एयरपोर्ट की मशीन ने जिसे 'हेरोइन' बताया, वो निकला अमचूर; 57 दिन जेल में रहे इंजीनियर, अब मिलेगा ₹10 लाख का हर्जाना

MP हाईकोर्ट ने अमचूर पाउडर को ड्रग्स मानकर जेल भेजने के मामले में इंजीनियर अजय सिंह को ₹10 लाख मुआवजा देने का आदेश दिया. 57 दिन जेल में रहने के 16 साल बाद आया फैसला...

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अमचूर को 'ड्रग्स' बताने वाली एजेंसियों पर हाईकोर्ट का हंटर. (सांकेतिक तस्वीर) अमचूर को 'ड्रग्स' बताने वाली एजेंसियों पर हाईकोर्ट का हंटर. (सांकेतिक तस्वीर)

धीरज शाह

  • जबलपुर/भोपाल,
  • 21 मई 2026,
  • अपडेटेड 5:14 PM IST

मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने 16 साल पुरानी एक कानूनी लड़ाई में ग्वालियर के इंजीनियर अजय सिंह के पक्ष में बड़ा फैसला सुनाया है. अदालत ने माना कि तकनीकी खामी और जांच में देरी के कारण एक निर्दोष व्यक्ति को डेढ़ दशक तक मानसिक, सामाजिक और पेशेवर नुकसान झेलना पड़ा. जिस पर जबलपुर हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश देते हुए अजय सिंह को 10 लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया है.

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दरअसल, यह पूरा मामला 7 मई 2010 का है. ग्वालियर निवासी इंजीनियर अजय सिंह भोपाल स्थित राजा भोज एयरपोर्ट से दिल्ली जाने के लिए पहुंचे थे. एयरपोर्ट पर सुरक्षा जांच के दौरान उनके बैग को स्कैनिंग मशीन से जांचा गया.

इसी दौरान एक्सप्लोसिव डिटेक्टर मशीन ने अलर्ट दिखाया. सुरक्षा में तैनात अधिकारियों ने संदेह के आधार पर बैग की गहन तलाशी ली, जिसमें एक पाउडर जैसा पदार्थ मिला. शुरुआती जांच में उसे मादक पदार्थ समझ लिया गया और बिना पर्याप्त पुष्टि के अजय सिंह को हिरासत में ले लिया गया. बाद में पुलिस ने उनके खिलाफ ड्रग्स तस्करी से जुड़े गंभीर केस दर्ज कर दिए और उन्हें जेल भेज दिया गया. 

57 दिन की जेल

जांच एजेंसियों की इस कार्रवाई के चलते एक शिक्षित और पेशेवर व्यक्ति को अपराधियों के बीच 57 दिनों तक जेल में रहना पड़ा. जिस पदार्थ को नशीला माना गया था, वह वास्तव में आमतौर पर रसोई में इस्तेमाल होने वाला अमचूर पाउडर निकला. फॉरेंसिक साइंस लैब की रिपोर्ट आने में लगभग दो महीने लग गए, जिसके बाद स्पष्ट हुआ कि मामला पूरी तरह गलतफहमी और तकनीकी त्रुटि का परिणाम था.

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रिपोर्ट सामने आने के बाद अजय सिंह को जमानत मिल गई, लेकिन इस घटना ने उनके जीवन पर गहरा प्रभाव छोड़ा. उन्होंने इस मामले को लेकर न्यायालय का दरवाजा खटखटाया और व्यवस्था की लापरवाही के खिलाफ कानूनी लड़ाई जारी रखी. लंबे समय बाद मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की सिंगल बेंच ने इस पूरे मामले की सुनवाई करते हुए अहम टिप्पणी की.

हाईकोर्ट की कड़ी टिप्पणी

अदालत ने कहा कि केवल तकनीकी खराबी या संसाधनों की कमी के कारण किसी निर्दोष नागरिक की स्वतंत्रता छीनी नहीं जा सकती.

सुनवाई के दौरान सरकारी अधिवक्ता सुमित रघुवंशी ने सरकार का पक्ष रखा, लेकिन कोर्ट ने जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए.

अदालत ने माना कि जांच एजेंसियों को किसी भी व्यक्ति के खिलाफ कार्रवाई से पहले तथ्यों की पूरी पुष्टि करनी चाहिए. कोर्ट ने यह भी कहा कि इस घटना से याचिकाकर्ता की सामाजिक प्रतिष्ठा, करियर और मानसिक स्थिति को गंभीर क्षति पहुंची है, जिसकी भरपाई पूरी तरह संभव नहीं है.

मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश देते हुए अजय सिंह को 10 लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया. अदालत का यह फैसला न केवल पीड़ित को राहत देने वाला है, बल्कि सुरक्षा एजेंसियों और फॉरेंसिक विभागों के लिए भी एकअहम संदेश माना जा रहा है. यह निर्णय स्पष्ट करता है कि वैज्ञानिक जांच और सुरक्षा प्रक्रिया के नाम पर किसी भी नागरिक के मौलिक अधिकारों की अनदेखी नहीं की जा सकती.

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