प्रयागराज का माघ मेला मेरे लिए नया अनुभव नहीं है. पत्रकार के तौर पर मैं कई अर्द्धकुंभ, माघ मेले और पिछले वर्ष हुए कुंभ की भी कवरेज कर चुकी हूं. हर बार संगम की वही रेती, वही आस्था- लेकिन हर आयोजन अपने साथ अलग संदर्भ, अलग चुनौतियां और अलग सवाल लेकर आता है. इस बार माघ मेले में पहुंची, तो पृष्ठभूमि में संतों से जुड़े विवाद भी थे और प्रशासन के सामने बीते अनुभवों से मिली बड़ी सीख भी.
बसंत पंचमी का दिन था. संगम तट पर श्रद्धालुओं की भारी भीड़ थी, लेकिन एक बात साफ दिख रही थी- व्यवस्था. पिछले महाकुंभ में मौनी अमावस्या के दिन हुई भगदड़ की घटना अब भी स्मृतियों में ताजा है. उस हादसे से सबक लेते हुए इस बार माघ मेले में प्रशासन ने सुरक्षा और भीड़ प्रबंधन के विशेष इंतजाम किए थे. घाटों पर अतिरिक्त बैरिकेडिंग, स्पष्ट मूवमेंट प्लान, निगरानी ड्रोन, कंट्रोल रूम और लगातार अनाउंसमेंट- एक अनुभवी आंख को यह फर्क साफ दिखाई देता है.
कई कुंभ और माघ मेले कवर करने के अनुभव से मैं कह सकती हूं कि इस बार प्रशासन ज्यादा सतर्क और ज्यादा संवेदनशील दिखा. श्रद्धालुओं को रोका नहीं जा रहा था, बल्कि धीरे-धीरे आगे बढ़ाया जा रहा था. सुरक्षा व्यवस्था का उद्देश्य नियंत्रण नहीं, संरक्षण लग रहा था.
इसी व्यवस्थित भीड़ के बीच, संगम घाट पर खड़े-खड़े मेरी नजर एक छोटे से समूह पर पड़ी. न कोई शोर, न कोई विशेष सुरक्षा घेरा, न कोई घोषणा. कुछ शिष्य, साधारण वस्त्र और शांत चाल. पहले तो लगा कि कोई सामान्य संत होंगे, लेकिन थोड़ी ही देर में पता चला- ये पुरी के शंकराचार्य हैं.
मैंने उन्हें ध्यान से देखा. वे उसी कतार में थे, जहां आम श्रद्धालु खड़े थे. न किसी को हटाया गया, न मार्ग खाली कराया गया. संगम में उन्होंने शांति से स्नान किया- बिना किसी आडंबर के, बिना किसी प्रदर्शन के. स्नान के बाद भी वे उतनी ही सहजता से लौट गए, जितनी सहजता से आए थे.
एक पत्रकार के रूप में यह दृश्य मेरे लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण था क्योंकि उसी समय शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद से जुड़ा विवाद माघ मेले में चर्चा का विषय बना हुआ था. संगम की पवित्र रेती पर टकराव, नाराजगी और बयानबाजी की खबरें श्रद्धालुओं के बीच बेचैनी पैदा कर रही थीं. ऐसे में दो अलग-अलग आचरण एक ही परंपरा के प्रतिनिधियों द्वारा देखना- मेरे लिए एक गहरा प्रश्न बन गया.
कुछ ही देर में मेला प्रशासन के एक वरिष्ठ अधिकारी स्वयं मेरे पास आए. उन्होंने कहा- 'आप खुद देखिए, ये भी शंकराचार्य हैं. लेकिन इन्होंने न किसी को परेशान किया, न व्यवस्था पर दबाव डाला. आम लोगों की तरह आए, स्नान किया और चले गए.'
उनकी बात मेरे अपने अनुभव से मेल खा रही थी.
कई कुंभ और माघ मेले देखने के बाद मैंने यह महसूस किया है कि श्रद्धालु संतों से उपदेश से पहले आचरण की उम्मीद करता है. सनातन परंपरा में शंकराचार्य की पदवी ज्ञान, संयम और त्याग का प्रतीक मानी जाती है. संत की सबसे बड़ी पहचान उसका मौन और उसका व्यवहार होता है.
माघ मेला कोई साधारण आयोजन नहीं. यह वह भूमि है जहां आदि शंकराचार्य से लेकर अनगिनत संतों ने बिना किसी विशेषाधिकार के साधना की है. संगम की रेती ने हमेशा विनय को स्वीकार किया है. वहां पद नहीं, भाव चलता है.
घाट पर खड़े कई श्रद्धालुओं से मैंने बातचीत की. कोई खुलकर विवाद पर टिप्पणी नहीं कर रहा था, लेकिन सब यही चाहते थे कि आस्था के इस पर्व में शांति बनी रहे. क्योंकि जब संत स्वयं विवाद का कारण बन जाएं, तो आस्था के मन में सवाल उठना स्वाभाविक है.
संगम सबको समान रूप से स्वीकार करता है- संत को भी, सामान्य श्रद्धालु को भी. फर्क केवल आचरण का होता है. उस दिन संगम की रेती पर खड़े होकर, अपने वर्षों के कवरेज अनुभव के साथ, मैंने यही महसूस किया कि सनातन की असली शक्ति शोर में नहीं, शांति में है. अधिकार में नहीं, अनुशासन में है.
शायद यही समय है आत्ममंथन का- संत समाज के लिए भी और हमारे समाज के लिए भी. क्योंकि संगम की रेती सब देखती है. और इतिहास उन्हीं को याद रखता है, जो वहां अपने पद नहीं, अपना संयम छोड़ जाते हैं.
श्वेता झा