राजस्थान के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल SMS अस्पताल के ट्रॉमा सेंटर में करीब चार महीने पहले हुई भयावह आग अब सिर्फ एक हादसा नहीं, बल्कि सिस्टम की चौंकाने वाली नाकामी बनकर सामने आई है. जांच कमेटी की रिपोर्ट ने उस रात की परत-दर-परत सच्चाई उजागर कर दी है जहां चेतावनियां अनसुनी रहीं, फैसले टलते रहे और जिम्मेदारी से लोग भागते नजर आए.
पहला सच: आग की सूचना सबसे पहले स्टाफ ने नहीं, मरीजों के परिजनों ने दी. रात करीब 11.30 बजे ICU-2 में शॉर्ट सर्किट की आशंका जताते हुए परिजनों ने बार-बार स्टाफ को बताया,लेकिन कोई हरकत नहीं हुई. दो-तीन बार कहने के बाद भी चुप्पी बनी रही. जब स्टोर रूम से धुएं का गुबार उठा, तब कहीं जाकर सिस्टम हिला.
दूसरा सच: आग जिस जगह लगी, वही सबसे बड़ा खतरा थी. जांच में सामने आया कि ICU-2 की मूल प्लानिंग 12 बेड की थी, लेकिन बेड नंबर-12 हटाकर वहीं स्टोर रूम बना दिया गया. यह स्टोर रूम मरीजों के बेड से सटा हुआ था और उसमें दवाइयां, कॉटन-गॉज और स्पिरिट जैसे ज्वलनशील पदार्थ रखे जाते थे, यही आग के लिए ईंधन बन गए.
तीसरा सच: आधे घंटे तक ‘चाबी’ ढूंढी जाती रही, आग फैलती रही. स्टोर रूम पर ताला था. धुआं उठने के बावजूद करीब 30 मिनट तक स्टाफ चाबी ढूंढता रहा. इंचार्ज और सेकेंड इंचार्ज, दीनदयाल अग्रवाल और कमल किशोर गुप्ता ने ताला लगाने के बाद चाबी कहां रखी, यह किसी को नहीं बताया था. हैरानी की बात यह कि जांच कमेटी को भी वह चाबी नहीं मिली.
चौथा सच: मदद की जगह डर ने ड्यूटी छोड़ी. फॉल सीलिंग में आग फैलने लगी, लाइटें पिघलने लगीं. इसी बीच नर्सिंग ऑफिसर उदयसिंह ने वॉर्ड बॉय अमित से ताला तोड़ने को कहा और खुद नर्सिंग स्टेशन से अपना काला बैग उठाकर ICU से बाहर निकल गया. कमेटी ने इस व्यवहार को आपात स्थिति में अप्रत्याशित बताया है.
पांचवां सच: मरीजों को बचाया परिजनों ने, स्टाफ नहीं. ICU बेड नंबर-7 पर भर्ती कनक सैनी के परिजन ने बताया कि रात 11.40 बजे उन्हें फोन पर शॉर्ट सर्किट की सूचना मिली. वे दौड़कर ICU पहुंचे और मरीज को गोद में उठाकर बाहर निकाला. इसी दौरान नर्सिंगकर्मी योगेश बाहर की ओर भागता दिखा. आग बढ़ने पर भी योगेश और उदय दोनों ड्यूटी पॉइंट छोड़ चुके थे.
छठा सच: CCTV ने वो सब देख लिया, जो शब्द नहीं कह पाए. 11.49 बजे वॉर्ड बॉय अमित ICU के दरवाजे पर किसी से बात करता दिखता है. उसी वक्त मरीज शीला को उनके पति प्रेम सिंह घसीटकर बाहर लाते हैं. कुछ सेकेंड बाद एक और मरीज बेड समेत बाहर निकाला जाता है. 29 सेकेंड बाद पांचवां मरीज ट्रॉली पर बाहर आता है लेकिन इस पूरे दौरान वॉर्ड बॉय किसी मरीज की मदद करता नहीं दिखता.
सातवां सच: अलार्म थे, पर बजे नहीं. सिस्टम था, पर चला नहीं. ICU में फायर अलार्म और स्मोक डिटेक्टर लगे थे, लेकिन कर्मचारियों के मुताबिक उस रात अलार्म नहीं बजे. फायर फाइटिंग सिस्टम की जांच का जिम्मा नर्सिंग अधीक्षक पर था, मगर बयान में साफ हुआ कि अंदरूनी सिस्टम का कभी इंस्पेक्शन ही नहीं हुआ, सिर्फ बाहरी प्रेशर पॉइंट चेक कर औपचारिकता निभाई गई.
नतीजा चार महीने बाद आई रिपोर्ट ने साफ कर दिया यह आग सिर्फ शॉर्ट सर्किट से नहीं, लापरवाही, अव्यवस्था और जिम्मेदारी से भागने की मानसिकता से फैली, जिसके चलते 6 लोगों की दर्दनाक मौत हो गई.
शरत कुमार