दिखाई बेशक न दे, पर शामिल जरूर होता है,
खुदकुशी करने वाले का कातिल जरूर होता है...
सुसाइड की खबरों के साथ सोशल मीडिया पर अक्सर ये कड़वी लाइनें मैंने पढ़ी हैं. इससे गुरेज भी नहीं कि ये बात सच के करीब हैं. लेकिन सवाल ये है कि हर बार वो 'कातिल' तभी खोजा जाता है जब शक के घेरे में कोई पति या पत्नी, ससुराल या कोई रोमांटिक पार्टनर हो. ट्विशा के मामले में भी सोशल मीडिया अपनी हड़बड़ी वाली आदत से मजबूर दिख रहा है. यहां रील्स-पोस्ट, ट्वीट करने वाले शक की सुईयां छोड़कर 'जज का हथौड़ा' उठा चुके हैं. उन्हें फटाफट फैसला जो देना है.
हां, माना कि होता है कातिल हर खुदकुशी के पीछे... जैसे कोटा में जान देने वाले बच्चों के पीछे उनका ' प्रेशर'. जैसे सूखा पड़ने के बाद किसान के सुसाइड के पीछे 'कर्ज'... ऐसी तमाम नजीरें रही हैं जहां इन्सान नहीं तलाशे गए. अब ये मत कहिएगा कि ये स्त्री विरोधी बात है, फिर कि मैजिस्ट्रेट का हथौड़ा हाथ में लिए सोशल मीडिया के इस कबीलाई इंसाफ के खिलाफ बोल दिया. मैंने तो बस उस 'अदृश्य कातिल' की बात कीी जिसकी पहचान हमारे सामाजिक और मनोवैज्ञानिक चश्मे से हमेशा ओझल रह जाती है.
इस केस की परतों को खोलें तो एक तरफ ट्विशा के मायके वालों के गंभीर आरोप और दर्दनाक बयान हैं, तो दूसरी तरफ उनकी सास (जो खुद एक रिटायर्ड जज हैं) के उतने ही तीखे दावे हैं. वो जिस तरह मौत के बाद भी बहुत सामान्य ढंग से भी बहू की आलोचना कर रही हैं, उनके चेहरे पर कोई अफसोस नहीं दिख रहा. उनके व्यवहार से साफ है कि वो बहू को दिल से बहुत पसंद नहीं करती रही होंगी. वरना अक्सर मौत के बाद करीबी सिर्फ तारीफ करते हैं, पूजा न करने या पौधों को पानी न देने जैसी बातें उनके लिए गौण हो जाती हैं.
फिर भी ये कहना होगा कि लोगों ने बात की तह तक जाए बगैर मायके के बयान को ही परम सत्य मान लिया. ऐसा होना स्वाभाविक भी है, क्योंकि किसी भी हादसे में विक्टिम (पीड़ित) के साथ खड़े होना हमारी बुनियादी, इंसानी और मनोवैज्ञानिक सोच का हिस्सा है. पर इस डिजिटल दौर की जल्दबाजी में टूटते हुए आधुनिक परिवारों की उस कड़वी और पेचीदा हकीकत को समझने की कोशिश ही नहीं करते, जो हेडलाइंस से कहीं ज्यादा गहरी होती है.
अब ट्विशा के ही प्रोफाइल को देखिए. वह कोई कमजोर या दबी-कुचली लड़की नहीं थीं. वो एक पढ़ी-लिखी एमबीए ग्रेजुएट, मॉडल, पूर्व मिस पुणे और तेलुगु फिल्म'मुग्गुरु मोनागाल्लू' में अभिनय कर चुकीं एक मजबूत पहचान वाली शख्सियत थीं. एक बेहद खुले, आधुनिक और स्वच्छंद विचारों वाली लड़की ने डेटिंग ऐप के जरिए अपनी पसंद के लड़के (समर्थ) से शादी की. लेकिन शादी के कुछ ही वक्त बाद दोनों को एक मनोचिकित्सक के पास जाना पड़ता है, जहां से उन्हें कपल काउंसलिंग की सलाह मिलती है.
अगर इस पूरी कहानी को बिना किसी पूर्वाग्रह के, बेहद आसान और तार्किक तरीके से समझें तो यह जाहिर हो जाता है कि ट्विशा मेंटल हेल्थ इश्यू से जूझ तो रही ही थीं. उनके डॉक्टर का बयान भी मीडिया में आ चुका है. ऐसे में अगर सास के बयान को सच मानें तो क्या वो सच में ड्रग्स की लत या साइकोसिस जैसी स्थिति से जूझ रही थीं. अगर ऐसा है तो इन समस्याओं से पीड़ित इंसान को संदेह होना, गुस्सा-चिड़चिड़ाहट से लेकर सुसाइड के ख्याल आना जैसे लक्षण होते हैं. अब जांच की दिशा से ही इसकी पुष्टि होगी.
लेकिन 'महिला अधिकारों' की बात करने वाले कुछ लोग एक बुजुर्ग सास को महिला मानने से ही इनकार कर रहे हैं, जो इस केस के दूसरे पाले में खड़ी है. सवाल यह है कि क्या 'महिला' होने का अधिकार सिर्फ नवविवाहिताओं के पास सुरक्षित है? क्या एक बुजुर्ग मां, जो खुद कानून की रक्षक रही हो, सिर्फ इसलिए मुजरिम मान ली जाएगी क्योंकि सोशल मीडिया की रील्स में बैकग्राउंड म्यूजिक थोड़ा भावुक और एकतरफा बज रहा है? या उनके बयानों में ट्विशा के प्रति हमदर्दी की कमी दिख रही है.
