नागौर के गांव गोठन में रहने वाले एक रिटायर्ड डॉक्टर ने कभी सोचा भी नहीं होगा कि एक फोन कॉल उनकी जिंदगी की सबसे बड़ी भूल बन जाएगा. एक ऐसा कॉल, जिसने न सिर्फ उनकी वर्षों की जमा पूंजी छीन ली, बल्कि यह भी सिखा गया कि डिजिटल दुनिया में डर सबसे बड़ा हथियार बन चुका है.
घटना 21 जनवरी 2026 की है. उस दिन डॉक्टर के पास एक कॉल आया- कॉलर ने खुद को पुलिस अधिकारी बताया और कहा कि हम थाने से बोल रहे हैं... आपके खिलाफ गंभीर मामला दर्ज होने वाला है. आरोप इतने गंभीर थे कि सुनते ही डॉक्टर के पैरों तले जमीन खिसक गई- ह्यूमन ट्रैफिकिंग और महिलाओं के साथ अश्लीलता जैसे आरोप.
शुरुआत में डॉक्टर को शक हुआ, लेकिन ठग बेहद शातिर थे. उन्होंने बातचीत का अंदाज, भाषा और दबाव ऐसा बनाया कि सब कुछ असली लगने लगा. कुछ ही देर में मामला फोन कॉल से वीडियो कॉल तक पहुंच गया. स्क्रीन पर पुलिस जैसा माहौल दिखाया गया.
ठगों ने डॉक्टर से कहा कि उन्हें डिजिटल अरेस्ट किया जा रहा है. उन्हें चेतावनी दी गई कि अगर सहयोग नहीं किया तो पुलिस उनके घर पहुंचकर गिरफ्तारी करेगी. साथ ही यह भी कहा गया कि मामला मीडिया तक पहुंच सकता है, जिससे उनकी छवि खराब हो जाएगी. यहीं से ठगी का खेल शुरू हुआ.
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डॉक्टर, जिन्होंने पूरी जिंदगी अपनी प्रतिष्ठा बनाई थी, इस डर से टूट गए कि समाज में बदनामी हो जाएगी. ठगों ने उन्हें भरोसा दिलाया कि अगर वे जांच के लिए पैसे ट्रांसफर कर देते हैं, तो मामला यहीं खत्म कर दिया जाएगा और उनका नाम क्लियर कर दिया जाएगा.
डर और घबराहट में डॉक्टर ने अपनी फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) तुड़वाई- पूरे 34 लाख रुपये. यह उनकी जिंदगी की सेविंग्स थी. बिना ज्यादा सोचे-समझे उन्होंने पूरी रकम ठगों द्वारा बताए गए बैंक खाते में ट्रांसफर कर दी.
पैसे भेजने के बाद कुछ देर तक तो सब शांत रहा. फिर धीरे-धीरे कॉल आना बंद हो गया. न कोई अपडेट, न कोई जवाब. तभी डॉक्टर को एहसास हुआ कि वे ठगी का शिकार हो चुके हैं.
घबराए डॉक्टर तुरंत साइबर थाने पहुंचे और घटना की शिकायत दर्ज करवाई. पुलिस ने मामले की गंभीरता को समझते हुए तुरंत कार्रवाई शुरू की. बैंक से संपर्क कर करीब 5 लाख 54 हजार 919 रुपये की राशि होल्ड करवाई गई, हालांकि बाकी रकम ठग निकाल चुके थे.
मामला दर्ज होते ही साइबर पुलिस हरकत में आ गई. उप अधीक्षक धरम पुनिया के नेतृत्व में टीमें बनाई गईं. तकनीकी जांच, कॉल डिटेल्स, बैंक ट्रांजेक्शन और लोकेशन ट्रैकिंग के जरिए आरोपियों की तलाश शुरू हुई.
करीब 15 दिनों तक लगातार पीछा और रेकी के बाद पुलिस को अहम सुराग मिले, जो दिल्ली तक पहुंचे. वहां आरोपियों के ठिकानों की पहचान की गई. उनकी एक्टिविटीज पर नजर रखी गई और मौका देखकर दबिश दी गई. इस दौरान चार आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया गया.
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गिरफ्तार आरोपियों में इमरान, विवेक कुमार, सलमान और योगेंद्र शामिल हैं. जांच में सामने आया कि ये सभी अलग-अलग पेशों से जुड़े हुए थे- कोई कपड़े की दुकान पर काम करता था, कोई सिलाई का काम करता था, जबकि एक आरोपी चार्टर्ड अकाउंटेंट (CA) था.
आरोपियों ने फर्जी फर्म के नाम से खुलवा रखा था अकाउंट
जांच में यह भी सामने आया कि आरोपियों ने बैंक में अपने नाम से और एक फर्जी फर्म RN Requirement के नाम से खाते खुलवा रखे थे. इन्हीं खातों के जरिए ठगी की रकम मंगवाई जाती थी और तुरंत निकाल ली जाती थी, ताकि ट्रैकिंग मुश्किल हो जाए.
नागौर पुलिस अधीक्षक रोशन लाल मीणा ने अपील की है कि किसी भी अनजान कॉल पर भरोसा न करें, खासकर जब कोई खुद को अफसर बताकर डराने की कोशिश करे. उन्होंने कहा कि कोई भी एजेंसी फोन या वीडियो कॉल के जरिए इस तरह पैसे ट्रांसफर करने को नहीं कहती.
उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि अपने बैंक खाते, सिम कार्ड या व्यक्तिगत जानकारी किसी के साथ शेयर करना खतरनाक हो सकता है. कई बार लोग थोड़े लालच या दबाव में आकर अपनी जानकारी दे देते हैं.
अगर कभी इस तरह की कोई संदिग्ध कॉल आए, तो घबराने के बजाय तुरंत साइबर हेल्पलाइन 1930 या राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल पर शिकायत दर्ज करानी चाहिए.
केशाराम गढ़वार