Somnath Temple: 101 तोपों की सलामी! 75 साल पहले ऐसे हुई थी सोमनाथ मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा

गुजरात के सोमनाथ मंदिर के अमृत महोत्सव मनाया जा रहा है. इस शुभ अवसर पर 11 मई को देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी शिरकत करने वाले हैं. इस बीच 84 साल के भास्कर भाई वैध ने 1951 के ऐतिहासिक प्राण प्रतिष्ठा महोत्सव की यादें ताजा की हैं.

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11 मई 1951 को हुई प्राण प्रतिष्ठा के दौरान 101 तोपों की सलामी दी गई थी. 11 मई 1951 को हुई प्राण प्रतिष्ठा के दौरान 101 तोपों की सलामी दी गई थी.

ब्रिजेश दोशी

  • गिर सोमनाथ,
  • 10 मई 2026,
  • अपडेटेड 6:01 PM IST

गुजरात में अरब सागर के किनारे बसे देश के पहले ज्योतिर्लिंग सोमनाथ मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा के 75 साल पूरे होने पर पूरे सोमनाथ में अमृत महोत्सव मनाया जा रहा है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और सोमनाथ मंदिर ट्रस्ट के चेयरमैन की प्रेरणा देने वाली मौजूदगी में मनाए जाने वाले इस ऐतिहासिक उत्सव ने एक बार फिर 11 मई 1951 की शानदार कहानी को जिंदा कर दिया है.

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इस मौके पर 84 साल के इतिहासकार भास्कर भाई वैध ने 75 साल पहले हुए सोमनाथ मंदिर के प्राण प्रतिष्ठा महोत्सव के ऐतिहासिक पलों को अपने शब्दों में बयां किया है. वो लम्हा उन्होंने अपनी आंखों से देखा है. इसलिए न सिर्फ यादें, बल्कि एक पूरे युग का शानदार इतिहास उनके शब्दों में धड़कता हुआ लग रहा था.

भास्कर भाई ने कहा कि उस वक्त मैं सिर्फ 10 साल का था. मैं अपने पिता के साथ सोमनाथ मंदिर में हुए प्राण प्रतिष्ठा महोत्सव में मौजूद था. पूरा प्रभास पाटन ‘जय सोमनाथ’ के जयकारों से गूंज उठा. जहां तक मेरी नजर जाती थी, हर तरफ भक्तों का हुजूम दिखाई देता था.

प्राण प्रतिष्ठा में 101 तोपों की सलामी
उन दिनों को याद करते हुए भास्कर भाई ने बताया कि मंदिर परिसर में 101 तोपें लगाई गई थीं. प्राण प्रतिष्ठा के पवित्र क्षण में 101 तोपों की सलामी दी गई थी. तोपों की गर्जना से पूरे प्रभास पाटन में भक्ति और गर्व की भावना फैल गई. उस पल को याद करके आज भी मेरे रोंगटे खड़े हो जाते हैं. केवल जमीन पर ही नहीं, बल्कि समुद्र में भी इस ऐतिहासिक क्षण का एक अनोखा नजारा मुझे याद है.

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उन्होंने कहा कि सोमनाथ मंदिर के सामने अरब सागर में करीब 101 नावों में मछुआरे समुदाय के लोग घूम रहे थे. सभी नावों से 'जय सोमनाथ' का उद्घोष सुनाई दे रहा था. भास्कर भाई ने भावुक होकर कहा कि समुद्र की लहरों और जयकारों के बीच बना दृश्य आज भी उनकी आंखों के सामने तैरता है.

वह आगे बताते हैं, उस समय के इंतजाम की बात करें तो प्रसाद का कभी न खत्म होने वाला भंडार और भाटिया धर्मशाला के कई कमरे बूंदी के लड्डू और गाठिया प्रसाद से भरे रहते थे. देश के कई कोनों से आए लाखों भक्तों के लिए प्रसाद बांटने का काम दिन-रात लगातार चलता रहता था.

101 पवित्र नदियों-समुद्रों के पानी से जलाभिषेक
पानी की सुविधा के लिए हर जगह टंकियां बनाई गई थीं. उस समय आज की तरह नल-जल योजना या पानी की सुविधा नहीं थी. लाखों भक्तों को पीने का साफ पानी मिले, इसके लिए हर जगह बड़ी-बड़ी टंकियां बनाई गईं. सेवा भाव से लोग लगातार पानी और प्रसाद बांटते रहते थे. उन्होंने कहा कि जब 11 मई 1951 को सोमनाथ मंदिर का उद्घाटन हुआ तो देश-विदेश की 101 पवित्र नदियों, झरनों, समुद्रों और झीलों के पवित्र जल से मंदिर का अभिषेक किया गया था. यह अभिषेक राष्ट्रीय एकता का प्रतीक भी बन गया.

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