NEET का पेपर लीक हो गया है. दोबारा. आप हैरान होंगे, शायद. एक पल रुकिए. जरा अपनी हैरानी से बाहर निकलें और जानें कि हमारे देश ने 'लीक' करने की कला में महारत हासिल कर ली है. चाहे वो सरकारी खजाना हो, स्टेट सीक्रेट हों, या फिर बारिश में हर दूसरी इमारत की छत. उसने एक परीक्षा का पेपर भी लीक कर दिया.
ये असाधारण है. वाकई बहुत-बहुत चौंकाने वाला. है ना?
अंजान लोगों के लिए बता दें, NEET का मतलब है 'नेशनल एलिजिबिलिटी कम एंट्रेंस टेस्ट'. लेकिन हकीकत में यह टेस्ट है आपके धैर्य का, आपके परिवार की माली हालत का, और अब तो यह इस बात का भी टेस्ट है कि आपके पिता कितनी जल्दी वह व्हाट्सएप ग्रुप ढूंढ लेते हैं जहां PDF बिक रही होती है.
यह परीक्षा तय करती है कि भारत में डॉक्टर कौन बनेगा. जिसका मतलब है कि यह तय करती है कि कौन 'बाहर' आएगा. सिर्फ गरीबी से नहीं. बल्कि विरासत में मिले उस पिछड़ेपन के ढांचे से, जिसे इस देश ने दशकों तक प्रशासनिक और सामाजिक समर्पण से बनाया है.
यही असल त्रासदी है, जो कॉमिक कॉस्ट्यूम पहने हुए है. परीक्षा का उददेश्य है 'मेरिट' आधारित सिस्टम तैयार करने के लिए. जहां सभी प्रतिस्पर्धियों के लिए समान चैलेंज हो. जो चुनौती बिहार के गांव से आने वाले लड़के के लिए हो, वही साउथ दिल्ली के बंगले वाली लड़की के लिए. इसे पास कर लो, तो आप 'कुछ' हो. यदि फेल हो जाओ, तो आप सिर्फ एक आंकड़ा हो.
परीक्षा में कामयाबी का दरवाजा बहुत संकरा है. जिसमें से गरीब छात्र चाहता है कि एक बार में निकल जाऊं. क्योंकि इसकी एक कीमत है. कोटा में कोचिंग के लिए लाखों लगते हैं. टेस्ट सीरीज के पैसे लगते हैं. पुराने साल के पेपर्स, जिन्हें कायदे से संवारा गया, ये सब अपने आप में एक कुटीर उद्योग हैं. और इस शानदार मार्केट इकोसिस्टम को अब पूरा करते हुए, लीक हुआ पेपर खुद एक फीस पर उपलब्ध है.
अगर आप अमीर नहीं हैं, तो वाकई यह एक बड़ी रकम है. एक गरीब छात्र जो उस कोचिंग का खर्च नहीं उठा सकता, जहां सिलेबस से पढ़ाई होती है. वह उस शॉर्टकट का खर्च कैसे उठाएगा जो सिलेबस को ही बायपास कर देता है. पता चला है कि गरीबी केवल एक स्थिति नहीं है. यह एक 'कॉलर ट्यून सब्सक्रिप्शन' सर्विस की तरह है. यह खुद को ऑटोमैटिक रिन्यू करती रहती है. आप बहुत मालदार हुए बिना इससे बाहर नहीं निकल सकते.
मिडिल क्लास माता-पिता अपनी लिमिट को आगे बढ़ाते हैं. वे गिरवी रख देते हैं अपनी इज्जत, बचत या पैतृक गांव का एक छोटा सा प्लॉट. ताकि वह लीक हुआ PDF खरीद सकें. दुनियादारी के हिसाब से देखें तो वे अपराधी नहीं हैं. हमारे तर्कहीन सिस्टम में वे बस एक तर्कसंगत किरदार हैं. उन्होंने सही पहचान लिया है कि परीक्षाएं ज्ञान का परीक्षण नहीं कर रही हैं. यह इस बात को परख रही हैं कि किसकी कितनी 'पहुंच' है. और भारत में ‘पहुंच’ हमेशा से लेन-देन पर आधारित रहा है. माता-पिता बस उस भविष्य के लिए वर्तमान मार्केट रेट चुका रहे हैं, उनका बच्चा जिसका हकदार है, लेकिन सिस्टम जिसकी गारंटी देने से इनकार करता है. हमने 'जुगाड़' पर पूरी एक सभ्यता खड़ी कर ली है. तो परीक्षा की कामयाबी इससे अलग क्यों हो?
सफारी सूट पहने असली अपराधी उन दफ्तरों में बैठे हैं जहां से 'गेंदा' ब्रांड के फिनाइल और बेखौफ होने की बू आती है. वे पेपर सेट करने वाले जिन्होंने इसे बेचा. वे बिचौलिए जिन्होंने दलाली की. वे अधिकारी जिन्होंने ठीक उसी समय दूसरी तरफ देखा जो उनके लिए सबसे फायदे वाला समय था. ये कोई अपवाद नहीं हैं. ये सिस्टम ही हैं, जो सिस्टम के कपड़े पहने हुए, सिस्टम का ही काम कर रहे हैं.
