अक्सर कुछ बातें इसलिए नहीं कही जातीं, क्योंकि वो भारतीयों के बीच समाज विरोधी होती हैं. वो समाज जो अतिरंजित है, महानताबोध से ग्रसित है. 'पुत्रवती भव' का आशीर्वाद देने वाला है. यहां बेटों को कमाकर मां-बाप की सेवा करनी है. पत्नी-बच्चों की जिम्मेदारियां निभानी हैं. वहीं बेटियों को पढ़-लिखकर या कोई भी पहचान हासिल करके किसी बेटे का परिवार पूर्ण करना है. ये संस्था है 'शादी', जिसमें बेटा हो या बेटी, दोनों ही पिस रहे हैं. पिसना वैसे बहुत छोटा शब्द है, उनके लिए जो किसी तरह प्रिविलेज्ड हैं. वरना बहुसंख्या में इस संस्था में युवा पिस ही रहे हैं. अगर आपको ये बात बढ़ा-चढ़ाकर कही हुई लगती है तो आप नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरों के डेटा उठाकर देख लीजिए. अगर आप सोशल मीडिया में जेन-जी के ट्रेंड को फॉलो कर रहे हैं तो वहां भी आपको इस संस्था से बच्चों का डर और वितृष्णा साफ-साफ दिख जाएगी.
विवाह संस्था में पहले ज्यादा संख्या में लड़कियां क्रूरता, दुष्प्रेरितआत्महत्या या हत्या का शिकार हो रही थीं. लेकिन अब इस घुटन ने मर्दों को भी करीब से सताना शुरू कर दिया है. इस व्यवस्था पर सवाल उठाने से पहले उस पूरे समीकरण को समझना होगा जो विवाह संस्था का निर्माण करता है. अरेंज मैरिज है तो लड़की पढ़ी-लिखी हो, छरहरी काया, गौर वर्ण हो, उसका परिवार अच्छा हो आदि-आदि. वहीं लड़कों के मामले में भी मोटी सैलरी वाली नौकरी, गुड लुकिंग अच्छे परिवार का टैग देखा जाता है. लेकिन विवाह की परिणति उसी व्यवस्था में जाकर पूरी होती है जहां लड़की को अपना घर छोड़कर दूसरे के घर में जाना होता है.
एक सामान्य आईक्यू से भी समझें तो मूल समस्या यहीं से शुरू होती है. एक लड़की जो दूसरे परिवार से आई है, पहले तो उसे अपनी पहचान खोने का डर और अपने घर से पलायन की अनकही पीड़ा है. उस पर दूसरे घर का माहौल, उनकी जीवनशैली को समझने और अपनाने का चैलेंज है. ये चैलेंज कई बार लड़कियों के लिए एक ऐसी परीक्षा जैसा होता है जिसमें 'एग्जामनर' के तौर पर सास-ननद, जेठानी या दूसरे ससुराली जन जैसे परीक्षा के साथ-साथ नंबर देते चल रहे हों. वहीं लड़कों के मामले में भी ये परीक्षा आसान नहीं होती. किसी घर की बेटी उसके साथ अपना नाम और पहचान छोड़कर दाखिल होती है. एक तरफ उसे कमाने और अपने घरवालों के प्रति वफादारी प्रूव करने का दबाव होता है. वहीं, दूसरी तरफ 'गलत' का विरोध करने पर उसके परिवार वाले और न करने पर उस लड़की के परिवार वाले भी उसको कटघरे में खड़ा करने के लिए तैयार रहते हैं.
इसलिए ये कहना गलत नहीं होगा कि ये पूरा संकट सिर्फ एक पक्षीय नहीं है. राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के आंकड़े भी इसकी पुष्टि करते हैं. बेशक, भारत में आज भी हर रोज औसतन 16 से 17 महिलाएं दहेज और घरेलू प्रताड़ना के कारण अपनी जान गंवाती हैं (वर्ष 2024 में ये आंकड़ा 5,737 मौतों का था). लेकिन इसी सिक्के का एक दूसरा पहलू यह भी है कि देश में कुल आत्महत्या करने वालों में लगभग 71% से 72% पुरुष हैं, और उनमें से भी करीब 68% पुरुष शादीशुदा हैं. वे पुरुष जो हर साल पारिवारिक कलह, वैवाहिक कड़वाहट और कानूनी मुकदमों के खौफ से चुपचाप फंदे पर झूल जाते हैं. देश की फैमिली कोर्ट्स भी इस तरह के केसों से लदी हुई हैं.
भले ही कई बार ये स्थितियां अलग होती हैं. जैसे लड़का कहीं बाहर रहकर कमाता है, लड़की भी कमाती है, लेकिन 'प्रेशर वाला सिस्टम' वैसे ही काम करता है. ये प्रेशर ही कई बार मानसिक तनाव या घरेलू हिंसा का रूप ले लेता है. असामान्य केसेज में इसमें कई बार महिला पर अत्याचार बढ़ जाते हें तो कुछ केसों में पति मानसिक उत्पीड़न और कलह के चलते सुसाइड कर लेता है.
