6 जनवरी 2026 की तारीख में, वैश्विक राजनीति में एक नया अध्याय जुड़ चुका है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने वेनेजुएला पर सैन्य हमले का आदेश दिया, जिसके परिणामस्वरूप निकोलस मादुरो को गिरफ्तार कर लिया गया. यह घटना 'डोनरो डॉक्ट्रिन' के रूप में चर्चित हो रही है, जो अमेरिका की लैटिन अमेरिका में हस्तक्षेप की पुरानी नीति को पुनर्जीवित करती है. लेकिन इस घटना ने एशिया में तनाव बढ़ा दिया है, खासकर चीन और ताइवान के बीच. सवाल उठ रहा है कि क्या चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ताइवान के लिए इसी 'वेनेजुएला मॉडल' को अपनाकर बलपूर्वक एकीकरण कर सकते हैं? यह मॉडल अमेरिका की तरह सैन्य हस्तक्षेप, नेतृत्व को निशाना बनाना और अंतरराष्ट्रीय दबाव की अनदेखी करके लक्ष्य हासिल करने का प्रतीक बन गया है.
'वेनेजुएला मॉडल' अब एक आक्रामक विदेश नीति का प्रतीक बना
वेनेजुएला में 2024 के चुनावों के बाद मादुरो ने विवादास्पद जीत घोषित की, लेकिन विपक्ष और अमेरिका ने इसे धांधली बताया. 2025 में ट्रंप प्रशासन ने आर्थिक प्रतिबंधों को बढ़ाया, और अंततः जनवरी 2026 में सैन्य हमलों से मादुरो को पकड़ा गया. यह 'वेनेजुएला मॉडल' अब एक आक्रामक विदेश नीति का प्रतीक बन गया है, जहां एक शक्ति अपने प्रभाव क्षेत्र में हस्तक्षेप करती है, भले ही अंतरराष्ट्रीय कानून की अनदेखी हो. अमेरिका ने इसे 'लोकतंत्र की रक्षा' बताया, लेकिन चीन ने इसकी निंदा की.
ताइवान के संदर्भ में, यह मॉडल चीन के लिए आकर्षक लग सकता है. शी जिनपिंग ने 31 दिसंबर 2025 के अपने नववर्ष संबोधन में ताइवान के साथ 'एकीकरण' को 'अपरिहार्य' बताया. चीन ताइवान को अपना हिस्सा मानता है, और 'वन चाइना' नीति के तहत बल प्रयोग की धमकी देता रहा है. वेनेजुएला जैसा मॉडल का मतलब ताइवान नेतृत्व (जैसे राष्ट्रपति लाई चिंग-ते) को निशाना बनाना, सैन्य हमला या विशेष अभियान से 'कब्जा' करना है. लेकिन क्या यह व्यावहारिक है?
चीन ने जिस तरह मादुरो की गिरफ्तारी की कड़ी निंदा की, इसे 'संप्रभुता का उल्लंघन' बताया. उससे तो यही लगता है कि चीन इस तरह की हरकत ताइवान के साथ नहीं करने जा रहा है. पर कूटनीति यह नहीं कहती. कूटनीति में देश कहते कुछ और हैं और करते कुछ और हैं. चीनी सोशल मीडिया पर वेनेजुएला संकट को कुछ यूजर्स ताइवान के लिए सबक मानते हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि यह घटना चीन को अपनी क्षेत्रीय दावों (ताइवान, दक्षिण चीन सागर) को मजबूत करने के लिए प्रोत्साहित कर सकती है.
ताइवान में शी जिनपिंग के लिए ट्रंप का एक्शन एक बहाना हो सकता है
अमेरिका ने अपने बहुत पास में हस्तक्षेप किया, तो चीन क्यों न एशिया में करे? चीन की प्रेरणा स्पष्ट है. ताइवान के साथ आर्थिक और सैन्य तनाव बढ़ रहा है. 2025 में चीन ने ताइवान के आसपास बड़े सैन्य अभ्यास किए, और अमेरिका ने ताइवान को हथियार दिए. शी का लक्ष्य 2049 तक 'महान कायाकल्प' है, जिसमें ताइवान एकीकरण शामिल है. वेनेजुएला घटना से चीन को लग सकता है कि ट्रंप प्रशासन व्यस्त है, और एशिया में हस्तक्षेप कम करेगा. लेकिन विशेषज्ञ कहते हैं कि चीन अभी सतर्क रहेगा, क्योंकि ताइवान पर हमला वैश्विक अर्थव्यवस्था को प्रभावित करेगा. चीन को ताइवान की ज्यादा कीमत चुकानी पड़ जाएगी.
