विदेश नीति में भी 'विजेता' हैं मोदी, मौत की सजा पाए नेवी अफसरों की स्‍वदेश वापसी के मायने

कतर में मौत की सजा पाए नेवी के 8 पूर्व अफसरों की रिहाई आसान नहीं थी. पर इस कठिन कार्य को संभव बनाया है भारत की सफल कूटनीति ने. यह भारत का दुनिया में बढ़ते वर्चस्व की एक और बानगी है.

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भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और कतर के शेख भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और कतर के शेख

संयम श्रीवास्तव

  • नई दिल्ली,
  • 12 फरवरी 2024,
  • अपडेटेड 7:52 PM IST

कतर में जासूसी करने के आरोप में सजा पाए 8 भारतीयों की आजादी बताती है कि हिंदुस्तान की तूती विश्व कूटनीति में किस तरह बोल रही है.  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्‍व में विदेश नीति से जुड़े कुछ काम ऐसे हुए हैं, जो उन्‍हें अजात-शत्रु बनाते हैं. विदेशी धरती पर भारत के लिए चैलेंज बने उन मुद्दों की बात बाद में करेंगे, पहले संतोष जाहिर करें उन 8 भारतीय नेवी अफसरों की कतर से वतन वापसी पर, जिन्‍हें पिछले साल अक्‍टूबर में वहां मौत की सजा सुना दी गई थी.

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अगर भारत का इतिहास देखें तो यही लगेगा कि 8 नेवी अफसरों को वापसी नामुमकिन थी.आजादी के बाद पाकिस्तान जैसे देश में भारत के कितने ही निर्दोंष नागरिकों को आजीवन काल कोठरी में बिताना पड़ा और कितनों को को सूली पर चढ़ा दिया गया. सरकारें सिर्फ विरोध ही जताती रहीं. पिछले साल अप्रैल में मल्लिकार्जुन खरगे ने अपने ट्वीट में लिखा था, भारत और कतर 2023 में राजनयिक संबंधों के 50वें वर्ष का जश्न मना रहे हैं. इसके अलावा भारतीयों का कतर में सबसे बड़ा प्रवासी समुदाय है. खरगे ने लिखा कि प्रधानमंत्री मोदी ने कतर में अपने समकक्ष को फीफा विश्व कप की शुभकामनाएं भेजीं, लेकिन हमारे बहादुरों के कीमती जीवन को बचाने के लिए हस्तक्षेप नहीं किया. कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने भी आरोप लगाया था कि क्या प्रधानमंत्री इस वजह से कतर पर दबाव बनाने में उत्साह नहीं दिखा रहे हैं, क्योंकि कतर का सॉवरेन वेल्थ फंड अदाणी इलेक्ट्रिसिटी, मुंबई में एक प्रमुख निवेशक है. क्या इसीलिए जेल में बंद पूर्व नौसेना कर्मियों के परिजन जवाब के लिए दर-दर भटक रहे हैं. केंद्र सरकार बताए कि पूर्व नौसेना के कर्मियों के साथ इस तरह का व्यवहार क्यों किया जा रहा है. आज जरूर खरगे और जयराम रमेश को अपनी बातों पर शर्मिंदगी महसूस हो रही होगी. 

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1- नेवी अफसरों की रिहाई, मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति का सबूत

दरअसल नेवी के 8 अफसरों की रिहाई के लिए खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने स्तर से प्रयास कर रहे थे.पिछले साल दिसंबर में कतर के अमीर शेख तमीम बिन हम्द अल-थानी से दुबई में हुए सीओपी 28 सम्मेलन से अगल से मुलाकात की थी. विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने भी इस मीटिंग का जिक्र करते हुए बताया कि दोनों के बीच द्विपक्षीय संबंधों को लेकर एक अच्छी वार्ता हुई थी.
दोनों देशों के बीच एक अहम समझौता हुआ था. इस समझौते के तहत भारत कतर से लिक्विफाइड नेचुरल गैस खरीदेगा.ये करार भारत की पेट्रोनेट एलएनजी लिमिटेड कंपनी ने कतर की सरकारी कंपनी के साथ हुआ है.दरअसल सरकार जब इस तरह के समझौते करती है उसके आगे पीछे कई तरह के निर्णायक फैसले और होते हैं. यही दिखाता है कि सरकार अगर किसी काम के लिए दृढ इच्छाशक्ति दिखा दे तो कौन सा ऐसा काम है जो संभव न हो जाए.

