Garud Puran: मत्यु या मौत, एक ऐसा सच जिसको कोई नहीं झुठला नहीं सकता. मृत्यु के इन रहस्यों से जुड़ा भगवान विष्णु और उनके वाहन गरुड़ जी के बीच का संवाद गरुड़ पुराण में वर्णित मिलता है. एक बार गरुड़ जी ने भगवान विष्णु से पूछा कि मनुष्य की मृत्यु कैसे होती है, आखिरी समय में उसे क्या अनुभव होता है?
प्रथम अध्याय: मृत्यु के ठीक 5 मिनट पहले का रहस्य
भगवान विष्णु बताते हैं कि जब किसी की मृत्यु होने वाली होती है और यमराज का बुलावा आता है, तब उसकी इंद्रियां ढीली होने लगती हैं. मृत्यु से ठीक 5 मिनट पहले मनुष्य एक अजीब सी स्थिति में प्रवेश करता है, जिसे दिव्य दृष्टि का उदय कहा जाता है. इस अवस्था में उसे अपने पूरे जीवन की घटनाएं दिखाई देने लगती हैं और उसके अच्छे-बुरे सभी कर्म उसकी आंखों के सामने आ जाते हैं. उस समय आवाज रुक जाती है और वह चाहकर भी बोल नहीं पाता है. इसी समय यमदूत वहां आते हैं, जिनका स्वरूप पापी आत्मा को अत्यंत भयानक प्रतीत होता है, जबकि पुण्यात्मा को दिव्य प्रकाश और देवदूतों के दर्शन होते हैं.
द्वितीय अध्याय: मृत्यु के बाद का मार्ग और यमलोक यात्रा
मृत्यु के बाद आत्मा को यमदूत पकड़कर यमलोक की ओर ले जाते हैं, जो एक कठिन और लंबी यात्रा होती है. इस मार्ग में वैतरणी नदी आती है, जो रक्त और पीप से भरी होती है और उसमें भयानक जीव तथा मगरमच्छ रहते हैं, जो पापी आत्माओं को कष्ट देते हैं. मार्ग में अनेक नगर और स्थान आते हैं. जहां आत्मा को उसके कर्मों के अनुसार दंड मिलता है, कहीं आग, कहीं बर्फ और कहीं कांटों के वन होते हैं.
एक कथा में राजा श्वेत का वर्णन मिलता है, जिसने जीवन में केवल दान दिया लेकिन पितृ तर्पण नहीं किया, जिसके कारण मृत्यु के बाद उसे स्वर्ण महल तो मिला लेकिन भोजन नहीं मिला और वह अत्यंत पीड़ा में रहा, बाद में उसे अपने कर्मों का बोध हुआ.
तृतीय अध्याय: यमराज की सभा और न्याय
यमराज की सभा में चित्रगुप्त प्रत्येक आत्मा के कर्मों का पूरा लेखा-जोखा प्रस्तुत करते हैं और वहां कोई भी सत्य छिपा नहीं सकता है. यहां हर व्यक्ति को उसके कर्मों के अनुसार दंड दिया जाता है, जैसे धन हड़पने वालों को तप्त कुंभ नर्क मिलता है. गुरु और बड़ों का अपमान करने वालों को रौरव नर्क मिलता है. स्त्रियों का अपमान करने वालों को कठोर यातनाएं दी जाती हैं. भगवान विष्णु बताते हैं कि जो व्यक्ति गौदान, जल सेवा और अन्नदान करता है, उसे यमलोक के मार्ग में किसी प्रकार की कठिनाई नहीं होती और उसकी आत्मा को शांति मिलती है.
