इंदौर में पांच महीने के एक बच्चे को उसकी मां ने दूध में पानी मिलाकर ये सोचकर पिला दिया कि उसे पचाने में आसानी होगी. वो नहीं जानती थी कि वो पानी नहीं, बल्कि दूध में जहर मिला रही है जो उसके घर पर नल से सप्लाई हुआ है. अब वो बच्चा इंदौर की उन 14 मौतों में शामिल है, जो पेयजल सप्लाई के नाम पर हो रहे जानलेवा धोखे का शिकार बने. 1400 लोग अब भी बीमार हैं. पता चला है कि सीवर के पानी मिले इस 'पेयजल' में हैजे के घातक कीटाणु भी थे.
इंदौर में सीवर मिला पानी पीने से हुई मौतें सिर्फ एक शहर की त्रासदी नहीं हैं, ये उस सरकारी भ्रम का भी पर्दाफाश है जिसमें पाइप से पानी पहुंचना ही 'सुरक्षित पेयजल' मान लिया गया. देश के सबसे साफ सुथरे शहर इंदौर में हुई मौतों ने ये भी साबित किया कि ऊपरी साफ सफाई के नीचे एक अंडरग्राउंड सड़ांध बह रही थी. ये सड़ांध सिर्फ पाइपों में गंदे पानी की नहीं थी, बल्कि उस सरकारी उपेक्षा की भी थी जिस पर किसी चेतावनी का असर नहीं पड़ा. और ये बेखबरी और अनदेखी देश के अलग अलग हिस्सों में दिखाई देती है.
इंदौर: ‘सबसे साफ शहर’ का सबसे जहरीला सच
इंदौर, जिसे लगातार देश का सबसे स्वच्छ शहर घोषित किया जाता रहा, वहीं कुछ इलाकों में नलों से काला, बदबूदार पानी आया. बाद में खुलासा हुआ कि एक शौचालय की सीवर लाइन और पेयजल पाइपलाइन का घातक मिलन हो गया था. नतीजा डायरिया, उल्टी, संक्रमण और मौतें. यह हादसा अचानक नहीं था. स्थानीय लोग महीनों से शिकायत कर रहे थे, लेकिन गंदे पानी से होने वाली बीमारियों को इमरजेंसी नहीं माना गया. जब मौतें हुईं, तब सिस्टम जागा.
यह घटना बताती है कि वॉटर ट्रीटमेंट प्लांट लग जाना पर्याप्त नहीं है. असली खतरा उस पाइप नेटवर्क में छुपा है जो घरों तक पानी लाता है. पुरानी, जर्जर, रिसाव से भरी पाइपलाइनें, जिनका कोई नियमित ‘एक्स-रे’ नहीं होता है.
दिल्ली से बठिंडा तक: शिकायतों का लंबा नक्शा
इंदौर अपवाद नहीं है. दिल्ली में कई इलाकों के लोग बताते हैं कि उन्हें पानी दो-तीन दिन में एक बार मिलता है, और वो भी पीने लायक नहीं. द्वारका की सोसायटियों में काला, बदबूदार पानी आने से लोग बीमार पड़े. अदालतों को जल बोर्ड से जवाब मांगना पड़ा. पंजाब के मुक्तसर, मालोट जैसे कस्बों में नलों से काला पानी निकलने की खबरें आईं. यह सब अलग-अलग घटनाएं नहीं, बल्कि एक ही बीमारी की अलग अलग लोकेशन है. खराब जल प्रबंधन. जो अनगिनत जगहों से रिपोर्ट होता है, और स्थानीय खबर बनकर रह जाता है.
देश के 66 फीसदी घरों में RO-फिल्टर, 'इंदौर' वाला डर आम है
आज भारत में RO और वाटर प्यूरीफायर कोई लक्ज़री नहीं, सरकारी व्यवस्था का विकल्प बन चुके हैं. यह वैसा ही है जैसे प्रदूषित हवा के कारण एयर प्यूरीफायर सामान्य जरूरत बनते जा रहे हैं. जब लोग अपने स्वास्थ्य की सुरक्षा खुद करने को मजबूर हो जाएं, तो यह विकास नहीं, प्रशासनिक विफलता है.
अब यह सवाल बहुत पुराना हुआ कि क्या हमारे घर के नल से आने वाला पानी सचमुच पीने लायक है, या हम हर घूंट के साथ जोखिम भी पी रहे हैं? क्योंकि एक सर्वे के मुताबिक देश के जिन घरों पाइप से पानी सप्लाई हो रहा है उनमें से 96 फीसदी उसे पीने लायक नहीं मानते हैं. और यही कारण है कि 33 फीसदी घरों में साफ पानी के लिए RO सिस्टम लगे हैं और 27 फीसदी घरों में कोई और वॉटर प्यूरिफायर यूज होता है. इन 60 फीसदी के अलावा करीब करीब 20 फीसदी लोग पानी को उबालकर पी रहे हैं. तीन फीसदी ऐसे भी हैं जो वॉटर सप्लाय की व्यवस्था के भरोसे न रहकर सीधे बॉटल वाला मिनरल वॉटर रोज घर मंगवा रहे हैं.
