राजस्थान के डीडवाना से ऐसी तस्वीर सामने आई है, जिसने खाकी वर्दी के पीछे छिपे मानवीय चेहरे को सामने ला दिया. आमतौर पर पुलिस की पहचान सख्ती, कानून और कार्रवाई से जुड़ी होती है, लेकिन इस बार एक थाना अधिकारी ने अपने व्यवहार से साबित कर दिया कि वर्दी के भीतर संवेदनशील दिल धड़कता है. यह कहानी है एक दिव्यांग युवक की एक छोटी सी इच्छा और एक पुलिस अधिकारी के बड़े दिल की.
डीडवाना के बालिया गांव का रहने वाला 30 साल का नदीम जन्म से दिव्यांग है. उसके न हाथ हैं, न पैर. रोजमर्रा की जिंदगी भी उसके लिए किसी संघर्ष से कम नहीं. लेकिन इन सीमाओं के बीच उसने अपने मन में एक इच्छा संजो रखी थी. वह अपने इलाके के थाने को देखना चाहता था. पुलिस कैसे काम करती है, थाना कैसा होता है. यह सब जानने की उसकी जिज्ञासा थी.
कुछ दिन पहले गश्त के दौरान डीडवाना थाना अधिकारी राजेंद्र सिंह कमांडो की नजर नदीम पर पड़ी. बातचीत शुरू हुई तो नदीम ने मुस्कुराते हुए अपनी इच्छा बताई. एक साधारण-सी लगने वाली इच्छा नदीम के लिए बहुत बड़ी थी.
राजेंद्र सिंह ने नदीम को थाने आने के लिए इनवाइट किया. जब नदीम थाने पहुंचा तो वहां मौजूद पुलिसकर्मियों ने उसका स्वागत किया. लेकिन इसके बाद जो हुआ, उसने इस मुलाकात को खास बना दिया.
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थाना अधिकारी राजेंद्र सिंह खुद आगे बढ़े और नदीम को अपने कंधों पर बिठा लिया. पूरे थाने में यह दृश्य देखकर हर कोई भावुक हो उठा. कंधों पर बैठाकर उन्होंने नदीम को थाने का एक-एक हिस्सा दिखाया... लॉकअप, रिकॉर्ड रूम, कंट्रोल डेस्क, शिकायत कक्ष और हर जगह के काम के बारे में बताया. नदीम के चेहरे पर उत्साह और खुशी झलक रही थी.
यही नहीं, राजेंद्र सिंह ने अपनी पुलिस कैप नदीम के सिर पर रख दी. यह सम्मान का प्रतीक था. उस पल नदीम की आंखें नम हो गईं. वहां मौजूद पुलिसकर्मियों और लोगों ने इस दृश्य को मोबाइल कैमरों में कैद कर लिया.
देखते ही देखते यह सोशल मीडिया पर वायरल हो गया. लोगों ने दिल खोलकर थाना अधिकारी की तारीफ की. किसी ने लिखा- यही है असली पुलिसिंग, तो किसी ने कहा कि खाकी में भी दिल होता है. कई यूजर्स ने इसे इंसानियत की मिसाल बताया. लोगों का कहना है कि इस घटना से पुलिस के प्रति भरोसा और सम्मान दोनों बढ़े हैं.
थाना अधिकारी राजेंद्र सिंह कमांडो ने कहा कि जब नदीम भाई ने अपनी इच्छा बताई तो लगा कि यह मेरी जिम्मेदारी है. पुलिस समाज की सेवा के लिए भी है. अगर किसी दिव्यांग की छोटी-सी ख्वाहिश हम पूरी कर सकते हैं, तो इससे बड़ी खुशी क्या होगी.
केशाराम गढ़वार