इंदौर के भागीरथपुरा की गलियों में बिछी लाइन के जरिये आज भी पानी लोगों के घरों तक पहुंच रहा है, लेकिन वह पानी अब भरोसे का नहीं रहा. कुछ महीने पहले तक जिस इलाके को 'विकास का मॉडल' बताया जा रहा था, उसी इलाके में आज लोगों की मौतों के बाद तमाम सवाल उठ रहे हैं. कहानी सिर्फ दूषित पानी से हुई मौतों की नहीं है, कहानी है उस सिस्टम की, जो मंच पर तालियां बटोरता है, और उसी इलाके में जमीन पर लाशें होती हैं.
मौतों के आंकड़ों की बात करें तो प्रशासन जहां अब तक सिर्फ छह मौतों की पुष्टि कर रहा है, वहीं महापौर पुष्यमित्र भार्गव मरने वालों की संख्या 10 बता चुके हैं. इससे अलग, भागीरथपुरा के स्थानीय लोग कहीं ज्यादा गंभीर हालात की बात कर रहे हैं. उनका दावा है कि डायरिया फैलने से छह महीने के एक मासूम बच्चे समेत कम से कम 16 लोगों की जान गई है.
करीब सात-आठ महीने पहले का एक वीडियो है. मंच सजा है, माइक पर इंदौर के महापौर पुष्यमित्र भार्गव हैं. उनके पीछे खड़े हैं भागीरथपुरा के पार्षद कमल वाघेला. माहौल उत्सव का है. महापौर मुस्कुराते हुए कहते हैं- ये हैं कमल वाघेला... इनके नाम में कमल भी है और वाघ भी. कमल मतलब कोमल और वाघ मतलब अगर कोई ज्यादा परेशान करे तो शेर हो जाते हैं. सभा हंसती है, तालियां बजती हैं.
महापौर आगे गिनाते हैं- 24 सड़कें, पहले ड्रेनेज लाइन, फिर पानी की लाइन, करीब 2 करोड़ 40 लाख की सड़कें, और कुल मिलाकर तीन साल में 10 करोड़ के काम. अंत में मंच से 'बेस्ट पार्षद' का सर्टिफिकेट दिया जाता है और दूसरे पार्षदों को सलाह... भागीरथपुरा आकर सीखिए कि विकास कैसे होता है. उस वक्त किसी ने नहीं सोचा था कि यही वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होकर सवाल खड़े करेगा.
भागीरथपुरा में कई लोग रो रहे हैं. कई घरों में मातम है. दूषित पानी पीने से लोगों की तबीयत बिगड़ी, अस्पताल पहुंचे, और कुछ वापस नहीं लौटे. मौतें हो गईं. वही इलाका, वही पाइपलाइन, वही ड्रेनेज, जिसे मंच से आदर्श बताया गया था... वहां पानी जहरीला हो गया था.
सवाल यहीं से उठता है. अगर 2.40 करोड़ की ड्रेनेज और 2.40 करोड़ की पानी की पाइपलाइन डाली गई थी, तो फिर लोगों के नलों में सीवेज मिला पानी कैसे पहुंचा? अगर काम इतना बेहतरीन था कि उसे 'बेस्ट' कहा गया, तो वही सिस्टम जानलेवा कैसे बन गया?
मौतों के बाद महापौर का बयान आता है, अफसर उनकी नहीं सुनते, शिकायतों पर ध्यान नहीं दिया गया. लेकिन वायरल वीडियो एक आईना बनकर खड़ा हो जाता है. सवाल उठता है कि जब मंच से सर्टिफिकेट दिया गया, तब अफसरों की अनसुनी कहां थी? अगर हालात इतने खराब थे, तो तारीफों के पुल क्यों बांधे गए?
भागीरथपुरा के लोग बताते हैं कि पानी में बदबू थी, रंग बदला हुआ था. शिकायतें हुईं, लेकिन गंभीरता नहीं दिखाई गई. किसी ने कहा- लाइन ठीक हो जाएगी, किसी ने कहा- अस्थायी समस्या है. और इसी अस्थायी समस्या ने स्थायी दर्द दे दिया.
यह कहानी सिर्फ एक पार्षद या एक वीडियो की नहीं है. यह कहानी कागजों और जमीन के फर्क की है. फाइलों में करोड़ों का विकास दर्ज है, लेकिन नलों से जहर निकला. मंच से विकास का दावा हुआ, लेकिन गलियों में एंबुलेंस दौड़ीं.
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वायरल वीडियो इसलिए चुभता है, क्योंकि उसमें वही सिस्टम खुद अपनी पीठ थपथपाता दिखता है. वही लोग, वही दावे, वही तालियां- और आज वही इलाका सवाल पूछ रहा है.
हालात गवाह हैं कि विकास सिर्फ आंकड़ों से नहीं होता, जिम्मेदारी से होता है. ड्रेनेज और पाइपलाइन बिछाना ही काफी नहीं, उन्हें सुरक्षित रखना, शिकायतों पर समय पर कार्रवाई करना और जमीनी सच को मानना भी उतना ही जरूरी है. सवाल है कि अगर सब कुछ इतना अच्छा था, तो लोगों ने जहर क्यों पिया? इतनी मौतें कैसे हो गईं?
रवीश पाल सिंह