'मां नहीं है कातिल', बेटे की हत्या मामले में हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, 98 दिन जेल में रही अलका जैन को क्लीन चिट

Abhyuday Jain death mystery Guna: गुना के सनसनीखेज अभ्युदय जैन हत्याकांड में एक साल बाद आखिरकार इंसाफ की जीत हुई है. ग्वालियर हाईकोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए मां अलका जैन के खिलाफ दर्ज FIR और पूरी आपराधिक कार्यवाही को निरस्त कर दिया है.

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गुना के अभ्युदय जैन मामले में हाईकोर्ट का फैसला.(Photo:ITG) गुना के अभ्युदय जैन मामले में हाईकोर्ट का फैसला.(Photo:ITG)

विकास दीक्षित

  • गुना,
  • 25 फरवरी 2026,
  • अपडेटेड 2:18 PM IST

गुना के बेहद सनसनीखेज अभ्युदय जैन के मौत के मामले में आखिरकार मुख्य आरोपी अलका जैन (मां) को राहत मिल गई है. हाईकोर्ट की ग्वालियर बेंच ने हाईप्रोफाइल मामले पर सुनवाई करते हुए 19 पन्ने का फैसला दिया है. फैसला में हाईकोर्ट ने लिखा है कि बिना सबूत के केवल शक के आधार पर आपराधिक कार्रवाई जारी रखना नया का हनन होता है. ठीक एक साल बाद हाईकोर्ट ने FIR और पूरे आपराधिक प्रकरण को निरस्त कर दिया है. अभ्युदय जैन की मौत 14 फरवरी 2025 में हुई थी जिसके बाद मां अलका जैन को बेटे की मौत के लिए जिम्मेदार माना गया था. अलका जैन को 98 दिनों तक जेल की सलाखों के पीछे रहना पड़ा था, इस दौरान अलका बुरी तरह से टूट गई थीं.

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दरअसल, 14 फरवरी 2025 को 15 साल के अभ्युदन का शव घर के अंदर वॉशरूम में मिला था. अभ्युदय की मां अलका के अनुसार उसका शव फांसी के फंदे पर लटका हुआ मिला था, जिसके बाद पुलिस ने शव को रिकवर किया और मर्ग कायम करने के बाद जांच शुरू की. जांच के दौरान 8 मार्च को पुलिस ने मां अलका जैन को बेटे की हत्या के आरोप में गिरफ्तार कर लिया. बेटे की मौत और पत्नी की गिरफ्तारी से आहत पति अनुपम जैन ने पुलिस मुख्यालय में डीजीपी के समक्ष शिकायत दर्ज कराई.

जिसके बाद IG ने ग्वालियर संभाग के DIG अमित सांघी के नेतृत्व में विशेष टीम गठित की, इस टीम में DSP अवनीत शर्मा की भूमिका मुख्य रही. SIT ने भोपाल के गांधी मेडिकल कॉलेज से मेडिको लीगल राय ली तो कहानी कुछ और निकली. 

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गांधी मेडिकल कॉलेज की रिपोर्ट में स्पष्ट तौर पर अलका जैन की गलती निकलकर सामने नहीं आई. मेडिको लीगल जांच को आधार बनाकर SIT ने कोतवाली पुलिस की विवेचना पर सवाल खड़े कर दिए और पूरा मामला ही पलट गया. SIT की टीम ने मां अलका जैन को क्लीन चिट दे दी है .

ट्रायल कोर्ट के 12 संदेहास्पद बिंदुओं को हाईकोर्ट ने एक एक करके खारिज कर दिया.

जब SIT ने खारिजी रिपोर्ट प्रस्तुत की तो ट्रायल कोर्ट ने 12 परिस्थितियां बताई थीं और SIT द्वारा प्रस्तुत खारिजी रिपोर्ट को निरस्त कर दिया था. लेकिन हाईकोर्ट ग्वालियर ने सभी 12 परिस्थितियों का विश्लेषण किया और कहा -

1- Last Seen Theory 
HIGHCOURT- मां के साथ आखिरी बार देखा जाना स्वाभाविक नहीं है. केवल 'लास्ट सीन' में दोष सिद्ध नहीं होता.

2-घर में मौजूदगी 
HIGHCOURT- घटना के समय घर में होना अपराध का प्रमाण नहीं है.