फैमिली हेल्थ सर्वे: ‘इम्प्रूव्ड सोर्स’ का झूठा सुकून
सरकार अक्सर 2019-21 के दौरान हुए नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे NFHS-5 का हवाला देती है कि करीब 96 फीसदी घरों को ‘इम्प्रूव्ड ड्रिंकिंग वॉटर सोर्स’ मिल गया है. इसके साथ ही जल जीवन मिशन को सामाजिक क्रांति की तरह पेश किया गया. लेकिन यह दावा कनेक्टिविटी का है, क्वालिटी का नहीं. पाइप होना और पानी का पीने योग्य होना, दोनों के बीच की खाई ही सबसे बड़ी जल-संकट कथा है. इम्प्रूव्ड सोर्स का मतलब यह नहीं कि पानी सुरक्षित है, बस इतना कि वो पाइप, हैंडपंप या ट्यूबवेल से आता है. NFHS खुद यह नहीं कहता कि वो पानी माइक्रोबायोलॉजिकल या केमिकल रूप से सुरक्षित है. यही वजह है कि शहरी भारत में एक सर्वे के मुताबिक सिर्फ लगभग 6 प्रतिशत घरों को ही ऐसा नल का पानी मिलता है जिसे सीधे पीया जा सके.
दुनिया दिखाती है आईना, मैले पानी में हमें हकीकत दिखती कहां है?
साफ पेयजल सप्लाई में हमारी विफलता भारत की अंतरराष्ट्रीय छवि में भी झलकती है. Global Rescue जैसी अंतरराष्ट्रीय ट्रैवल और सेफ्टी एडवाइजरी देने वाली फर्म भारत को उन देशों की सूची में रखती हैं जहां नल का पानी पीना असुरक्षित माना जाता है. भारत आने वाले विदेशियों को पहले से हिदायत दी जाती है कि केवल बोतलबंद मिनरल वाटर पिएं.
यह कोई औपनिवेशिक पूर्वाग्रह नहीं, बल्कि एक व्यावहारिक चेतावनी है. नॉर्वे, स्विट्ज़रलैंड, जापान या सिंगापुर जैसे देशों में नल का पानी सीधे पिया जाता है, वहां सिस्टम के कठोर स्टेंडर्ड हैं. लगातार टेस्टिंग और निगरानी होती है. भारत में पाइप बिछाने पर जोर है, पानी की गुणवत्ता पर नहीं.
EPI और WHO का अलार्म- Environmental Performance Index (EPI) में सेनिटेशन और सुरक्षित पेयजल को लेकर बेहतरीन से बदतर देशों की फेहरिस्त में भारत का 139वां स्थान है, WHO-UNICEF के अनुसार, दुनिया में हर चौथा व्यक्ति आज भी सुरक्षित रूप से प्रबंधित पेयजल (safely managed drinking water) से वंचित है. और भारत इस संकट का बड़ा हिस्सेदार है. ‘सुरक्षित रूप से प्रबंधित’ का मतलब सिर्फ पानी पहुंचना नहीं, बल्कि उसका फेकल (अपशिष्ट, मल आदि) और केमिकल (नाइट्रेट, फ्लोराइड, आर्सेनिक, यूरेनियम) प्रदूषण से मुक्त होना है. ये कैमिकल ऐसा खतरा हैं जो तुरंत नहीं मारते, लेकिन सालों में हड्डियां कमजोर करते हैं. किडनी खराब करते हैं, कैंसर का जोखिम बढ़ाते हैं. पाइप से यह पानी घरों तक चुपचाप पहुंच रहा है.
सरकार के लिए ‘साफ पेयजल’ सप्लाई इतनी दूभर क्यों है?
यही वो सवाल है कि सरकारें पेयजल सप्लाई की गारंटी देने से क्यों बचती हैं और खुद को जल सप्लाई तक सीमित रखती हैं? क्योंकि पेयजल का मतलब है नियमित माइक्रोबायोलॉजिकल टेस्ट, पाइप नेटवर्क का ऑडिट, पब्लिक रिपोर्टिंग, और नाकामी पर जवाबदेही. यह सब कठिन है, महंगा है और राजनीतिक तौर पर जोखिम भरा भी. कनेक्शन गिनना आसान है, पानी की गुणवत्ता मापना नहीं.
इंदौर में जो हुआ, वो भरोसे की हत्या है. लोगों ने सरकारी तंत्र पर भरोसा किया कि नल से आने वाला पानी सुरक्षित होगा. बदले में उन्हें बीमारी और मौत मिली. यह भरोसा सिर्फ इंदौर में नहीं टूटा. दिल्ली, पंजाब, उत्तर भारत के कस्बों और महानगरों में रोज चटक रहा है.
अगर जल जीवन मिशन को सचमुच कामयाब बनाना है, तो सरकार को क्वालिटी को लक्ष्य बनाना होगा. हर शहर-कस्बे में नियमित जल परीक्षण सार्वजनिक करना होगा. सीवर और पेयजल पाइपलाइन के जंक्शन का ऑडिट करना होगा. और गंदे पानी के सप्लाय को हेल्थ इमरजेंसी मानना होगा. वरना बीमारी और उनसे होने वाली मौत पर मुआवजा और सरकारी आंसूं सिर्फ लकीर पीटने जैसे होंगे. भारत में नल से पानी आता रहेगा, लेकिन भरोसा RO और मिनरल वॉटर की बोतल में बंद रहेगा. और सरकार को मुफ्त अनाज के साथ एक दिन मुफ्त मिनरल वॉटर सप्लाई की योजना भी चलानी पड़ेगी.
धीरेंद्र राय