राजस्थान की कथावाचक और साध्वी प्रेम बाईसा की संदिग्ध परिस्थितियों में हुई मौत दूसरे दिन भी रहस्य बनी हुई है. शुक्रवार को उनके पैतृक गांव परेऊ (बालोतरा) में उन्हें समाधि के साथ अंतिम विदाई दी गई, लेकिन गांव की मिट्टी में उन्हें सुपुर्द करने के बाद भी ये सवाल जिंदा हैं कि आखिर उनकी मौत कैसे हुई. मौत का कारण अब भी साफ नहीं है और हर नम आंख इसी सवाल का जवाब तलाश रही है.
आंसुओं के बीच अनसुलझा सवाल
समाधि से पहले साध्वी प्रेम बाईसा की पार्थिव शरीर को अंतिम दर्शन के लिए रखा गया था. इस दौरान गांव में महिलाएं, पुरुष, बुजुर्ग और युवा हर कोई नम आंखों से उन्हें अंतिम श्रद्धांजलि देने पहुंचा. पुष्पांजलि अर्पित करते हुए लोगों की आंखों में आंसू थे और चेहरे पर अविश्वास कि जिस बेटी ने गांव का नाम देशभर में रोशन किया, वह इतनी अचानक कैसे चली गई.
जब पार्थिव देह को समाधि स्थल की ओर ले जाया गया, तो माहौल और भी भावुक हो गया. मंत्रोच्चारण के बीच साधु-संतों और परिजनों ने विधिवत समाधि दी और साध्वी प्रेम बाईसा को मिट्टी सुपुर्द किया गया. इस दौरान “प्रेम बाईसा अमर रहे” के नारे गूंजते रहे, लेकिन हर नारे के पीछे दर्द और खालीपन साफ झलक रहा था.
मौन श्रद्धांजलि, जवाब का इंतज़ार
गांव के लोग और अनुयायी बताते हैं कि प्रेम बाईसा सिर्फ एक साध्वी नहीं थीं, बल्कि ज्ञान, संस्कार और पहचान थीं. उन्होंने अपने प्रवचनों और कथाओं से न सिर्फ राजस्थान, बल्कि देश के अलग-अलग हिस्सों में गांव परेऊ का नाम पहुंचाया. उनकी असामयिक मृत्यु ने पूरे गांव और उनके अनुयायियों को स्तब्ध कर दिया है.
हालांकि अंतिम संस्कार हो चुका है, लेकिन मौत का रहस्य अब भी गहराया हुआ है. सवाल उठ रहे हैं कि आखिर साध्वी प्रेम बाईसा की मौत कैसे हुई. क्या यह आत्महत्या थी, हत्या थी, इन सवालों के जवाब फिलहाल किसी के पास नहीं हैं. जब तक जांच पूरी नहीं होती, तब तक साध्वी प्रेम बाईसा की समाधि के साथ-साथ उनके जीवन का यह आखिरी अध्याय भी रहस्य बनकर ही रहेगा.
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