बांग्लादेश में छात्र नेता उस्मान हादी की हत्या पर मचे बवाल के बीच 18 दिसंबर 2025 को एक हिंदू युवक दीपू दास के साथ मजहबी कट्टरपंथ के नाम पर जो हुआ, उसे दुनिया ने दरिंदगी की मिसाल के रूप में देखा. वीडियो में दिखाई दिया कि इस्लाम की बेइज्जती करने के नाम पर उसे कैसे भीड़ ने पुलिस की गिरफ्त से बाहर खींचा. पहले पीट पीटकर अधमरा किया और फिर पेड़ से लटकाकर जिंदा जला दिया. इस कांड के डेढ़ महीने बाद अंतरिम सरकार चला रहे मोहम्मद यूनुस को अल्पसंख्यकों के उत्पीड़न का दाग धोने की याद आई. मृतक दीपू के परिवार को घर बनाने और आर्थिक मदद के लिए 25-25 लाख टका देने का आश्वासन दिया गया है. लेकिन, क्या ऐसा कर देने भर से यूनुस और उनकी सरकार को आरोपों से मुक्ति मिलेगी?
बांग्लादेश में हो रही घटनाएं किसी छोटी लड़ाई का नतीजा नहीं हैं, बल्कि लंबे समय से घट रहे मजहबी हमलों का हिस्सा हैं. बांग्लादेश में हिंदू समुदाय आज अपनी सुरक्षा को लेकर बेहद चिंतित है और हर रोज़ यही सवाल करता है कि क्या वह सुरक्षित है? डर की एक लहर थी जो पूरे अल्पसंख्यक समाज में फैल गई. क्योंकि हिंसा थमी नहीं है. दुकानदार, कारोबारियों और आम हिंदुओं पर हमले लगातार हो रहे हैं. हाल ही में मयमनसिंह में एक 62 वर्षीय हिंदू व्यापारी सुसेन चंद्र सरकार को उसकी दुकान के अंदर बेरहमी से मार डाला गया, इससे पहले भी कबकोन चंद्र दास जैसे व्यापारियों पर जानलेवा हमले हुए हैं.
गिरती आबादी, बढ़ती असुरक्षा
बांग्लादेश की कुल जनसंख्या में हिंदुओं का हिस्सा अब लगभग 8% के आसपास रह गया है. चार दशक पहले यह संख्या 13.5% थी. कई विशेषज्ञों के अनुसार, हिंसा, डर और असुरक्षा के कारण हिंदू समुदाय लगातार देश से बाहर जाने, पलायन करने या अपनी पहचान बदलने पर मजबूर हुआ है. जब आबादी गिरती है और हिंसा की खबरें आम होती हैं, तो समुदाय के भीतर डर की भावना बढ़ती है. लोग सुबह उठकर सोचते हैं, ‘क्या आज सुरक्षित रहेंगे?’ या ‘क्या हमारे बच्चों का भविष्य सुरक्षित है?’
कई मानवाधिकार समूहों ने बांग्लादेश में हिंदू समुदाय के खिलाफ बढ़ते हमलों पर चिंता जताई है. इन समूहों के अनुसार मौजूदा हिंसा सिर्फ अपराध तक सीमित नहीं है, बल्कि यह कम्युनल है. जो अल्पसंख्यकों को डराने और डर के बल पर कंट्रोल करने की कोशिश है. जब मंदिरों पर हमले होते हैं, पूजा स्थलों को निशाना बनाया जाता है या व्यक्ति के विश्वास को लेकर हमला होता है, तब एक बड़ा सवाल उठता है कि क्या अल्पसंख्यक वास्तव में समान नागरिक हैं?
1. Amnesty International और Bangladesh Hindu Buddhist Christian Unity Council (BHBCUC) ने संयुक्त रूप से कहा है कि धर्म के आधार पर उत्पीड़न और हिंसा बढ़ रही है और चुनाव से पहले स्थिति और चिंताजनक हो रही है.
2. Minorities Rights Group International (MRG) ने बांग्लादेश सरकार से अपील की है कि ऐसी घटनाओं की स्वतंत्र जांच हो और अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा के लिए ठोस कदम उठाए जाएं.
3. Hindus for Human Rights (HfHR) जैसे समूहों ने भी सामुदायिक हिंसा के खिलाफ बयान जारी किया है और कहा है कि धार्मिक रूप से लक्षित हिंसा लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है.
इसके अलावा Coalition of Hindus of North America (CoHNA) और कई यूएस आधारित हिंदू और दक्षिण एशियाई संगठन भी इन हिंसाओं पर कड़ी निंदा कर रहे हैं और वैश्विक मीडिया तथा संस्थाओं को ध्यान देने का आग्रह कर रहे हैं.
यूनुस सरकार की खानापूर्ति?
