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धर्म

द्रौपदी ने मांगा था ऐसा वरदान, 5 की जगह होते 14 पति!

aajtak.in
  • 23 नवंबर 2017,
  • अपडेटेड 10:22 AM IST
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द्रौपदी पांचों पांडवों की रानी थी. वह खूबसूरत और उदार थीं लेकिन द्रौपदी की पहचान एक साहसी स्त्री के तौर पर ज्यादा की जाती है. वह एक ऐसी महिला थी जो अन्याय और अत्याचार सहकर चुप नहीं रह सकती थी. द्रौपदी के बारे में कई ऐसी बातें हैं जो शायद आपको नहीं पता होंगी, आइए जानते हैं द्रौपदी के बारे में ये बातें...

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द्रौपदी संयोग से पांचों पांडवों की पत्नी नहीं बनी थीं बल्कि सब कुछ पूर्व निर्धारित था. श्रीकृष्ण ने द्रौपदी को बताया कि पूर्व जन्म में उसने मनभावन वर की प्राप्ति हेतु शिव की आराधना की थी. पूर्व जन्म में द्रौपदी ने 14 गुणों वाले वर की कामना की थी. भगवान शिव ने उसकी भक्ति से प्रसन्न होकर उसे वरदान तो दे दिया लेकिन...

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भगवान शिव ने द्रौपदी को बताया कि किसी एक इंसान में इतने सारे गुण एक साथ होना संभव नहीं है. लेकिन वह अपनी जिद पर अड़ी रहीं और भगवान शिव से 14 गुणों वाले वर का वरदान देने के लिए कहा. तब भगवान शिव ने वरदान दिया कि उसे अगले जन्म में 14 पतियों के रूप में मनचाहा वरदान मिल जाएगा. द्रौपदी पूर्व जन्म में नल और दमयंती की पुत्री नलयनी थी.

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द्रौपदी ने भगवान शिव से वरदान मांगा कि उन्हें ऐसा वर मिले जिसके अंदर कम से कम ये 5 गुण मौजूद हों- धर्म, शक्तिशाली, धनुर्धर में पारंगत, धैर्य, रूपवान. द्रौपदी ने इतने सारे गुणों वाले वर की कामना की थी.

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भगवान शिव के इस वरदान के बाद द्रौपदी ने पूछा कि यह वरदान है या फिर अभिशाप? फिर भगवान शिव ने उसे आशीर्वाद दिया कि वह हर दिन स्नान के बाद पवित्र हो जाएगी.

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द्रौपदी ने जिन 14 गुणों की कामना की थी वे सभी पांचों पांडवों में मौजूद थे. युधिष्ठिर धर्म, भीम बल, और अर्जुन साहस, जबकि नकुल और सहदेव रूपवान गुणों से युक्त थे. इस तरह पांचों पांडवों में सामूहिक तौर पर सभी 14 गुण मौजूद थे.

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द्रौपदी ने पांचों पांडवों की पत्नी बनने से पहले एक शर्त रखी थी. द्रौपदी की शर्त थी कि वह किसी और स्त्री के साथ अपनी गृहस्थी कभी साझा नहीं करेंगी. उस समय बहुविवाह प्रथा के बावजूद पांडव इंद्रप्रस्थ में दूसरी पत्नियां नहीं ला सकते थे. हालांकि अर्जुन बाद में द्रौपदी की सहमति से अपनी दूसरी पत्नी सुभद्रा को लाए थे. श्रीकृष्ण की सलाह से द्रौपदी ने सुभद्रा को अपने घर में जगह दे दी थी.

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द्रौपदी के स्वयंवर में दुर्योधन ने भाग नहीं लिया था-
द्रौपदी के स्वयंवर में दुर्योधन ने हिस्सा ही नहीं लिया था. इसके पीछे वजह यह थी कि दुर्योधन कलिंग की राजकुमारी भानुमती से विवाह कर चुका था. उसने राजकुमारी से वादा किया था कि वह दूसरा विवाह नहीं करेगा. दुर्योधन ने अपना वादा निभाया भी.

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द्रौपदी को दुर्वासा ऋषि ने बचाया था?
द्रौपदी के चीरहरण से संबंधित एक अन्य रोचक कहानी मिलती है. शिव पुराण में द्रौपदी को चीरहरण से बचाने का श्रेय दुर्वासा ऋषि के एक वरदान को दिया गया है. एक बार गंगा में स्नान करते वक्त साधु के वस्त्र पानी में बह गए. तब द्रौपदी ने अपनी साड़ी से एक हिस्सा फाड़कर साधु को दे दिया जिसके बाद साधु ने द्रौपदी को एक वरदान दिया. इसी वरदान की वजह से दु:शासन को द्रौपदी को निर्वस्त्र करने में सफलता नहीं मिली.

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द्रौपदी एक बहुत ही साहसी स्त्री थीं. जब उनका अपमान हुआ तो उन्होंने सीधे हस्तिनापुर के राजा धृतराष्ट्र से न्याय की मांग की. सैरान्ध्री के रूप में किचक ने जब उसका अपमान करने की कोशिश की तो उसने फिर राजा विराट से न्याय दिलाने का अनुरोध किया. एक महिला के मान-सम्मान की रक्षा करने में असफल रहने पर उन्होंने सबके सामने राजा विराट और धृतराष्ट्र की आलोचना की. उसने चीरहरण अध्याय के बाद महान योद्धाओं भीष्म, द्रोण, कृपाचार्य और अपने पतियों को भी खूब धिक्कारा था.

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