2- निज्‍जर को मुद्दा बनाने चला कनाडा अकेला पड़ा

कनाडा में  एक खालिस्तानी कट्टरपंथी की अनसुलझी हत्या के लिए भारत को कटघरे में खड़ा करके आज राष्ट्रपति जस्टिन ट्रूडो भी जरूर पछता रहे होंगे.ट्रूडो ने घरेलू राजनीति को चमकाने के लिए निज्जर वाला दांव खेला था लेकिन, भारत की जबरदस्त जवाबी कूटनीति के चलते इस देश को लोग अब चरमपंथियों के पनाहगाहगार के रूप में देखते हैं. यही नहीं इस घटना के बाद से कनाडा की तुलना अब पाकिस्तान के साथ होने लगी है. खालिस्तान समर्थक सिख आतंकवादी के समर्थन के चलते ट्रूडो को अपने देश में शक की निगाह से देखा जाने लगा है. कनाडा के आरोपों और भारतीय राजनयिक को निष्कासित करने के जवाब में भारत ने भी कनाडाई राजनयिक को देश छोड़ने का हुक्म दिया था और कनाडा के नागरिकों के लिए वीजा सेवा को बंद कर दिया था.

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कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो को अपना कीमती समय संयुक्त राष्ट्र में अपने झूठे आरोप के लिए समर्थन जुटाने में बिताना पड़ा.कनाडाई अधिकारियों का बयान आया था कि उन्होंने केन्या, चिली, इटली, जर्मनी और यूरोपीय संघ के नेताओं से मुलाकात की और उन्हें भारत के साथ हुए विवाद में अपने साथ लाने का प्रयास किया. लेकिन जिन देशों से कनाडा के अधिकारियों ने मुलाकात की उनमें से किसी भी देश ने  कनाडा और भारत के बीच विवाद का कोई जिक्र भारत से नहीं किया.

कनाडाई मीडिया में ट्रूडो की जमकर थू-थू हुई. यही कारण रहा कि चुनावी आंकड़ों में गिरावट के बीच उनकी राजनीतिक स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ.कनाडा के एक प्रमुख दैनिक नेशनल पोस्ट ने एक संपादकीय में कहा था कि यह याद रखना महत्वपूर्ण है कि ट्रूडो का आरोप अभी तक साबित नहीं हुआ है.

3- पाकिस्‍तान तो हमेशा के लिए खमोश-

पिछले चुनाव से पहले पुलवामा हमला कराने वाला पाकिस्‍तान अब खून के आंसू रो रहा है. बालाकोट सर्जिकल स्‍ट्राइक से हौंसले ऐसे टूटे कि पाकिस्‍तान ने फिर भारत की ओर आंखें तिरछी करने की जुर्रत नहीं की. रही सही कसर जम्‍मू-कश्‍मीर से जुड़े आर्टिकल 370 को रद्द करके मोदी सरकार ने पाकिस्‍तान को निरुत्‍तर कर दिया. कश्‍मीर की सफीर (दूत) बनने चले इमरान खान जेल में हैं. पाकिस्‍तान की सेना अब पिछले दरवाजे से भारत के साथ सुलह-सफाई कर रही है. LOC पर सीज फायर एग्रीमेंट का पालन हो रहा है. पाकिस्तान की बलूचिस्तान को लेकर दुनिया भर में आलोचना हो रही है. अफगानिस्तान भी उसे हर रोज आंखे दिखा रहा है. . 

