कन्नौज में अखिलेश यादव के उतरने के बाद क्‍या राहुल गांधी भी अमेठी या रायबरेली का रुख करेंगे?

कन्नौज सीट से अखिलेश यादव के चुनाव लड़ने का एक मकसद तो 2019 में डिंपल यादव की हार का बदला लेना ही लगता है, वैसे कार्यकर्ताओं को मैसेज देने का एक तरीका तो है ही - लेकिन ये राहुल गांधी के अमेठी लौटने या रायबरेली से भी चुनाव लड़ने का कोई संकेत हो सकता है क्या?

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अखिलेश यादव बीजेपी के साथ साथ मायावती से भी बदला लेने मैदान में उतर चुके हैं. अखिलेश यादव बीजेपी के साथ साथ मायावती से भी बदला लेने मैदान में उतर चुके हैं.

मृगांक शेखर

  • नई दिल्ली,
  • 25 अप्रैल 2024,
  • अपडेटेड 11:51 AM IST

अखिलेश यादव ने फिर से दिल्ली का टिकट कटा लिया है. अभी तो वेटिंग लग रहा है. कंफर्म होता है या नहीं, ये तो 4 जून को ही पता चलेगा. लोकसभा चुनाव के चौथे चरण में कन्नौज के लोग 13 मई को वोट डालेंगे.

समाजवादी पार्टी ने कन्नौज लोकसभा सीट से अखिलेश यादव को अपना उम्मीदवार घोषित किया है. 2019 में आजमगढ़ से लोकसभा सांसद चुने गये थे, लेकिन 2022 में करहल से विधायक बन जाने के बाद संसद सदस्यता से इस्तीफा दे दिया था. अब अखिलेश यादव ने एक बार फिर लोकसभा का रुख किया है. 

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बेशक कन्नौज सीट से अखिलेश यादव के चुनाव लड़ने का मकसद यूपी में समाजवादी पार्टी और INDIA गठबंधन को मजबूती देना है, लेकिन क्या लोगों के मन में ये सवाल नहीं उठेगा कि अखिलेश यादव ने लखनऊ से दिल्ली शिफ्ट होने का फैसला क्यों किया? 

और अब एक सवाल ये भी उठता है कि अखिलेश यादव के चुनाव लड़ने से राहुल गांधी को भी अमेठी या रायबरेली से भी चुनाव मैदान में उतरने की प्रेरणा मिलेगी क्या? 2019 में भी समाजवादी पार्टी गठबंधन करके बीएसपी के साथ चुनाव लड़ी थी, लेकिन तब मायावती ने चुनाव नहीं लड़ने का फैसला किया था.

कन्नौज पर कब्जा वापस लेना और डिंपल की हार का बदला लेना है

कन्नौज, समाजवादी पार्टी के संस्थापक मुलायम सिंह यादव की सीट रही है, जिसका अखिलेश यादव और डिंपल यादव दोनों ही लोकसभा में प्रतिनिधित्व कर चुके हैं, लेकिन 2019 में डिंपल यादव को बीजेपी के सुब्रत पाठक से मुकाबले में हार का मुंह भी देखना पड़ा था - और देखा जाये तो अखिलेश यादव के मैदान में उतरने का एक मकसद डिंपल यादव की हार का बदला लेना भी है. 

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बदले की आग अंदर किस तरह धधक रही है, ये तो अखिलेश यादव की लोकसभा चुनाव की रणनीतियों को देखने पर ही मालूम होता है. 2019 के चुनाव बाद मायावती ने सपा-बसपा गठबंधन तोड़ दिया था. वैसे तो मायावती का कहना था कि सपा के साथ गठबंधन से बीएसपी को नुकसान हो रहा है,  लेकिन घाटे में तो अखिलेश यादव ही रहे. बीएसपी जहां जीरो से 10 सीटों पर पहुंच गई, समाजवादी पार्टी का नंबर 5 से आगे नहीं बढ़ सका - ऊपर से डिंपल यादव की हार तो सबसे बड़ा नुकसान था.

