देवों के देव महादेव की काशी नगरी के महाश्मशान घाट पर अनोखी होली खेली जाती है. यहां अबीर और गुलाल से नहीं बल्कि जली हुई चिताओं की राख से लोग होली खेलते हैं. बता दें, यहां होली खेलने की ये परम्परा सदियों से चली आ रही है. माना जाता है यह परंपरा करीब 350 साल से निभाई जा रही है. इस तरह की होली खेलने की शुरुआत यहां सबसे पहले राजा मानसिंह ने की थी.
चिता की भस्म से खेली जाने वाली इस होली का आयोजन वाराणसी के मणिकर्णिका घाट पर होता है, जिसमें शामिल होने के लिए काशीवासियों के साथ श्मशान घाट पर रहने वाले अघोरी भी शामिल होते हैं.
इस अनोखी होली को खेलते समय वहां मौजूद लोग 'खेले मशाने में होली, दिगम्बर खेले मशाने में होली' वाला संगीत बजाते हुए एक दूसरे को रंग की जगह शरीर पर भस्म और चिताओं की राख मलते हुए नजर आते हैं.
हमेशा की तरह इस बार भी चिता की भस्म से खेली जाने वाली इस होली में शंखनाथ, ढोल नगाड़े के साथ भोले बाबा के भक्तों ने उनके जयकारे भी लगाए. जिसके बाद यहां मौजूद भक्तों ने जमकर घाट पर होली खेली .
हिंदू धर्म की मान्यता के अनुसार भोले नाथ जब माता पार्वती का गौना करवाकर हिमालय पहुंचे तो उनके कई गड़ उस समय वहां शामिल नहीं हो पाए थे. जिसके बाद महाश्मशान पर बाबा ने चिता की भस्म से होली खेलकर अपने भक्तों को खुशी प्रदान की.
इस होली की खासियत यह है कि बनारस के महाश्मशान में भोलेनाथ के भक्त जलती चिताओं के बीच चिता की भस्म से यह होली खेलते हैं. करीब 350 साल से निभाई जा रही इस परंपरा को देखने के लिए हर बार की तरह इस बार भी लोग देश से ही नहीं विदेशों से भी पहुंचे हुए थे.