Garud Puran: गरुड़ पुराण हिंदू धर्म का एक प्रमुख धार्मिक ग्रंथ है, जिसे 18 महापुराणों में गिना जाता है. यह ग्रंथ भगवान विष्णु और उनके वाहन गरुड़ के बीच संवाद के रूप में लिखा गया है. इसमें जीवन, मृत्यु और उसके बाद की यात्रा के बारे में विस्तार से बताया गया है. खासतौर पर यह ग्रंथ कर्मों के फल, स्वर्ग-नरक, पाप-पुण्य और आत्मा की स्थिति को समझाता है.
गरुड़ पुराण में यह भी बताया गया है कि इंसान के अच्छे और बुरे कर्मों का क्या परिणाम होता है और मृत्यु के बाद आत्मा को किन-किन अवस्थाओं से गुजरना पड़ता है. इसी वजह से हिंदू परंपरा में किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद इस ग्रंथ का पाठ किया जाता है, ताकि आत्मा की शांति हो और परिवार को जीवन के सत्य का ज्ञान मिले.
वहीं, गरुड़ पुराण में संस्कार से जुड़ी बातों का जिक्र भी किया गया है, जिसमें सबसे खास है अंतिम संस्कार. यानी जहां से व्यक्ति की अंतिम यात्रा शुरू हो जाती है. दरअसल, गरुड़ पुराण में बताया गया है कि किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद किए जाने वाले कर्मकांडों में अंतिम संस्कार का बहुत खास महत्व होता है. माना जाता है कि सही विधि से किया गया अंतिम संस्कार आत्मा को शांति देता है और उसे मोक्ष की ओर ले जाने में मदद करता है.
क्या सिर्फ बेटे को ही होता है अधिकार?
अक्सर यह माना जाता है कि मुखाग्नि देने का हक केवल बेटे को ही होता है, लेकिन गरुड़ पुराण में ऐसा कोई कठोर नियम नहीं बताया गया है. परिस्थितियों के अनुसार परिवार के अन्य सदस्य भी यह जिम्मेदारी निभा सकते हैं. अगर किसी व्यक्ति का बेटा नहीं है, तो सबसे पहले यह जिम्मेदारी उसके पोते या परपोते को दी जाती है. अगर वे भी न हों, तो परिवार के अन्य नजदीकी सदस्य जैसे भाई, भतीजा या रिश्तेदार अंतिम संस्कार कर सकते हैं.
पत्नी और बेटी भी कर सकती हैं अंतिम संस्कार
गरुड़ पुराण के अनुसार, यदि मृतक का कोई पुत्र नहीं है, तो उसकी पत्नी को भी मुखाग्नि देने और श्राद्ध करने का अधिकार होता है. आज के समय में बेटियां भी यह जिम्मेदारी निभा रही हैं. कहीं भी यह साफ तौर पर नहीं कहा गया कि पुत्री अंतिम संस्कार नहीं कर सकती, इसलिए वह भी पूरे विधि-विधान से यह कर्म कर सकती है.
खास परिस्थिति में और कौन दे सकता है मुखाग्नि?
अगर परिवार में कोई करीबी सदस्य न हो, तो मृतक का शिष्य या कोई बेहद नजदीकी मित्र भी अंतिम संस्कार कर सकता है. यहां सबसे जरूरी बात यह मानी गई है कि संस्कार श्रद्धा और नियमों के साथ किया जाए.
पिंडदान और तर्पण क्यों जरूरी?
अंतिम संस्कार के बाद पिंडदान और तर्पण करना भी बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है. मान्यता है कि इन कर्मों से आत्मा को शांति मिलती है और वह प्रेत योनि से मुक्त होकर पितृ लोक की ओर बढ़ती है.
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