अब सोचकर देखिए. दुनिया की लार्जेस्ट इकोनॉमी बनने का सपना देखने वाले देश में क्यों इस बारे में अभी तक सोचा नहीं जा रहा. यूरोप, अमेरिका या इटली जैसे देशों में शादी के बाद 'दहेज हत्या' या इस स्तर का घरेलू टॉर्चर नहीं दिखाई देता. वहां न्यूक्लियर सामाजिक ढांचे के कारण सब इनडिविजुअल पहचान वाले हैं. हां माना कि वहां बच्चे कम उम्र से ही कमाना शुरू कर देते हैं, पर ठीक है न उन्हें हर वक्त ताने तो नहीं सुनने पड़ते कि हमने तुम्हें पाला, अपना सब त्याग दिया. जाहिर है वहां माता-पिता के रोल में भी लोगों ने बच्चों पर अहसान करने से ज्यादा अपने जीवन जीने पर जोर दिया होगा.
वहां शादी दो परिवारों की प्रतिष्ठा का खेल नहीं, बल्कि दो व्यक्तियों का आपसी समझौता है. वहां ससुराल नाम का कोई चौबीस घंटे का सर्विलांस सिस्टम नहीं होता, जहां किसी बहू को खुद को 'परफेक्ट' साबित करने के लिए अपनी मानसिक शांति की बलि देनी पड़ती हो. वहां आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर लड़कियां रिश्ते टूटने को अपनी सामाजिक मौत भी नहीं मानतीं, बल्कि बिना किसी स्टिग्मा के तलाक लेकर आगे बढ़ जाती हैं. वहीं चीन जैसे देश में, जहां वन-चाइल्ड पॉलिसी के चलते भयंकर लैंगिक असंतुलन है और पुरुषों की तुलना में महिलाएं करोड़ों कम हैं, वहां पर 'ब्राइड प्राइस' जैसी व्यवस्था का चलन है जिससे महिलाओं की स्थिति सामाजिक रूप से मजबूत रहती है.
...तो फिर इस जकड़े हुए चक्रव्यूह का रास्ता किधर जाता है? सवाल यह है कि हम अपने बच्चों को एक 'इंडिविजुअल पहचान' देना कब सीखेंगे? हमारी सोच आज भी उसी सड़ी-गली रूढ़ि पर टिकी है कि 'बेटी की डोली ससुराल जाएगी और वहां से उसकी अर्थी ही निकलेगी.' इसी सोच का नतीजा है कि माता-पिता बेटी को खुद के पैरों पर खड़े होने का हौसला देने के बजाय, उसे किसी 'अमीर आदमी की पत्नी' बनाने का सपना देखने लगते हैं. लड़कों के लिए सरकारी नौकरी वाला टैग ढूंढा जाता है और लड़कियों से 'हाउसवाइफ' बनने की मूक मांग की जाती है.
इस व्यवस्था को जड़ से बदलना होगा. हमें यह स्वीकार करना होगा कि लड़की कोई 'पराया धन' नहीं है, बल्कि वह भी एक स्वतंत्र इंडिविजुअल है. बेटियों पर भी यह जिम्मेदारी डालनी होगी कि वे कमाएं, क्योंकि शादी करना जिंदगी का आखिरी और इकलौता लक्ष्य नहीं है, यह जीवन का सिर्फ एक हिस्सा है. बहुओं से दहेज मांगना, दामाद या उसके परिवार से चढ़ावे में ससुराल वालों से सोने-चांदी के जेवरों की फरमाइश करना, कम जेवर लाने पर ताना देना... ये तमाम कुरीतियां इस व्यवस्था के खोखलेपन को दर्शाती हैं.
अगर समाज में लड़का और लड़की बराबर कमाएं, शादी करके अपने माता-पिता के साए और सर्विलांस से दूर अपने अलग घर में रहें तो आधी समस्याएं वहीं खत्म हो जाएंगी. ढलती उम्र के माता-पिता की जिम्मेदारी को भी पूरी तरह सिर्फ लड़के और बहू पर मढ़ने के बजाय उसे एक 'कम्युनिटी रिस्पॉन्सिबिलिटी' (सामुदायिक जिम्मेदारी) की तरह देखना होगा, जैसा कि विकसित समाजों में होता है. शादी के बाद पूरे समाज को एक जोड़े को हर सेकंड जज करना बंद करना होगा.
हमें बदलाव की शुरुआत अपनी चौखट से करनी होगी. जब तक हम 'लोग क्या कहेंगे' के उस पुराने डर को दरकिनार कर अपने घरों के भीतर ऐसा 'सेफ स्पेस' नहीं बनाएंगे, तब तक सख्त से सख्त कानून भी बंद कमरों के इन कत्लों को नहीं रोक पाएंगे. अगर यह बुनियादी बदलाव नहीं आया, तो कभी ट्विशा, कभी दीपिका या तमाम पुरुषों के सुसाइड की दिल दहलाने वाली खबरें अखबारों और पोर्टल्स पर तैरती रहेंगी.
अब समय आ गया है कि हम 'नारीवाद' और 'पुरुषवाद' की खोखली बहसों और कबीलाई कटघरों से बाहर निकलें. क्योंकि जब तक हम इन बुनियादी ढांचों को नहीं बदलेंगे, तब तक ये डिजिटल अदालतें सजती रहेंगी, टीवी पर डिबेट्स होती रहेंगी और इस व्यवस्था की बलि चढ़कर देश का तमाम हुनर, टैलेंट और जिंदगियां यूं ही असमय मरती रहेंगी. आखिरकार, जब फंदे पर कोई लटकता है, तो वो कोई जेंडर नहीं, सिर्फ और सिर्फ हाड़-मांस का एक तड़पता हुआ इंसान होता है.
मानसी मिश्रा