हर लीक हुआ पेपर परीक्षा तंत्र की विफलता नहीं है. यह तो वही परीक्षा तंत्र है, जो ठीक उसी तरह काम कर रहा है जैसा कि इसे उन लोगों द्वारा डिजाइन किया गया है, जो इसकी गड़बड़ियों से लाभ उठाते हैं.
और फिर, मई में एक गुरुवार की दोपहर केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस करते हैं. कहते हैं कि पेपर कथित रूप से ‘गेस पेपर्स’ की आड़ में लीक हुआ था. उन्होंने कहा कि ’चेन ऑफ कमांड’ में सेंध लगी थी. सरकार इसे स्वीकार करती है और जिम्मेदारी लेती है. उन्होंने 21 जून को दोबारा परीक्षा कराने की घोषणा की.
अब इसे धीरे से पढ़िए. स्वाद लेकर.
एक कमेटी थी. जो 2024 की लीक के बाद बनाई गई थी. जिसका नेतृत्व इसरो (ISRO) के एक पूर्व अध्यक्ष कर रहे थे. एक ऐसा व्यक्ति जिसने रॉकेट साइंस को संभाला, जो कि एक एग्जाम पेपर जुगाड़ने से कहीं ज्यादा कठिन काम है. इस कमेटी ने 102 व्यापक सिफारिशें दीं. सरकार ने कई को लागू भी किया. और फिर भी पेपर लीक हो गया. वो भी गेस पेपर्स के वेश में. जो या तो अपराधी की क्रिएटिविटी का एक मास्टरस्ट्रोक है या फिर इस पूरे सुधार अभ्यास पर एक विनाशकारी फैसला. इससे लगता है कि माफिया, कमेटी की रिपोर्ट पढ़ता है और उसके अनुसार खुद को ढाल भी लेता है.
मंत्री ने धैर्य और आत्मविश्वास के साथ कहा- ‘हम जिम्मेदारी लेते हैं’. आम आदमी जानता है कि भारतीय सार्वजनिक जीवन में जिम्मेदारी लेने का वास्तव में क्या मतलब होता है. इसका मतलब है एक प्रेस रिलीज. सोशल मीडिया पर एक पोस्ट. इसका मतलब है एक नई तारीख. इसका मतलब है ‘शिक्षा माफिया’ शब्द का इस्तेमाल, जिसे बड़े नाटकीय गुस्से के साथ पेश किया जाता है. जैसे कि माफिया कहीं दूसरी दुनिया से आया हो, न कि वर्षों की उस संस्थागत सड़न से, जिसे सुधारने के लिए सरकार चुनी गई थी.
किसी ने इस्तीफा नहीं दिया. किसी को बर्खास्त नहीं किया गया. बस, जिम्मेदारी ली गई, और उसे सावधानी से पिछले सालों की जिम्मेदारी के बगल में एक दराज में रख दिया गया. इस बीच, वह छात्र जिसने पढ़ाई की, वास्तव में पढ़ाई की. दिन में 12 घंटे, बिना फोन के, राशन में मिली बिजली, उधार की किताबें, जिसके माता-पिता दोहरी शिफ्ट में काम कर रहे थे. वह अब 21 जून का इंतजार कर रहा है. फिर से पढ़ता है. फिर से भुगतान करता है- समय के रूप में, हिम्मत में, और धीरे-धीरे खत्म होते विश्वास में कि ईमानदार कोशिश कहीं ले जाती है.
यह वह कबूलनामा है जो सिस्टम हर साल सार्वजनिक रूप से जोर-शोर से करता है, और फिर तुरंत अपनी जांच के लिए एक कमेटी बना देता है. कमेटी अपनी रिपोर्ट सौंपेगी. पूरी 102 सिफारिशें, और शायद उसके आगे भी. पेपर फिर से लीक होगा. फिर गुस्सा दिखेगा, ताजा गुस्सा, जो उन लोगों द्वारा जोर-शोर से व्यक्त किया जाएगा जो पिछले साल चुप थे और अगले साल भी चुप रहेंगे.
और होनहार, गरीब, पस्त युवाओं की एक और पीढ़ी उस सबसे महत्वपूर्ण सबक को सीखेगी, जो यह देश किसी भी क्लासरूम के बाहर सिखाता हैः कि मेरिट एक ऐसा मिथक है जिसे उन लोगों के लिए बना कर रखा गया है जो सच को झेलने की औकात नहीं रखते. हम इसे ठीक नहीं करेंगे. इसलिए नहीं कि हम कर नहीं सकते. बल्कि इसलिए कि लीक कोई बग नहीं है. भ्रष्टाचार की इस शानदार कड़ी में कहीं न कहीं किसी के लिए, लीक ही असली प्रोडक्ट है. सपनों के उस PDF की कीमत 30,000 रुपये है. सपना खुद मुफ्त है. दोबारा परीक्षा 21 जून को है.
यही मजाक है. हमेशा से यही मजाक रहा है. पर कोई हंस नहीं रहा है.
(इंडिया टुडे वेबसाइट पर छपे लेख का अनुवाद)
कमलेश सिंह