3- दुपट्टे से फांसी की संभावना पर संदेह 
HIGHCOURT- ऊंचाई व परिस्थितियों पर ट्रायल कोर्ट ने शंका जाहिर की थी जो वैज्ञानिक साक्ष्य से समर्थित नहीं है

4- दुपट्टा काटने में कम समय लगा 
HIGHCOURT -यह निष्कर्ष अनुमान आधारित है,कोई विशेषज्ञ की राय नहीं है.

5- डुप्लीकेट चाबी का प्रयोग 
HIGHCOURT- मकान मालकिन के बयानों में स्पष्ट है कि चाबी पहचान कर दी गई. इस संदेह को मानना उचित नहीं.

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6- रिश्तेदारों का स्कूल जाना 
HIGHCOURT- मानव व्यवहार अलग अलग हो सकता है. इसे अपराध से जोड़कर देखना न्यायसम्मत नहीं है.

7- नोटबुक में फटे हुए पन्ने 
HIGHCOURT- पन्ने किसने फाड़े गए, इसका कोई साक्ष्य नहीं .

8- पढ़ाई लिखाई में गिरावट 
HIGHCOURT- रिकॉर्ड में 89.5 % , 78 % और 64.7 % अंक दर्शाते हैं कि शैक्षणिक प्रदर्शन गिर रहा था.

9- CALL DETAIL, CCTV, PEN DRIVE 
HIGHCOURT- कोई आपत्तिजनक सामग्री चिन्हित नहीं की गई.

10- फ्लैट अंदर से बंद होना 
HIGHCOURT- ताले की प्रकृति पर कोई विशेषज्ञ रिपोर्ट प्रस्तुत नहीं.

11- ऊपर से आवाज़ें सुनाई देना 
HIGHCOURT- घटना से सीधा संबंध प्रतीत नहीं होता.

12- पोस्टमॉर्टम में स्ट्रेंगुलेशन शब्द 
19 अप्रैल 2025 की विशेषज्ञ रिपोर्ट में स्पष्ट है कि आंखों में सब - कंजक्टिव हेमरेज फांसी और गला घोंटने दोनों में हो सकता है. इसे केवल हत्या का निर्णायक संकेत नहीं माना जा सकता. हाईकोर्ट ने सभी 12 परिस्थितिजन्य बिंदुओं पर अपना अभिमत दिया है.

भावुक हो गई मां 
 
हाईकोर्ट द्वारा अपराधिक प्रकरण निरस्त करने के बाद अभ्युदय जैन की मां अलका भावुक हो गईं. अलका के पति अनुपम जैन ने aajtak से चर्चा में बताया, ''एक मां अपने बेटे की हत्या कैसे कर सकती है.अभ्युदय शादी के पांच साल बाद पैदा हुआ था. शुरुआती जांच में पुलिस ने बिना कुछ स्पष्ट किए अलका को जेल भेज दिया. पहले बेटा खत्म हो गया उसके बाद 98 दिन तक अलका जेल में बंद रही. हमारा पूरा परिवार बिखर गया. अभ्युदय की याद में अलका नॉर्मल नहीं हो पा रही हैं. केस लड़ने के दौरान मकान मालिक ने भी किराया वसूली का नोटिस थमा दिया. हमने अकेले पूरी लड़ाई लड़ी.''
 
जांच अधिकारी अवनीत शर्मा ने बताया कि केस बेहद जटिल था. कानून का काम केवल अपराधी की सजा दिलाना नहीं होता, बल्कि निर्दोष को न्याय दिलाना भी होता है. इस हाईप्रोफाइल केस में मां को बेटे की हत्या का आरोपी बनाया गया था. 

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अलका जैन ने बेटे अभ्युदय की हत्या क्यों की? इसका कोई भी मोटिव नजर नहीं आया. भोपाल के गांधी मेडिकल कॉलेज की मेडिको लीगल रिपोर्ट से बहुत कुछ स्पष्ट हो गया. यही रिपोर्ट हाईकोर्ट के समक्ष प्रस्तुत कर दी थी. इस बात की खुशी है कि निर्दोष मां को न्याय मिल सका. SIT टीम के सदस्य DSP अवनीत शर्मा वर्तमान में श्योपुर जिले के बड़ौदा अनुभाग में पदस्थ हैं. हालांकि, इस हाईप्रोफाइल मामले में अब भी अभ्युदन जैन की मौत एक राज बनी हुई है.

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