और ये बदला अखिलेश यादव सिर्फ कन्नौज सीट पर ही नहीं लेने जा रहे हैं, बीएसपी के पुराने दिग्गजों को मैदान में उतार कर वो मायावती को भी चैलेंज कर रहे हैं. अखिलेश यादव ने बाबू सिंह कुशवाहा सहित 14 ऐसे नेताओं को टिकट दिया है, जो कभी बीएसपी के कर्णधार रहे हैं. बाबू सिंह कुशवाहा समाजवादी पार्टी के टिकट पर जौनपुर लोकसभा सीट से चुनाव लड़ रहे हैं, जिनके खिलाफ बीएसपी की तरफ से श्रीकला रेड्डी चुनाव मैदान में हैं. श्रीकला रेड्डी, जौनपुर के ही पूर्व सांसद धनंजय सिंह की पत्नी हैं, जिन्हें मायावती ने मुख्यमंत्री रहते अपने आवास पर पुलिस बुलाकर गिरफ्तार करा दिया था. 

बदला लेने के साथ साथ अखिलेश यादव के लिए अपना गढ़ बचाने की भी चुनौती है. मुश्किल ये है कि मुलायम सिंह यादव भी अब नहीं हैं, और दूसरी छोर से मोर्चा संभालने वाले संभल के सांसद शफीकुर्रहमान बर्क भी नहीं रहे. रामपुर में समाजवादी पार्टी का झंडा फहराने वाले आजम खां की भी अब नहीं चल रही है, और फिलहाल तो वो जेल में हैं. 

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आजमगढ़ में फिर से धर्मेंद्र यादव को आजमा रहे हैं, थोड़ी बहुत उम्मीद भी होगी ही - क्योंकि उपचुनाव में जीत की राह रोक देने वाले गुड्डू जमाली भी अब मायावती को छोड़ कर अखिलेश यादव के साथ आ चुके हैं. धर्मेंद्र यादव का मुकाबला फिर से बीजेपी के दिनेश लाल यादव निरहुआ से ही है.

मुलायम सिंह की मैनपुरी सीट से डिंपल यादव फिर से चुनाव मैदान में हैं, और वो गढ़ बचाने की भी चुनौती है. बदायूं से अखिलेश यादव ने अपने चाचा शिवपाल यादव को खड़ा किया था, लेकिन वो अनमने से रहे. बाद में बदायूं से शिवपाल यादव को बदल कर उनके बेटे आदित्य यादव को टिकट दे दिया है. 

अखिलेश यादव के चुनाव लड़ने का किसे और क्या फायदा होगा?

अखिलेश यादव की उम्मीदवारी की घोषणा की टाइमिंग भी महत्वपूर्ण है. लोकसभा चुनाव के दूसरे चरण की वोटिंग के ठीक पहले अखिलेश यादव के कन्नौज से चुनाव लड़ने की घोषणा की गई है.

साफ है, एक बड़ा मकसद तो चुनाव में लोगों को ये मैसेज देना है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और यूपी में योगी आदित्यनाथ की बीजेपी को चैलेंज करने के लिए अखिलेश यादव खुद मैदान में उतर रहे हैं. 

अखिलेश यादव के इस कदम से समाजवादी पार्टी कार्यकर्ताओं का भी जोश बढ़ेगा, और उनके वोट बैंक को भी लगेगा कि बीजेपी को शिकस्त देने का एक मौका तो है ही. ओबीसी वोट का एक बड़ा हिस्सा तो समाजवादी पार्टी से छिटक ही चुका है, कहीं यादव वोटर भी मन न बदल ले, डर तो ये भी होगा ही. 

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यूपी में राम मंदिर का प्रभाव तो है ही, खासकर महिलाओं में. पुरुषों के लिए भले ही जाति महत्वपूर्ण हो, लेकिन महिलाओं के लिए अपने परिवार के भले के लिए आस्था का केंद्र दो मंदिर ही होता है - अखिलेश यादव के मोर्चे पर आ खड़े होने से जिन वोटर का मन डोल रहा होगा, हो सकता है थोड़ा स्थिर हो जाये. 

चौथे चरण में कन्नौज के बाद ठीक अगले यानी पांचवें चरण में यानी 20 मई को अमेठी और रायबरेली में भी वोट डाले जाएंगे. जिस तरह से अमेठी के गेस्ट हाउस की रंगाई पुताई हो रही है, राहुल गांधी की अमेठी वापसी के भी कयास लगाये जा रहे हैं - लेकिन माना जा रहा है कि वायनाड में 26 अप्रैल को वोट पड़ जाने के बाद कांग्रेस की तरफ से अमेठी और रायबरेली को लेकर भी कोई घोषणा हो सकती है. 

हो सकता है, कन्नौज में वोट डाले जाने से ठीक पहले अखिलेश यादव वाले अंदाज में भी राहुल गांधी की अमेठी वापसी या रायबरेली से भी चुनाव लड़ने की घोषणा कर दी जाये! 

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