बसंत की आमद हो चुकी है लेकिन शरद जाने का नाम नहीं ले रही. स्थिति असमंजस की है कि सुभद्रा कुमारी चौहान की कविता पढ़ें या प्रेमचंद का गद्य. नाभियों में इकट्ठा नीली रुई से अब एक गद्दा भरा जा सकता है. गुड़, मूंगफली और तिल हैं मुख्य आहार. धूप को है तपिश का इंतजार और मुझे पानी के गर्म होने का. सूखती त्वचा पर नाखूनों से लिखता हूं पूर्व प्रेमिका के नाम का पहला अक्षर और बेमौसम बरसात के पूर्वानुमान से ही दुबक जाता हूं रजाई में.
सोचता हूं, अंतरिक्ष में लोग बिना पानी के कैसे रहते होंगे. उन्हें उड़ती बूंदों को चबाकर पीते देखा है मैंने. काश इन दो महीनों के लिए पृथ्वी का सारा गुरुत्वाकर्षण भी सूख जाता. मैंने लोगों से वो किस्से सुने हैं जिनमें बचपन में मेरे कोहरे और पाले में खेलने के तमाम जिक्र हैं. मैं वो नहीं हूं. वो कोई और था. एलोवेरा के भीतर जम गया है जेल, गन्नों में रस और फूलों में खुशबू. शिराओं में दौड़ता खून, आंखों से बहते आसूं और सोते हुए मुंह से टपकती लार भी अब जमने को है. ऐसे ठंडे माहौल में देश में नहाने पर विवाद हो गया है.
मान्यता है कि आत्मशुद्धि के लिए मौनी अमावस्या पर ब्रह्म मुहूर्त में मौन रहकर स्नान करना चाहिए. यह एक तप के समान है. किसी भी संभावित पुण्य की प्राप्ति के लिए नहाने की प्राथमिक शर्त कम से कम इस बात का सबूत तो है कि नहाना कोई सरल प्रक्रिया नहीं है. हालांकि विज्ञान इसे कतई आवश्यक नहीं मानता. विज्ञान और आस्था का टकराव कोई नई बात नहीं है.
मैं सोच और व्यवहार से वैज्ञानिक रहना चाहता हूं. लेकिन ये बात घर के बड़े बुजुर्ग नहीं समझते. काकी, दादी, ताया या इन सब लोगों के पूज्य ऐसे तमाम संत महात्मा, जो हरिद्वार, गढ़ गंगा या प्रयाग काशी में डेरा डालकर नहाए जा रहे हैं. सोचिए, भला नहाने की ऐसी क्या ज़िद है कि बर्फीली रेत में तंबू झोपड़ी गाड़ के लोग नहाने के लिए पहुंचे हुए हैं. नहाने की ज़िद में कोई सामान खो दे रहे हैं, कोई परिजनों को खो दे रहे हैं. कोई चप्पल, बैग, मोबाइल खो दे रहे हैं. कुछ तो आपा खो दे रहे हैं. प्रशासन से भिड़ जा रहे हैं.
इधर बसंत पंचमी आकर चली गई लेकिन बेमौसम बारिश ने ठंड बढ़ा दी है. मुसीबत लेकर आया पश्चिमी विक्षोभ. पश्चिम ने कभी भारत को राहत वैसे भी नहीं पहुंचाई. इन दिनों ये तनाव और भी ज्यादा है. अखबारों में छपी तस्वीरें कैसी मुर्दे जैसी सफेद नज़र आ रही हैं. बर्फ देखकर ही झुरझुरी हो रही है. इस सब के बीच नहाना पहली बार बंजी जंपिंग से भी बुरा नहीं है तो क्या है.
दरअसल, स्नान को टालना मुझे राहत देता है. पूस में नहाने के लिए मुझे जेठ को याद करना पड़ता है. याद करना पड़ता है पीठ की घमोरियों को, बारिश के बाद की उमस को, पिघलते तारकोल को, ग्लूकोज का विज्ञापन, अखबार में छपी दुपट्टे से चेहरा ढकी लड़की की तस्वीर, गेहूं के खेत, सहारा की रेत और सूर्य के प्रकाश की 8 मिनट 20 सेकेंड की उस लंबी यात्रा को. नहाते हुए मैं पृथ्वी से बुध हो जाना चाहता हूं.
शोध बताते हैं कि रोज नहाना त्वचा से नैचुरल ऑयल को खत्म कर देता है. नहाने का अविष्कार इंसान ने किया. यह एक विशुद्ध कृत्रिम क्रिया है. कपट है. झूठ है. छल है. धोखा है. हमारा जन्म नहाने के लिए नहीं हुआ. महाकुंभ में कई हठ योगियों को हमने देखा जिन्होंने कई वर्षों से स्नान नहीं किया. कई जनजातियां कभी नहीं नहातीं. जिन्हें नहीं पता नहाना क्या होता है. नहाना सभ्यता का प्रतीक कैसे हो सकता है. नहाने के बाद भी लोग गला दाबने और आत्महत्या करने का मन रखते हैं.
न नहाना पानी को बचाना है. पानी को बचाना या गंदा न करना धरती की पूजा है. गंगा में न नहाना गंगा को शुद्ध रखने के यज्ञ से कम है क्या. न नहाना साबुन और शैम्पू मिले पानी को नदियों और भूगर्भ में भरे पानी को प्रदूषित नहीं करने का संकल्प है. न नहाना उन तौलियों पर रहम है जो सूखने के लिए चार-चार दिन तक मुंह लटकाए रहती हैं और ठंडी पड़ती जाती हैं. न नहाना चिपचिपाहट और गीलेपन का इलाज है जिससे फंगस पैदा होने का खतरा रहता है. न नहाना मनुष्य के ज़िम्मेदार और वैज्ञानिक होने का प्रमाण है. जो गंगा नहाने के लिए जुटे और रूठे हैं, वो अपने विचारों पर पुनर्विचार करें. तब तक मैं चाय चढ़ाता हूं. थोड़ी सी ताजी भुनी मूंगफली और मिल जाती तो…
योगेश मिश्रा