सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी ने सिर्फ एक कानूनी बहस नहीं छेड़ी बल्कि उस पूरे ढांचे पर सवाल खड़ा कर दिया है, जहां कठोर कानूनों के बीच व्यक्तिगत स्वतंत्रता अक्सर सबसे कमजोर दिखाई देती है. सर्वोच्च अदालत अदालत ने साफ संकेत दिया है कि आतंकवाद से लड़ाई जरूरी है लेकिन संविधान की आत्मा उससे भी बड़ी है. UAPA जैसे कानूनों में लंबी कैद, धीमी सुनवाई और बेहद कम दोषसिद्धि दर को लेकर सुप्रीम कोर्ट की चिंता अब खुलकर सामने आ चुकी है.