गेहूं के दाम गिरे पर आटे की 'आग' बरकरार, मुनाफे की चक्की में क्यों पिस रहा आम आदमी?

जनवरी 2025 से अप्रैल 2026 के बीच गेहूं के दाम 29.39 से घटकर 24.41 रुपये प्रति किलो हो गए, लेकिन आटे की कीमतें लगभग स्थिर हैं. इससे स्पष्ट होता है कि गेहूं के दाम कम होने के बावजूद उपभोक्ताओं को कोई राहत नहीं मिली. किसान अपनी फसल न्यूनतम समर्थन मूल्य से कम दाम पर बेचने को मजबूर हैं, जबकि ब्रांडेड आटा और ब्रेड महंगे दामों पर बिक रहे हैं.

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सस्ता गेहूं और महंगी रोटी, किसान को नहीं मिल रहा मेहनत का अच्छा फल सस्ता गेहूं और महंगी रोटी, किसान को नहीं मिल रहा मेहनत का अच्छा फल

ओम प्रकाश

  • नई दिल्ली,
  • 29 अप्रैल 2026,
  • अपडेटेड 2:42 PM IST

जरा सोचिए, जब मंडियों में किसान का गेहूं सरकार के तय न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) की दहलीज तक नहीं छू पा रहा और वह अपनी फसल औने-पौने दाम पर बेचने को मजबूर है, तो क्या आपके किचन तक पहुंचने वाला ब्रांडेड आटा एक रुपया भी सस्ता हुआ? क्या आपके घर आने वाले ब्रेड के पैकेट की कीमत कम हुई? सच तो यह है कि एक तरफ खेतों में पसीना बहाने वाले की जेब कट रही है और दूसरी ओर आपकी थाली पर महंगाई की मार पड़ रही है. इस पूरी व्यवस्था के तीन मुख्य किरदार हैं. किसान, आटा मिल मालिक और उपभोक्ता. विडंबना देखिए कि घाटा हमेशा पहले और आखिरी किरदार के हिस्से ही आता है.

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इस पूरे लूट को पहले आंकड़ों से समझिए. केंद्रीय कृषि और उपभोक्ता मामले मंत्रालय से मिला डेटा बताता है कि जनवरी 2025 से अप्रैल 2026 के बीच गेहूं के दाम 29.39 से गिरकर 24.41 रुपये प्रति किलो पर आ गए. यानी करीब 5 रुपये प्रति किलो की सीधी गिरावट. बाजार का नियम कहता है कि गेहूं के दाम कम होने के बाद आटा भी सस्ता होना चाहिए था, लेकिन कंपनियों की मनमानी देखिए, उसी दौरान आटे की औसत कीमत 40.32 रुपये से घटकर महज 40.16 रुपये पर आकर टिक गई. यानी गेहूं 5 रुपये किलो सस्ता हुआ और उपभोक्ता को राहत मिली सिर्फ '16 पैसे' की. यह फासला साबित करता है कि किसान का घाटा किसी कंज्यूमर की बचत नहीं बन रहा, बल्कि यह बिचौलियों और ब्रांडेड कंपनियों का मुनाफा बन जाता है.

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सवाल यह है कि कच्चे माल के दाम में आई इस भारी गिरावट का लाभ आम आदमी की जेब तक क्यों नहीं पहुंचा? मंडी से मॉल के बीच का यह 'मुनाफा' आखिर जा किसकी जेब में रहा है? ध्यान रखिए, जब खेत की मिट्टी और पसीने से उपजा गेहूं मंडियों में अपनी कीमत के लिए सिसकने लगे, लेकिन बाजार में उसी गेहूं से बना आटे और ब्रेड का पैकेट आपकी जेब काटने पर आमादा हो, तो समझिए कि व्यवस्था की चक्की में सिर्फ अनाज नहीं, बल्कि किसान और उपभोक्ता दोनों का भरोसा भी पिस रहा है. यह नीतिगत विफलता और कॉरपोरेट लालच का वो गठजोड़ है जहां उत्पादक बेबस है और खरीदार बेहाल. यह सिर्फ किसान की हार नहीं, बल्कि आपकी थाली पर सरेआम डकैती भी है, जिस पर लगाम कसने वाला फिलहाल कोई नजर नहीं आता.

कायदे से गेहूं सस्ता होने के बाद आटे के दाम में भी कमी आनी चाहिए थी. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. सवाल यह है कि क्या किसान का घाटा ही उपभोक्ता की राहत है, या फिर इस खेल में उपभोक्ताओं के नाम पर मुनाफा कोई और ही ले उड़ रहा है? कड़वा सच यह है कि बिचौलियों का 'सिस्टम' फल-फूल रहा है. मंडी में कौड़ियों के भाव बिकता पसीना, और मॉल में प्रीमियम दाम पर कटती जेब यही आज की कड़वी हकीकत है.

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नीतिगत विरोधाभास का इससे बड़ा उदाहरण क्या होगा कि जब किसान के गेहूं की कीमतें बढ़ती हैं, तो सरकार 'स्टॉक लिमिट' और 'एक्सपोर्ट बैन' जैसे हथियारों से बाजार को बांध देती है, लेकिन जब वही गेहूं MSP के नीचे गिर रहा है, तो सिस्टम मौन हो गया है. 'महंगाई कंट्रोल' करने के नाम पर किसान के हक पर डाका डाला जा रहा है, मगर सवाल यह है कि क्या सरकार उन बड़ी आटा कंपनियों पर भी कोई 'प्राइस कैप' लगाएगी, जिनकी पैकेट बंद थैलियां आज भी प्रीमियम दामों पर बिक रही हैं? क्यों 'सस्ती रोटी' का सारा बोझ सिर्फ किसान के कंधों पर लाद दिया गया है? जबकि बिचौलिए और कॉर्पोरेट्स इस तंत्र में पूरी तरह सुरक्षित और मुनाफे में हैं. यह कैसी व्यवस्था है जहां किसान को उसकी लागत न मिले और उपभोक्ता को कभी राहत न मिले?

ये आंकड़े साफ कह रहे हैं कि एक तरफ किसान को उसकी मेहनत का वाजिब हक नहीं मिल रहा, तो दूसरी तरफ 'सस्ती रोटी' का इंतजार कर रहा आम आदमी आज भी वही पुराने ऊंचे दाम चुका रहा है.  उधर, बाजार के 'नियामक' और सरकारी ठेकेदार चादर तानकर सो रहे हैं, मानो इस खुली लूट से उनका कोई सरोकार ही न हो. सवाल यह है कि क्या उपभोक्ता मामले मंत्रालय के प्राइस मॉनिटरिंग डिवीजन की निगरानी सिर्फ आंकड़े जुटाने तक सीमित है या फिर वह बेलगाम कीमतों पर नकेल भी कसेगा?

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