चूहाकांड के बाद अब बिल्लियों की एंट्री... पहले हो चुकी नवजातों की मौत, इंदौर के सबसे बड़े अस्पताल में मरीज कितने सुरक्षित?

इंदौर के सबसे बड़े सरकारी एमवाय अस्पताल में एक बार फिर अव्यवस्था और लापरवाही की तस्वीर सामने आई है. छह महीने पहले चूहाकांड और नवजातों की मौत के बाद अब अस्पताल की ओपीडी में बिल्लियों का बसेरा मिलने से मरीजों की सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं. संवेदनशील वार्डों तक बिल्लियों की आवाजाही ने प्रबंधन की कार्यप्रणाली को कठघरे में खड़ा कर दिया है.

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इंदौर के अस्पताल में बिल्लियों का बसेरा. (Photo: Screengrab) इंदौर के अस्पताल में बिल्लियों का बसेरा. (Photo: Screengrab)

धर्मेंद्र कुमार शर्मा

  • इंदौर,
  • 20 फरवरी 2026,
  • अपडेटेड 10:20 AM IST

इंदौर के सबसे बड़े सरकारी एमवाय अस्पताल में लापरवाही की एक और तस्वीर सामने आई है. पहले चूहाकांड, नवजातों की मौत के बाद अब अस्पताल की ओपीडी में बिल्लियों ने डेरा जमा लिया है, जिससे मरीजों की सुरक्षा और स्वच्छता व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं.

मध्य प्रदेश के इंदौर स्थित एमवाय अस्पताल, जो शहर का सबसे बड़ा सरकारी अस्पताल माना जाता है, एक बार फिर सुर्खियों में है. छह महीने पहले हुए चूहाकांड और दो नवजातों की मौत के बाद अस्पताल प्रशासन पहले ही सवालों के घेरे में था. अब एक नया मामला सामने आया है, जिसमें अस्पताल के बाह्य रोगी विभाग यानी ओपीडी के पहले फ्लोर पर एक बिल्ली ने बच्चों को जन्म दे दिया है.

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इस घटना ने अस्पताल की स्वच्छता व्यवस्था और निगरानी प्रणाली की पोल खोल दी है. जहां मरीज इलाज के लिए आते हैं, वहीं खुलेआम जानवरों की आवाजाही होना गंभीर लापरवाही को दर्शाता है.

संवेदनशील वार्ड तक पहुंची बिल्लियां

चिंताजनक बात यह है कि बिल्लियों की मौजूदगी केवल ओपीडी तक सीमित नहीं है. जानकारी के अनुसार, एचआईवी संक्रमित मरीजों के वार्ड और मेडिसिन कक्ष तक भी बिल्लियों की आवाजाही देखी गई है. यह स्थिति बेहद गंभीर मानी जा रही है, क्योंकि इन वार्डों में भर्ती मरीज पहले से ही कमजोर प्रतिरक्षा प्रणाली वाले होते हैं.

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ऐसे में किसी भी प्रकार की अस्वच्छता या संक्रमण उनके लिए जानलेवा साबित हो सकता है. अस्पताल में इस तरह की लापरवाही मरीजों की जान को सीधे खतरे में डाल रही है.

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मरीजों को दी जाने वाली दवाओं पर भी खतरा

केंद्र सरकार द्वारा एचआईवी मरीजों को हर महीने मुफ्त में महंगी दवाएं उपलब्ध कराई जाती हैं. लेकिन अस्पताल परिसर में गंदगी और बिल्लियों की मौजूदगी के कारण इन दवाओं की गुणवत्ता पर भी सवाल उठने लगे हैं.

विशेष रूप से नवजात बच्चों को दी जाने वाली जरूरी दवाएं जैसे सेप्ट्रोन पर भी इसका असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है. यदि दवाएं दूषित होती हैं, तो मरीजों के इलाज पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है.

कर्मचारियों की भूमिका पर सवाल

इस मामले में सबसे हैरान करने वाली बात यह सामने आई है कि एआरटी केंद्र के कुछ कर्मचारी ही बिल्लियों की देखभाल करते हुए पाए गए. अस्पताल के भीतर ही नियमों की अनदेखी हो रही है.

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पहले भी अस्पताल की हाउसकीपिंग व्यवस्था संभालने वाली कंपनी बीवीजी पर लापरवाही के चलते 25 हजार रुपये का जुर्माना लगाया जा चुका है. इसके बावजूद हालात में सुधार नहीं दिखा.

प्रबंधन ने पूरे मामले को लेकर क्या कहा?

वहीं एमवाय अस्पताल और एमजीएम मेडिकल कॉलेज के डीन डॉ. अरविंद घनघोरिया ने इसे बड़ी लापरवाही माना है. उन्होंने स्वीकार किया कि ओपीडी में बिल्ली के तीन बच्चे मिले हैं, जिनमें से दो को रेस्क्यू कर लिया गया है और तीसरे को हटाने के लिए पिंजरा लगाया गया है.

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उन्होंने कहा कि मरीजों के बीच बिल्लियों की मौजूदगी बीमारियों को बढ़ावा दे सकती है, इसलिए पेस्ट एंड एनिमल कंट्रोल कंपनी बीवीजी के कर्मचारियों की जवाबदेही तय की जाएगी. अस्पताल में लगातार सामने आ रहे ऐसे घटनाक्रम मरीजों की सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर प्रश्नचिह्न छोड़ रहे हैं.

बार-बार सामने आ रहीं खामियां

एमवाय अस्पताल में इस तरह की घटनाएं लगातार सामने आ रही हैं. चूहाकांड के बाद सख्त कदम उठाने की बात कही गई थी, लेकिन जमीनी स्तर पर हालात जस के तस नजर आ रहे हैं. यह पूरा मामला अस्पताल में मरीजों की सुरक्षा, स्वच्छता और प्रबंधन की जिम्मेदारी पर गंभीर सवाल खड़े करता है. जिस अस्पताल में लोगों को जीवन बचाने के लिए लाया जाता है, वहां इस तरह की घटनाएं चिंता का विषय हैं.

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