बांग्लादेश की अंतरिम सरकार के प्रमुख सलाहकार मोहम्मद यूनुस ने कई बार हिंसा को ‘अपराधिक’ या ‘व्यक्तिगत’ बताया है, और इसे सांप्रदायिक रूप नहीं माना. उनका कहना है कि पुलिस के रिकार्ड के मुताबिक 2025 में दर्ज 645 घटनाओं में से केवल 71 को ही सांप्रदायिक माना गया है. सरकार ने दीपू दास के परिवार को आर्थिक सहायता देने का भी ऐलान किया है, ताकि इस घटना की किरकिरी का दाग मिटाने का प्रयास किया जा सके. लेकिन यह सहायता नाकाफी है जब हर दिन हजारों लोग डर के साथ जी रहे हैं. सरकारी आंकड़ों से असहमत कई मानवाधिकार समूह कहते हैं कि हिंसा की असली तस्वीर पुलिस रिकार्ड से अलग है. जब समुदाय की अपनी आवाज डर के कारण दब जाती है, तब ‘आपराधिक घटना’ कहना आसान होता है, लेकिन हकीकत वही है जो रोज के सहमे हुए जीवन में दिखती है.
चुनौती बढ़ते मजहबी कट्टरपंथ की
बांग्लादेश में राजनीति और धार्मिक पहचान का जुनून पुराना है, लेकिन हाल के सालों में इसका असर और तेज हुआ लगता है. कुछ राजनीतिक पार्टियों और समूहों के एजेंडों में मजहब और पहचान की राजनीति शामिल है. जमात-ए-इस्लामी और BNP जैसी पार्टियों की नीतियों में अल्पसंख्यकों के प्रति संवेदनशीलता अलग-अलग होती है. यह असुरक्षा पैदा करती है कि अगर सत्ता में ऐसे तत्व आए जो धर्म आधारित राजनीति को बढ़ावा मिलेगा. यानी हिंदू समुदाय और भी अधिक जोखिम में हो सकता है.
कुछ लोगों का मानना है कि कट्टरपंथी विचारधाराएं चुनावी समय का फायदा उठाकर अल्पसंख्यकों के खिलाफ माहौल बनाती हैं, जिससे अल्पसंख्यक वोटर और समुदाय दोनों डरते हैं और अपनी पहचान छिपाने लगते हैं.
चुनाव को लेकर डर और उम्मीदें दोनों
बांग्लादेश कल बुधवार को यानी 12 फरवरी 2026 को आम चुनाव के लिए जा रहा है. यह चुनाव इसलिए भी खास है क्योंकि यह पहले ऐसे चुनाव हैं जब प्रधानमंत्री शेख हसीना 15 साल की सत्ता के बाद सत्ता से बाहर हैं और एक नई राजनीतिक तस्वीर बन रही है. अल्पसंख्यक हिंदू समुदाय इस चुनाव को लेकर डर के साथ ही कुछ उम्मीद भी रखता है. भय इस बात का है कि राजनीतिक उथल-पुथल, कट्टरपंथी तत्वों और हिंसा की राजनीति से या तो उनकी हिस्सेदारी कम हो जाए या वे खुद वोट डालने से डरें. लेकिन उम्मीद इस बात की है कि अगर मतदान भयमुक्त हो और अलग-अलग समुदायों की भागीदारी सही तरीके से हो, तो शायद भविष्य बेहतर हो. कुछ हिंदू नेता और उम्मीदवार भी इस माहौल में खड़े हैं, यह दिखाने के लिए कि समुदाय चुनावी प्रक्रिया का हिस्सा बन सकता है, लेकिन यह भी सच है कि डर बहुत पैठ चुका है.
...और सबसे बड़ा भविष्य का सवाल
अब एक बड़ा सवाल यह है कि चुनाव के बाद हिंदुओं का भविष्य क्या होगा? अगर चुनावी परिणाम कट्टरपंथी ताकतों या उनकी आइडियालॉजी को अधिक ताकत देगा जो अल्पसंख्यकों को सुरक्षित नहीं मानते, तो हिंदुओं के डर और अस्तित्व के सवाल और गहरे होंगे. मानवाधिकार संगठन कहते हैं कि अगर चुनाव के बाद सुरक्षा, न्याय और समान अधिकार सुनिश्चित नहीं किया गया, तो यह सिर्फ आज की समस्या नहीं रहेगी, बल्कि भविष्य की पीढ़ियों के लिए एक बड़ा संकट बन जाएगी.
बांग्लादेश में हिंदू समुदाय सिर्फ एक धार्मिक समुदाय नहीं है, बल्कि वह उस देश की सांस्कृतिक जड़ और विविधता का एक अहम हिस्सा रहा है. आज जब हिंसा, डर और असुरक्षा ने उनके दिलों में घर कर लिया है, तो केवल आर्थिक सहायता या आंकड़ों से उसका समाधान नहीं होगा.
धीरेंद्र राय