आर्थिक प्रतिबंध,सेना का नुकसान और वैश्विक कूटनीति में अकेले पड़ने का खतरा चीन के लिए ज्यादा होगा. वेनेजुएला ऑपरेशन में अमेरिका को कम विरोध मिला, लेकिन ताइवान पर हमले से जापान, ऑस्ट्रेलिया और भारत जैसे देश सक्रिय होंगे.साथ ही, ताइवान की सेना मजबूत है, और चीन की पीएलए अभी पूर्ण आक्रमण के लिए तैयार नहीं मानी जाती.
शी अगर यह मॉडल अपनाते हैं, तो और भी जोखिमों का सामना करना पड़ेगा. ताइवान पर सैन्य हमला विश्व युद्ध को आमंत्रित कर सकता है, क्योंकि अमेरिका ने 'रणनीतिक अस्पष्टता' की नीति अपनाई है. आर्थिक रूप से, चीन की जीडीपी प्रभावित होगी, क्योंकि ताइवान 90% उन्नत चिप्स बनाता है. चीनी सोशल मीडिया पर उत्साह है, लेकिन विशेषज्ञ कहते हैं कि बीजिंग सतर्क रहेगा.
यह इंडो-पैसिफिक में तनाव बढ़ाएगा. भारत जैसे देश, जो चीन से सीमा विवाद रखते हैं, अधिक सतर्क होंगे. वेनेजुएला घटना ने पहले ही रूस और ईरान को नाराज किया है, जो चीन के सहयोगी हैं.
एक्सपर्ट क्या कहते हैं?
काउंसिल ऑन फॉरेन रिलेशंस के अनुसार, वेनेजुएला ऑपरेशन चीन के लिए मॉडल नहीं है, क्योंकि लागत अलग हैं. ब्लूमबर्ग का कहना है कि शी के लिए ताइवान की कीमत ट्रंप के वेनेजुएला से ज्यादा है. सीएनएन में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार ताइवान की सत्तारूढ़ पार्टी के विधायक वांग तिंग-यू, जो विधानसभा की विदेश मामलों और रक्षा समिति के सदस्य हैं, ने इस विचार को खारिज किया है.उनका कहना है कि चीन अमेरिका नहीं है, और ताइवान वेनेजुएला नहीं है. चीन द्वारा ताइवान में वही काम करने की तुलना गलत और अनुचित है.
बेल्जियम स्थित थिंक टैंक इंटरनेशनल क्राइसिस ग्रुप के वरिष्ठ विश्लेषक विलियम यांग ने कहा कि वेनेजुएला के खिलाफ अमेरिकी कदम से चीन की ताइवान पर संभावित आक्रमण की गणना पर कोई प्रत्यक्ष और मौलिक प्रभाव नहीं पड़ेगा. राजनीतिक जोखिम परामर्श कंपनी यूरेशिया ग्रुप के चीन निदेशक डैन वांग ने कहा कि हालांकि मादुरो का हटना बीजिंग के व्यापक रणनीतिक प्रभाव के लिए बड़ा झटका है, लेकिन वह दक्षिण अमेरिका में अपने निवेश का लाभ उठाना जारी रख सकता है, खासकर बिजली आपूर्ति और दूरसंचार में – जहां महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचा परियोजनाओं से चीनी कंपनियों को हटाने से सामाजिक अस्थिरता हो सकती है.
यांग भी यही कहते हैं कि बीजिंग अपने आर्थिक हितों पर प्रभाव को कम करने को प्राथमिकता देगा , न कि क्षेत्र में अमेरिका के साथ पूर्ण भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा में शामिल होगा.
संयम श्रीवास्तव