसंद करने लगे और शांतनु ने उससे विवाह करने की इच्छा जताई. लेकिन सत्यवती के पिता ने एक शर्त रखी कि उनकी बेटी से जन्म लेने वाला पुत्र ही हस्तिनापुर का राजा बनेगा, तभी वे यह विवाह स्वीकार करेंगे.
कैसे मिला था भीष्म पितामह को इच्छामृत्यु का वरदान?
राजा शांतनु अपने पुत्र देवव्रत को ही हस्तिनापुर का राजा बनाना चाहते थे, इसलिए सत्यवती के पिता की शर्त सुनकर वे दुविधा में पड़ गए. जब देवव्रत को इस बात का पता चला, तो उन्होंने अपने पिता की खुशी के लिए बड़ा त्याग किया. उन्होंने घोषणा की कि वे सिंहासन का अधिकार छोड़ देंगे और जीवनभर विवाह भी नहीं करेंगे. देवव्रत की इस कठोर प्रतिज्ञा को ही ''भीष्म प्रतिज्ञा'' कहा गया, जिसके बाद उनका नाम भीष्म पड़ गया. पुत्र के इस त्याग से प्रसन्न होकर राजा शांतनु ने उन्हें वरदान दिया कि वे अपनी इच्छा के अनुसार ही मृत्यु को स्वीकार कर सकेंगे.
महाभारत के युद्ध में उत्तरायण के दौरान त्यागे थे भीष्म पितामह ने प्राण
राजा शांतनु के निधन के बाद पहले पांडु और फिर धृतराष्ट्र हस्तिनापुर के राजा बने. इस पूरे समय भीष्म पितामह ने सिंहासन के प्रति अपनी निष्ठा बनाए रखी. इसी कारण उन्होंने कौरवों का साथ दिया, भले ही वे अधर्म के रास्ते पर क्यों न हों.
महाभारत के युद्ध में अर्जुन के बाणों से घायल होने के बाद भीष्म पितामह तीरों की शैय्या पर गिर पड़े. लेकिन, इच्छा मृत्यु के वरदान के कारण उन्होंने तुरंत प्राण नहीं त्यागे थे. वे करीब 58 दिनों तक वहीं लेटे रहे और सूर्य के उत्तरायण होने का इंतजार करते रहे. मान्यता है कि उत्तरायण में प्राण त्यागने से मोक्ष की प्राप्ति होती है. जब सूर्य उत्तरायण हुआ, तब भीष्म पितामह ने भगवान श्रीकृष्ण का स्मरण करते हुए अपने प्राण त्याग दिए थे.
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