चतुर्थ अध्याय: ऋषि वशिष्ठ का मोक्ष उपदेश
भगवान विष्णु एक कथा सुनाते हुए कहते हैं कि, 'ऋषि वशिष्ठ अपने शिष्यों को समझाते हैं कि यह शरीर एक वस्त्र के समान है जिसे आत्मा धारण करती है और समय आने पर बदल देती है. आत्मा का यह चक्र जन्म और मृत्यु के रूप में चलता रहता है, जिससे मुक्ति केवल भक्ति, ज्ञान और सद्कर्मों से ही संभव है. मृत्यु के समय 'ऊं' का जाप, गंगाजल और तुलसी दल का महत्व अत्यंत माना गया है, जिससे आत्मा को शांति मिलती है और उसे दिव्य मार्ग की प्राप्ति होती है.
पंचम अध्याय: स्त्री और पुरुष के कर्मों का फल
गरुड़ पुराण में बताया गया है कि जो स्त्री अपने परिवार की सेवा धर्म समझकर करती है, उसे स्वर्ग की प्राप्ति होती है. जो पुरुष अपनी पत्नी, परिवार और संतान का सम्मान करता है, उसे पितृलोक प्राप्त होता है. इसके विपरीत जो व्यक्ति परिवार में कलह और द्वेष फैलाता है, वह अंधकारमय नर्क में जाता है. जहां उसे लंबे समय तक कष्ट सहना पड़ता है.
षष्ठ अध्याय: अंतिम संस्कार और पिंडदान का महत्व
मृत्यु के बाद 10 दिनों तक किया जाने वाला पिंडदान अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है क्योंकि इससे आत्मा को सूक्ष्म शरीर प्राप्त होता है, जिससे वह यमलोक की यात्रा कर सके. यदि श्राद्ध और तर्पण विधिपूर्वक नहीं किया जाए तो आत्मा प्रेत योनि में भटकती रहती है. आत्मा उस दौरान मानसिक कष्ट अनुभव करती है, इसलिए यह कर्म अत्यंत आवश्यक माना गया है.
सप्तम अध्याय: भगवान विष्णु का आश्वासन
भगवान विष्णु गरुड़ को बताते हैं कि जो व्यक्ति श्रद्धा पूर्वक गरुड़ पुराण का श्रवण या पाठ करता है, उसके सभी पाप नष्ट हो जाते हैं. उसे अंततः वैकुंठ धाम की प्राप्ति होती है. यह ज्ञान केवल भय उत्पन्न करने के लिए नहीं बल्कि मनुष्य को धर्म और सत्य के मार्ग पर चलाने के लिए दिया गया है.
अष्टम अध्याय: सूक्ष्म शरीर की यात्रा
मृत्यु के बाद आत्मा एक सूक्ष्म शरीर धारण करती है, जो भूख और प्यास का अनुभव करता है. यमदूत इस आत्मा को उसके कर्मों के अनुसार आगे ले जाते हैं और उसे उसके परिवार द्वारा किए गए दान और कर्मों का ही फल प्राप्त होता है. यही कारण है कि मृत्यु के बाद दान और पुण्य का महत्व और अधिक बढ़ जाता है.
नवम अध्याय: यमलोक के द्वारपाल
आत्मा को यात्रा के दौरान यमपुरी के मुख्य द्वार पर श्याम और शबल नामक दो भयानक कुत्ते पहरा देते हैं, जो केवल पापी आत्माओं को ही डराते हैं. जो आत्माएं धर्म, दया और सत्य के मार्ग पर चली होती हैं, वे शांतिपूर्वक यमलोक में प्रवेश करती हैं. क्योंकि वहां केवल कर्मों का न्याय होता है, किसी का पद या पहचान नहीं.
दशम अध्याय: पुनर्जन्म का चक्र
कर्मों के अनुसार, आत्मा 84 लाख योनियों में जन्म ले सकती है, जैसे पशु, पक्षी, वृक्ष या अन्य जीव. मनुष्य जन्म अत्यंत दुर्लभ माना गया है, जो केवल अच्छे कर्मों के फलस्वरूप प्राप्त होता है. इसलिए कहा गया है कि इस जीवन को व्यर्थ नहीं गंवाना चाहिए क्योंकि यही मोक्ष का अवसर है.
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