सद्गुरु आज के समय के सबसे चर्चित आध्यात्मिक गुरुओं में से एक हैं. योग, ध्यान और आत्म-जागरूकता के जरिए वे लोगों को एक अलग तरह से जीवन जीने की राह दिखाते हैं. हर साल हजारों लोग शांति और सुकून की तलाश में कोयंबटूर स्थित ईशा योग केंद्र पहुंचते हैं. इन्हीं में से एक हैं 37 साल की पूजा. वो कलाकार जिसकी जिंदगी बाहर से परफेक्ट थी, लेकिन मन में कहीं खालीपन था. आइए जानते हैं ईशा योग केंद्र में रह रहीं पूजा का अनुभव.
एक कलाकार की अधूरी तलाश
मेरा नाम पूजा है और मेरी उम्र 37 साल है. मैं एक कलाकार हूं. पिछले छह सालों से मैं कोयंबटूर के ईशा योग केंद्र में मौन में रह रही हूं. पहले जिंदगी बहुत अलग थी जब मैं लिखती थी, पेंटिंग करती थी, गाने बनाती थी और एक्सहिबिशन में हिस्सा लेती थी. लेकिन कई सालों तक तलाश करने के बाद भी मुझे कोई ऐसी दिशा नहीं मिल रही थी, जो मेरे मन को संतुष्ट कर सके. शायद यही खोज मुझे यहां तक ले आई. ईशा आने से पहले, मेरा जीवन कई शहरों और करियर के बीच गुजर चुका था. मैं शिमला और पंचकुला में पली-बढ़ी, फिर दिल्ली और इंग्लैंड में पढ़ाई की. मुंबई में मैंने एक राइटर के तौर पर काम किया और कला प्रदर्शनियों के लिए जापान भी जाती रही. मैंने पेंटिंग और सिंगिंग, सब कुछ आजमाया, इस उम्मीद में कि कहीं न कहीं मुझे वो सुकून मिलेगा जिसकी तलाश थी. लेकिन सच ये है कि अंदर से मुझे बिल्कुल सुकून नहीं मिल रहा था.
सदगुरु से पहली मुलाकात
साल 2019 में मैंने 'काशी क्रम यात्रा' में हिस्सा लिया, जिसे 'ईशा सेक्रेट वॉक्स' आयोजित करता है. वहीं मैंने पहली बार सद्गुरु को सामने से देखा. यह कोई फिल्मी पल नहीं था, लेकिन मेरे लिए वह अनुभव बेहद अलग और गहरा था. जब उन्होंने मंत्रोच्चार शुरू किया, तो ऐसा लगा जैसे कोई अदृश्य लहरें पूरे हॉल में फैल रही हों. और तभी मेरी आंखों से आंसू बहने लगे. अजीब बात ये थी कि मुझे कुछ खास महसूस नहीं हो रहा था, फिर भी आंसू रुक नहीं रहे थे. ऐसा लगा जैसे मेरे आसपास बैठे लोग गायब हो गए हों और बस वही नजर आ रहे हों. मुझे लगा जैसे आसपास की हर चीज बदल गई हो. उस दौरान मैं बिना वजह रोने लगी थी. मुझे समझ नहीं आ रहा था कि ऐसा क्यों हो रहा है? लेकिन उस अनुभव ने मेरे भीतर कुछ छू लिया था.
दस दिन बाद मैंने 'इनर इंजीनियरिंग कंप्लीशन प्रोग्राम' किया. वहां भी मुझे वैसी ही गहराई और शांति का अनुभव हुआ. मेरे लिए यह किसी विश्वास को अपनाने या कोई नई पहचान बनाने की बात नहीं थी, बल्कि यह एक ऐसा अनुभव था, जिसने मेरे अंदर 'होने का एक नया तरीका दिखाया. इसके बाद मैं लगातार अलग-अलग कार्यक्रमों में जाने लगी जैसे टेनेसी, न्यूयॉर्क, डलास और टोरंटो तक. जितना मैं इस रास्ते से जुड़ती गई, उतना ही मुझे सद्गुरु की ओर खिंचाव महसूस होने लगा. एक समय ऐसा आया जब मुझे लगा कि मेरा जीवन पूरी तरह इसी दिशा में बह रहा है.'
ईशा योग केंद्र एक नया मोड़
फरवरी 2020 में मैंने फैसला लिया और ईशा योग केंद्र आ गई. यहां आकर मुझे लगा कि अब मुझे शांति मिलेगी, लेकिन असल में इस रास्ते ने मुझसे संयम और अनुशासन मांगा. एक मुलाकात में सद्गुरु ने मुझसे कहा कि मैं साधना जारी रखूं, ध्यानलिंग में समय बिताऊं और मौन में रहूं. उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा था, 'तुम मेरे साथ अटक गई हो.' दो दिन बाद ही मैंने मौन धारण कर लिया था. शुरुआत आसान नहीं थी. मेरा मन लगातार भागता रहता था, भावनाएं बदलती रहती थीं. मौन वैसा शांत अनुभव नहीं था जैसा लोग सोचते हैं. यह अनुभव कठिन था. लेकिन धीरे-धीरे सब बदलने लगा. मैंने अपने विचारों को अलग नजर से देखना शुरू किया, जैसे मैं उन्हें महसूस कर रही हूं, लेकिन उनमें डूब नहीं रही.
मेरी दिनचर्या बदल गई. मैं रोज सुबह 3:30 या 4 बजे उठती हूं, साधना करती हूं और ध्यानलिंग में लंबे समय तक बैठती हूं. अब मेरा जीवन शांति और एक साधारण दिनचर्या में ढल गया है. करीब डेढ़-दो साल बाद मुझे 'सम्यमा' कार्यक्रम के लिए बुलाया गया. यह एक गहरा और चुनौतीपूर्ण अनुभव था. मुझे कहा गया कि बस निश्चल रहो, पूरी तीव्रता के साथ मौजूद रहो और कोई इरादा मत रखो. उस समय मैंने हर दिन कई घंटे ध्यानलिंग में बिताए. वह अनुभव अजीब था जिसमें समय लंबा भी लगता था और छोटा भी, लेकिन ध्यान कभी भटकता नहीं था.
अभिव्यक्ति से ध्यान तक
एक समय था जब मैं अपने आप को चीजों में बिजी रखती थी जैसे लिखना, गाना, पेंटिंग करना. लेकिन मौन की स्थिति ने मुझे कुछ बिल्कुल अलग सिखाया. मौन से धैर्य, स्थिरता और अनिश्चितता सिखाई. जिसके लिए एक अलग तरह का अनुशासन चाहिए, जो बाहर से नहीं दिखता है. लेकिन मन से बहुत गहरा होता है. आज भी मैं ईशा योग केंद्र में हूं और मौन में ही जी रही हूं. अब खुद को 'अलग' महसूस करने की भावना भी पहले जैसी नहीं रही. मैं अपने जीवन को किसी समाधान की तरह नहीं पेश करती, न ही इसे कोई त्याग मानती हूं. मेरे लिए मौन खालीपन नहीं है. यह एक अभ्यास है, एक ढांचा है और किसी हद तक एक घर भी है. यह मुझे कम शोर और ज्यादा स्थिरता के साथ जीना सिखाता है. शायद यह रास्ता हर किसी के लिए नहीं है, लेकिन मेरे लिए यही वह रास्ता है जिसे मैंने चुना है.
aajtak.in