Premanand Maharaj: हिंदू परंपरा में भक्ति को कभी भी जाति, कुल या जन्म की सीमाओं में नहीं बांधा गया है. फिर भी समाज में आज भी ऐसी धारणाएं मौजूद हैं, जो इंसान की पहचान उसके कुल और जाति तय करने लगती हैं. जबकि भक्ति का मार्ग इन सभी भेदों को तोड़कर केवल समर्पण, आचरण और भाव को महत्व देता है. यही कारण है कि जब कोई व्यक्ति स्वयं को पूर्ण रूप से ठाकुर जी को अर्पित कर देता है, तब उसकी पहचान न किसी कुल से होती है और न किसी जाति से, बल्कि वह केवल और केवल हरि का हो जाता है. इसी से जुड़ी एक समस्या लेकर भक्त वृंदावन मथुरा के जाने माने बाबा प्रेमानंद महाराज के पहुंचा. भक्त ने महाराज जी से कहा कि मैं अति तुच्छ अदम एवम नीच कुल में जन्मा हूं.'
प्रेमानंद महाराज ने दिया कुल से जुड़ा ये उत्तर
प्रेमानंद महाराज ने उस भक्त को बीच में रोकते हुए कहा कि, 'कुल का तो पहले भ्रम हटाओ. आज के बाद ये शब्द कभी मत बोलना क्योंकि हमारे यहां इस शब्द की कोई मान्यता नहीं है. जब हम ठाकुर जी को स्वयं को समर्पित कर चुके हैं, तो हमारी पहचान अब किसी सांसारिक कुल या गोत्र से नहीं, बल्कि अच्युत प्रभु से होती है. फिर अपने कुल का स्मरण क्यों करें? चाहे कोई चंडाल कुल में जन्मा हो, यदि वह सच्चे भाव से भजन करता है और शुद्ध आचरण पर चलता है, तो उसके नाम के उच्चारण मात्र से भी हम उसका चरणामृत लेकर माथे से लगाएंगे.'
भक्ति का मार्ग है कुल की परंपरा से ऊपर
आगे प्रेमानंद महाराज कहते हैं कि, 'हमारे लिए वही श्रेष्ठ है जो भक्ति के मार्ग पर है. भक्ति ही सर्वोपरि है और जो भक्ति को धारण करता है, वही सर्वोपरि होता है. इसमें कुल, जाति या ऊंच-नीच का कोई स्थान नहीं है. आज से तिलक धारण किया है, तो समझिए कि अब आप अच्युत गोत्री हैं, केवल और केवल हरि के हैं.'
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