इसके पीछे का अगर मनोविज्ञान समझें तो ट्विशा अगर खराब मेंटल हेल्थ से जूझ रही थी तो सास का ये रवैया काफी सामान्य सा लगेगा. आज जब पूरी दुनिया के मेडिकल साइंस और साइकियाट्री के सामने सबसे बड़ी चुनौती ये है कि मेंटल हेल्थ के मामलों में मरीज से ज्यादा उसके 'केयर-गिवर' की परीक्षा होती है. कोई व्यक्ति अवसाद (डिप्रेशन) से लड़ रहा हो या किसी गंभीर एडिक्शन (नशे की लत) से,या किसी अन्य पर्सनैलिटी डिसऑर्डर से. उसके आसपास के लोगों और केयर-गिवर में उनके प्रति सहानुभूति की भावना बहुत कम होती जाती है. खासकर जब ये रिश्ते ससुराल के हों तो हालात और भी टफ हो जाते हैं.
वहीं मानसिक रूप से अस्वस्थ व्यक्ति सहानुभूति और सहयोग न मिलने से और अकेले पड़ जाते हैं. उनकी डिसीजन मेकिंग क्षमता इतनी प्रभावित हो जाती है कि वह सामान्य से सामान्य पारिवारिक कॉन्फ्लिक्ट को भी संभाल नहीं पाता.
देखिए, भारतीय परिवारों की सबसे बड़ी विडंबना यहीं से शुरू होती है. हमारे यहां 'शादी' जैसी संस्था में आज भी स्त्रियों से एक अवास्तविक और अलग ही स्तर के 'परफेक्शन' की उम्मीद की जाती है. हमें सिखाया ही नहीं गया कि किसी मेंटल हेल्थ पेशेंट से डील कैसे करना है. नतीजतन, हमारे समाज में ऐसे मरीजों की पहचान ढोंगी के तौर पर होती है या फिर उन्हें 'मेंटल', 'पागल' या 'साइको' जैसे कड़े शब्दों के खांचे में ढाल दिया जाता है.
सोचिए, मानसिक रोगों से जूझ रही बहू, एडिक्शन की समस्या से लड़ रही बहू या मानसिक संतुलन को बनाए रखने के लिए भारी दवाइयां खाने वाली बहू के साथ कोप-अप करना किसी भी आम परिवार के लिए कितना मुश्किल और थका देने वाला काम होगा. और मुश्किल तब दोगुनी हो जाती है, जब वह बहू बेहद पढ़ी-लिखी, करियर-ओरिएंटेड, अपनी एक मजबूत पहचान और बेबाक आवाज रखने वाली आधुनिक लड़की हो. ऐसे में उसकी मानसिक अस्थिरता को अक्सर उसका 'अहंकार' या गलत स्वभाव का हिस्सा समझ लिया जाता है. यहीं से रिश्तों की कड़वाहट उस स्तर पर पहुंच जाती है जहां से वापसी का कोई रास्ता नहीं बचता.
तय मानिए, खुदकुशी करने वाले का एक कातिल जरूर होता है. लेकिन हर बार वो कातिल कोई हाड़-मांस का इंसान या ससुराल वाला ही हो, यह जरूरी नहीं. कभी-कभी वो 'कातिल' आसपास घूरती कातर आखें, कमियां गिनाते लोग, ताने, अकेलापन और पूरा का पूरा खोखला सिस्टम होता है. ये सिस्टम किसी को शारीरिक रूप से बीमार तो मान सकता है, लेकिन मानसिक रूप से बीमार स्वीकार करने की हिम्मत नहीं जुटा पाता.
इस पूरे चक्रव्यूह का अंतिम और स्थायी हल किसी अदालती फैसले या सामाजिक एकतरफा न्याय में नहीं, बल्कि हमारे समाज और सोच की री-इंजीनियरिंग में छिपा है. हमें मानसिक स्वास्थ्य को 'कमजोरी' या 'पागलपन' के चश्मे से देखना बंद करके उसे एक सामान्य शारीरिक बीमारी की तरह स्वीकार करना होगा. हालांकि ये बहुत कठिन है लेकिन अगर जागरूकता हो तो ऐसा संभव है. लड़कियों के मामलों में अक्सर उनका स्त्रीत्व भी उनका दुश्मन बन जाता है. ऐसे में दोनों ही तरफ के परिवारों यानी ससुराल और मायके को भी ये समझना होगा कि जब कोई बहू या बेटी मानसिक रूप से अस्वस्थ है, तो उसे 'परफेक्ट' का टैग नहीं एक सेंसेटिव'सपोर्ट सिस्टम' और सही मेडिकल केयर चाहिए. शादियों को सिर्फ दो परिवारों का मेल नहीं, बल्कि दो इंसानों की मेंटल और इमोशनल कम्पैटिबिलिटी का मंच बनना होगा.
हमारे एजुकेशन और सोशल सिस्टम में 'मेंटल हेल्थ फर्स्ट एड' और केयर-गिवर सपोर्ट ग्रुप्स को इंस्टीट्यूशनलाइज्ड करना होगा, ताकि मरीजों की देखरेख करने वाले परिवार भी इस मानसिक तनाव के बोझ तले न दबे. हम 'लोग क्या कहेंगे' के डर को दरकिनार कर घर में मानसिक स्वास्थ्य पर खुलकर बात करें. एक ऐसा सेफ स्पेस बनाएं जहां इंसानी जिंदगियों को किसी 'अदृश्य कातिल' का शिकार न होना पड़े.
मानसी मिश्रा