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4- जिस रूस पर पश्चिमी देशों ने प्रतिबंध लगाया, उससे ऑयल खरीदकर भारत ने दुनिया में दिखाया दम

रूस-यूक्रेन युद्ध पर भारत ने अब तक की सबसे सफल कूटनीति अपनाई . जिस रूस पर पश्चिमी देशों ने प्रतिबंध लगाया, उससे ऑयल खरीदकर भारत ने दुनिया के सामने ताकतवर तटस्‍थता का उदाहरण पेश किया. भारत का पड़ोसी देश पाकिस्तान जहां के नेताओं को भारत की हर बात बुरी लगती है वहां भी इस नीति की खूब चर्चा होती रही है. पाकिस्तान के पूर्व पीएम इमरान खान ने कई मौकों पर कई बार इस बात पर भारत की तारीफ की. इमरान अपने देश के नेताओं को मोदी की कूटनीति अपनाने के लिए प्रोत्साहित करते रहे हैं. वो बार-बार कहते रहे  कि भारत किस तरह रूस और पश्चिमी देशों दोनों का लाडला बना हुआ है. भारत रूस से तेल खरीदकर पश्चिमी देशों को बेचकर पैसा भी बना रहा है और देश में मुद्रा स्फीति को भी रोका हुआ है.

अप्रैल 2022 से लेकर जनवरी 2023 तक भारत से यूरोप को निर्यात किया जाने वाला रिफाइंड पेट्रोलियम का निर्यात बढ़ कर 1.16 करोड़ टन तक पहुंच गया था. भारत से जिन 20 क्षेत्रों को रिफाइंड पेट्रोल प्रोडक्ट का आयात होता है उसमें यूरोपियन यूनियन शीर्ष पर पहुंच गया था. भारत के रिफाइंड पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स के निर्यात का 22 फीसदी हिस्सा अकेले यूरोप में भेजा गया. अमेरिका और यूरोप की ओर से प्रतिबंध लगाए जाने के बाद भी भारत रूस से भारी मात्रा में रियायती दाम पर कच्चा तेल खरीद रहा है. रूस-यूक्रेन युद्ध से पहले तक भारत में रूसी तेल की हिस्सेदारी सिर्फ एक फीसदी थी. लेकिन एक साल में यानी फरवरी 2023 तक यह 35 फीसदी पर पहुंच गई थी.

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5- इजरायल-हमास हमले में भारत के रवैये का दुनिया ने पालन किया

गाजा पट्टी पर इजरायल की जबरदस्त सैन्य कार्रवाई पर विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अरिंदम बागची ने बताया था कि इजरायल पर हमास के हमले को लेकर भारत का रुख साफ है, भारत इसे एक आतंकवादी हमले के रूप में देखता है. उन्होंने कहा,'जहां तक फिलिस्तीन का सवाल है, भारत ने बातचीत के जरिए हमेशा मान्यता प्राप्त सीमा के भीतर रहने वाले फिलिस्तीनियों के लिए संप्रभु और स्वतंत्र देश की स्थापना की वकालत की है.'दुनिया के अधिकतर देशों का रुख भारत के तरीके का ही रहा है.

 संयुक्त राष्ट्र आम सभा में जॉर्डन की तरफ़ से पेश इजराइल और हमास के बीच मानवीय आधार पर तुरंत संघर्ष विराम लागू करने के प्रस्ताव को पर मतदान के दौरान भारत अनुपस्थित रहा था. इस प्रस्ताव के समर्थन में 120 देशों और विरोध में 14 देशों ने वोट किया. भारत की ही तरह ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, डेनमार्क, इथियोपिया, जर्मनी, ग्रीस, इराक़, इटली, जापान, नीदरलैंड्स, ट्यूनीशिया, यूक्रेन और ब्रिटेन समेत 45 देश अनुपस्थित रहे. यह भारत की कूटनीतिक चतुरता ही थी कि भारत ने अरब देशों को नाराज होने दिया और न ही इजरायल को अपने से दूर होने दिया.

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