'परिवार के भीतर बातचीत से रुकेगा लव जिहाद', बोले संघ प्रमुख मोहन भागवत

आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने भोपाल में कहा कि लव जिहाद को रोकने के प्रयास घर-परिवार से शुरू होने चाहिए. उन्होंने कहा कि परिवार में नियमित संवाद से धर्म, संस्कृति और परंपरा के प्रति सम्मान बढ़ता है, जिससे बेटियां अजनबियों के बहकावे में नहीं आएंगी.

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संघ प्रमुख मोहन भागवत ने कहा कि परिवार में संवाद की कमी के कारण लव जिहाद जैसी घटनाएं होती हैं. (Photo: PTI) संघ प्रमुख मोहन भागवत ने कहा कि परिवार में संवाद की कमी के कारण लव जिहाद जैसी घटनाएं होती हैं. (Photo: PTI)

रवीश पाल सिंह

  • भोपाल,
  • 04 जनवरी 2026,
  • अपडेटेड 10:17 AM IST

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने कहा कि लव जिहाद जैसी घटनाओं को परिवार के भीतर संवाद मजबूत कर रोका़ जा सकता है. उन्होंने जोर देते हुए कहा कि जब घर और परिवार में नियमित बातचीत होगी, तो ऐसी समस्याओं पर स्वतः अंकुश लगेगा. भोपाल के शिवनेरी भवन में आयोजित ‘स्त्री शक्ति संवाद’ कार्यक्रम को संबोधित करते हुए भागवत ने ये बात कही.

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भागवत ने कहा, 'हमें यह सोचना चाहिए कि हमारी बेटी किसी अजनबी द्वारा कैसे बहकाई जा सकती है.' उन्होंने तर्क दिया कि परिवार के सदस्यों के बीच बातचीत की कमी और आपसी संवाद का अभाव इस समस्या में योगदान देता है. संघ प्रमुख ने कहा, 'जब परिवार में नियमित संवाद होता है, तो धर्म, संस्कृति और परंपरा के प्रति सम्मान स्वाभाविक रूप से विकसित हो जाता है.' 

आरएसएस प्रमुख ने लव जिहाद को रोकने के लिए तीन महत्वपूर्ण कदम सुझाए. पहला– परिवार में निरंतर संवाद, दूसरा– लड़कियों में सतर्कता और आत्मरक्षा की भावना पैदा करना और तीसरा– ऐसे अपराध करने वालों के खिलाफ प्रभावी कार्रवाई. उन्होंने यह भी कहा कि सामाजिक संगठनों को ऐसी गतिविधियों के प्रति सजग रहना चाहिए और समाज को सामूहिक प्रतिरोध में उठ खड़ा होना चाहिए, तभी समाधान मिलेगा.

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महिलाओं की वजह से धर्म और संस्कृति सुरक्षित 

मोहन भागवत ने कहा कि जब समाज सभ्य होने की बात करता है, तो महिलाओं की भूमिका केंद्रीय कारक बन जाती है. उन्होंने कहा, 'हमारा धर्म, हमारी संस्कृति और हमारी सामाजिक व्यवस्था महिलाओं की वजह से ही सुरक्षित है. वह समय बीत चुका है जब महिलाओं को केवल सुरक्षा के कारण घर तक सीमित रखा जाता था. आज पुरुष और महिला दोनों मिलकर परिवार और समाज को आगे बढ़ाते हैं, इसलिए दोनों का जागरण आवश्यक है.' 

उन्होंने कहा कि महिलाओं का सशक्तिकरण, उन्हें अवसर प्रदान करना तथा उनकी वैचारिक जागृति आज की जरूरत है. मोहन भागवत ने कहा, 'यह प्रक्रिया पहले से ही शुरू हो चुकी है और महिलाएं समाज के हर क्षेत्र में आगे बढ़ रही हैं, लेकिन इसे और मजबूत करने की आवश्यकता है.' लिंग भेदभाव और उत्पीड़न पर बोलते हुए संघ प्रमुख ने कहा कि पश्चिमी समाज में विवाह के बाद महिला की स्थिति निर्धारित होती थी, जबकि भारतीय परंपरा में मातृत्व के माध्यम से महिला की स्थिति ऊंची की जाती थी. उन्होंने कहा कि मातृत्व हमारे मूल्यों का केंद्र बिंदु है.

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आधुनिकता के नाम पर थोपी गई पश्चिमी संस्कृति

उन्होंने कहा कि आधुनिकता के नाम पर थोपी गई पश्चिमीकरण एक अंधी दौड़ है. इसलिए, बचपन से बच्चों को हम कौन से मूल्य दे रहे हैं, इस पर गंभीरता से विचार करना जरूरी है. महिलाओं को अपनी रक्षा के लिए सशक्त बनाना चाहिए, क्योंकि हमारी परंपराएं महिलाओं को सीमित नहीं करतीं बल्कि उन्हें सशक्त बनाती हैं और असाधारण बनाती हैं. रानी लक्ष्मीबाई जैसे उदाहरण देते हुए मोहन भागवत ने कहा, 'भारतीय महिलाओं ने हर युग में शक्ति और साहस का प्रदर्शन किया है. आज दुनिया भारत की ओर देख रही है और भारत उस भूमिका के लिए खुद को तैयार कर रहा है. देश की लगभग 50% आबादी महिलाएं हैं और बड़ी संख्या में महिलाएं समाज तथा राष्ट्र के लिए कार्य कर रही हैं. हालांकि, अभी भी कई महिलाएं इस प्रक्रिया में शामिल नहीं हैं.'

भागवत ने कहा कि जहां महिलाओं का सम्मान होता है और उनकी जगह सुरक्षित होती है, वहां समाज स्वतः स्वस्थ रहता है. उन्होंने यह भी कहा कि आज समाज एक नई चुनौती का सामना कर रहा है जो सांस्कृतिक आक्रमण के रूप में है, जिसे सांस्कृतिक मार्क्सवाद और वोकिज्म जैसे नाम दिए जाते हैं. उन्होंने कहा, 'इन चुनौतियों का मुकाबला करने के लिए हमारे धर्म, मूल्यों और परंपराओं को गहराई से समझना आवश्यक है.'
 

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