हॉस्टल में हुई एक मौत, दस साल बाद ‘UGC नियम 2026‘ के रूप में पुनर्जन्म

हैदराबाद युनिवर्सिटी के छात्र रोहित वेमुला की आत्महत्या से शुरू हुआ मंथन अब जाकर नतीजे पर पहुंचा है. कॉलेज कैंपसों में जातिगत भेदभाव मिटाने के लिए UGC नियम 2026 जारी हो गए हैं. और इसके साथ इन पर व्यापक बहस और बवाल भी. राजनीतिक अखाड़े में मोदी सरकार को घेरा जा रहा है कि वह ऐसे दोधारी नियम कैसे बना सकती है. ऐसे में जरूरी हो जाता है इन नियमों के मूर्त रूप लेने की यात्रा पर एक नजर डालना.

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2016 हैदराबाद यूनिवर्सिटी के छात्र रोहित वेमुला की आत्महत्या के बाद अदालतों और कैंपस के नियमाकों के बीच चले लंबे मंथन का नतीजा है यूजीसी रेगुलेशन 2026. (फोटो- ITG) 2016 हैदराबाद यूनिवर्सिटी के छात्र रोहित वेमुला की आत्महत्या के बाद अदालतों और कैंपस के नियमाकों के बीच चले लंबे मंथन का नतीजा है यूजीसी रेगुलेशन 2026. (फोटो- ITG)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 27 जनवरी 2026,
  • अपडेटेड 12:29 PM IST

UGC रेगुलेशंस 2026 के नए नियम सार्वजनिक होने से बवाल मच गया है. कैंपस में जातिगत भेदभाव को मिटाने के लिए 2012 के नियमों को अपडेट किया गया है. और कुछ नए नियम जोड़े भी गए हैं. मोटा बदलाव यह है कि अब अनुसूचित जाति-जनजाति ही नहीं, पिछड़ा वर्ग के छात्र भी जातिगत भेदभाव की शिकायत कर पाएंगे. UGC के नए नियमों का तगड़ा विरोध हो रहा है, यह कहकर कि इससे अगड़ी जाति के छात्रों को आसानी से झूठे मामलों में फंसाया जा सकेगा. मोदी सरकार का विरोध हो रहा है कि आखिर उसने ऐसे नियम बिना किसी जांच परख के कैसे जारी होने दिए. लेकिन, इन नियमों के पीछे एक बड़े मंथन की कहानी है. जिसमें कुछ छात्रों की दुर्भाग्यपूर्ण मौत शामिल है. उनके परिजनों की चीत्कार शामिल है. अदालतों का आदेश शामिल है. यूजीसी का समस्या का गंभीर मूल्यांकन शामिल है. और अंत में शामिल तो सरकार की बिना भेदभाव वाली बराबरी की नई शिक्षा नीति भी है. आइये, सिलसिलेवार समझते हैं इस पूरे घटनाक्रम का, जिसने UGC रेगुलेशंस 2026 को जन्म दिया...

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साल 2016 था. हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी हॉस्टल का एक कमरा अचानक देश की अंतरात्मा पर बोझ बन गया. रोहित वेमुला की मौत सिर्फ एक छात्र की आत्महत्या नहीं थी, वह एक सवाल थी- क्या भारत के विश्वविद्यालय, संविधान के वादे के मुताबिक बराबरी की जगह हैं? उस सवाल का जवाब न सरकार के पास था, न विश्वविद्यालयों के पास. लेकिन वह सवाल सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा.

अगले कुछ वर्षों में देश ने देखा कि कैसे एक-एक करके विश्वविद्यालय परिसरों से ऐसी ही खबरें आती रहीं. 2019 में मुंबई के एक मेडिकल कॉलेज में पायल तड़वी की मौत ने यह साफ कर दिया कि समस्या सिर्फ एक कैंपस या एक कोर्स तक सीमित नहीं है. जाति, संस्थागत उपेक्षा और मानसिक दबाव-सब एक साथ काम कर रहे थे. इसी दौर में रोहित वेमुला और पायल तड़वी की माताओं की याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट पहुंचीं. अदालत ने पूछा- UGC के 2012 के एंटी-डिस्क्रिमिनेशन नियम आखिर कागज से बाहर क्यों नहीं आ पा रहे?

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सुनवाई के दौरान अदालत ने एक कड़वी सच्चाई दर्ज की- देश के ज़्यादातर विश्वविद्यालयों में Equal Opportunity Cells या तो निष्क्रिय हैं या नाममात्र के लिए मौजूद हैं. शिकायतें दर्ज नहीं होतीं, होती हैं तो दबा दी जाती हैं. सुप्रीम कोर्ट ने कानून नहीं लिखा, लेकिन उसने दिशा तय कर दी. UGC से कहा गया कि पुराने नियम काफी नहीं हैं, नए, सख़्त और लागू होने वाले नियम बनाइए. और इस बार सिर्फ सलाह नहीं, समय-सीमा भी तय हुई.

लगातार सामने आती घटनाओं के बाद राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग और शिक्षा मंत्रालय को हस्तक्षेप करना पड़ा. IIT दिल्ली में मानसिक स्वास्थ्य, संस्थागत दबाव और छात्र-कल्याण पर स्टडी के लिए समितियां बनीं. यह मान लिया गया कि सिर्फ ‘मेरिट' बात काफी नहीं है. माहौल भी जिम्मेदार होता है. स्टडी  में पाया गया कि पिछड़ी जातियों के 75 फीसदी छात्र कैंपस में जातिगत भेदभाव सहते हैं. यही वह पाइंट था, जहां अदालत की चेतावनी, सरकार की नीति और जमीनी सच्चाई एक-दूसरे से टकराईं. सामाजिक न्याय की खातिर अनुसूचित जाति-जनजाति की तरह पिछड़ा वर्ग के छात्रों को भी पीड़ित पक्ष माना गया.

उधर, 2020 में केंद्र की मोदी सरकार ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP 2020) लागू की. यह नीति विश्वविद्यालयों को ज्यादा स्वायत्त बनाती थी, लेकिन साथ ही यह भी कहती थी कि equity और inclusion शिक्षा की बुनियाद होंगे. यानी आजादी के साथ जवाबदेही.

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यहीं से दो धाराएं एक-दूसरे के समानांतर चलने लगीं- एक तरफ सुप्रीम कोर्ट का दबाव, दूसरी तरफ सरकार की नई शिक्षा दृष्टि. कोविड के बाद के वर्षों में यह तनाव और साफ दिखा. देश के सबसे प्रतिष्ठित संस्थानों IITs से भी छात्र आत्महत्याओं की खबरें आने लगीं. IIT कानपुर इस बहस का एक अहम पड़ाव बन गया.

2025 आते-आते सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा- अब ड्राफ्ट नहीं, अब नोटिफिकेशन चाहिए. और 2026 की शुरुआत में UGC ने ‘Promotion of Equity in Higher Education Institutions Regulations, 2026’ जारी किए.

इन नियमों ने पहली बार यह तय किया कि हर विश्वविद्यालय में शिकायत निवारण सिर्फ औपचारिक नहीं होगा, हर संस्थान जवाबदेह होगा, और भेदभाव को ‘अनदेखा' करना भी एक अपराध माना जाएगा. यह नियम संसद में पारित कानून नहीं थे, लेकिन यह भी सच था कि UGC शिक्षा मंत्रालय के अधीन काम करता है, और NEP 2020 की छाया इन नियमों पर साफ दिखती है.

जब इन नियमों पर विवाद हुआ, तो सफाई सरकार ने दी, आलोचना भी सरकार पर ही आई. यानी 2016 में जो सवाल एक छात्र के कमरे से उठा था, वह 2026 में एक देशव्यापी रेगुलेटरी ढांचे में बदल चुका था. फिर भी कहानी यहीं खत्म नहीं होती है. अब परीक्षा यह है- क्या ये नियम भी 2012 की तरह फाइलों में सो जाएंग,या IIT कानपुर जैसे मामलों ने देश को यह समझा दिया है कि कैंपस की चुप्पी भी कभी-कभी जान ले लेती है?

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2016 से 2026 तक की यह यात्रा बताती है- UGC Regulations सिर्फ नियम नहीं हैं, वे अदालत की चेतावनी, सरकार की नीति और छात्रों की अनसुनी चीखों का साझा दस्तावेज हैं.

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